पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
८६ पंचदशी
करना ही, उस तत्व को ग्रहण करना कहाता है।
जब यह सर्वग्रह—जिसे तुम अनादि काल से करते आ रहे हो—
रुक जायगा उस समय जो अनुपम सत्य तत्व शेष रह जायगा,
वही तो यह है। उस तत्व को जानने के लिये आपको किसी भी
प्रमाण से सहायता लेनी नहीं पड़ेगी। क्योंकि वह तत्व तो स्वयं
प्रकाश है। वैसी स्वयंप्रकाश वस्तु को समझना हो तो किसी
अनुभवी के मुख से श्रुति का पठन करो। अनुवादों के पढ़ने से
वह बात मिलने वाली नहीं है। जो जिस मार्ग की यात्रा कर
लेता है उसके मर्म का वही सच्चा जानकार होता है वही दूसरे
को भी सच्चा मार्ग दिखा सकता है। मुरदा पुस्तकों को पढ़
लेने से बात का मर्म हाथ नहीं लगता। इस कारण अनुभवी गुरु
की आवश्यकता होती ही है।
यदि तो मन्दाधिकारी लोग उपर्युक्त सर्वग्रह का त्याग न
कर सकें तो वे बुद्धि की शरण में पहुँच जांय। बुड्ढे लोग
जैसे लकड़ी के सहारे से चलते हैं इसी प्रकार वे लोग बुद्धि के
सहारे से इसी साक्षी तत्व को पहचानें, कि यह बुद्धि जिस किसी
बाह्य या आन्तर पदार्थ की कल्पना करती है उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परात्मा बुद्धि के अधीन होता है। यों बुद्धि का
हाथ पकड़ कर इस गहन तत्व को वे लोग भी टटोल लें।
11. Yogananda
[११]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप
इस प्रकरण में उस ब्रह्मानन्द का वर्णन किया गया है जिसे
पहचानते ही इस लोक और परलोक के त्रिविध ताप कूच कर
जाते हैं और पहचानने वाला सुखरूप ब्रह्मतत्व ही हो जाता है।
इस ब्रह्मज्ञान की श्रुतियों ने बड़ी प्रशंसा की है। वे कहती हैं
कि—"ब्रह्मदर्शी पुरुष पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक मोह
की हालत से ऊपर उठ जाता है। रस अथवा सार तो ब्रह्म ही है।
इस रस को पाकर ही आनन्दी हो सकता है और तरह से नहीं।
जब अपने रूप में प्रतिष्ठा (ठहरना) मिल जाती है तभी पुरुष
अभय हो सकता है। जब तो अपने में भेद देखने लगता है तब
उसे डरना ही पड़ता है। यह समझ लेने वाला पुरुष कि 'आनंद
तो जहां भी है वहां ब्रह्मतत्व का ही है,' किसी भी बात और किसी
भी घटना से नहीं डरता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस एक
इस ज्ञानी को ही छोड़ती है। शेष तो सब प्राणी इस कर्तव्याग्नि
की ज्वालाओं से झुलसे पड़े हैं और इसी के झूठे इलाज करने में
व्यग्र हो रहे हैं। ऐसा जान चुकने वाला पुरुष पाप पुण्यों को
छोड़कर सदा आत्मा को याद रखने लगता है और किये हुए धर्मों
को भी तो आत्मरूप ही जान लेता है। उस परावर को देख चुकने
पर इसकी 'हृदयग्रन्थि' खुल जाती है। इसके सब सन्देह मिट
जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। उसी को जान चुकने
वाला पुरुष जन्म मरणरूपी चक्कर से छूट सकता है। इस चक्र
पंचदशी ८८
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से छुटकारे का दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। देव को जानकर
ही फांसा खुल जाता है। क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर जन्म
लेना नहीं पड़ता। जो धीर पुरुष देव को जान लेता है वह इसी
जन्म और इसी लोक में हर्ष शोक से छूट जाता है। किये या
बेकिये पुण्य पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते।” उपर्युक्त
श्रुतियों में ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि और आनन्द की प्राप्ति
दोनों ही बातों की घोषणा की गयी है।
आनन्द के मुख्य तीन भेद हैं एक ‘ब्रह्मानन्द’ दूसरा ‘विद्या-
नन्द’ तीसरा ‘विषयानन्द’। सबसे पहले ब्रह्मानन्द का विवेचन
करेंगे—
भृगु के पिता वरुण ने उसको ब्रह्म का लक्षण बताया कि
‘जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे से जीते हैं
तथा मरते समय जिसमें लीन हो जाते हैं वह ब्रह्म है।’ इस
लक्षण को जब उसने अन्न, प्राण, मन और बुद्धि में घटाकर देखा
तब उसे यह निश्चय हो गया कि ये ब्रह्मतत्व नहीं है। अन्त में
जाकर इसी लक्षण के सहारे से उसे आनन्द के ही ब्रह्म होने का
निश्चय हुआ। क्योंकि आनन्द से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं उसी
से जीते हैं और उसी में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण आनन्द
ही ब्रह्मतत्व है। इसमें फिर उसे संशय नहीं रहा।
भूतों के उत्पन्न होने से पहले [त्रिविध द्वैत के न होने से]
भूमा परमात्मा ही था। क्योंकि प्रलय काल में ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयरूपी
त्रिविध द्वैत होता ही नहीं। उस परमात्मा में से जब विज्ञानमय
उत्पन्न हुआ तब वह ‘ज्ञाता’ हो गया। जब मनोमय उत्पन्न हुआ
तब ‘ज्ञान’ होने लगा। जब शब्दादि विषय उत्पन्न हुए तब वे ‘ज्ञेय’
हो गये। ये तीनों ही उत्पत्ति से पहले नहीं थे। आप उस अवस्था
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ८९
का ध्यान कीजिये—जबकि ये उपर्युक्त तीनों हा नहीं थे, यदि
आप उस अवस्था में जाने का साहस कर सकते हों तो सुनिये—
उस अवस्था में एक द्वैतरहित पूर्ण पदार्थ अनुभव में आता ही
है। द्वैतरहित पूर्ण पद को देखना हो तो यहां लोक में वर्तमान
काल में भी देख लो कि समाधि के समय निर्द्वैत पूर्ण आत्मा का
अनुभव विद्वान् को होता ही है। सुषुप्ति और मूर्च्छा में उस निर्द्वैत
पूर्ण तत्व का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ ही करता है। सुषुप्ति
आदि के समय इस पूर्ण पद के टुकड़े कर डालने वाली वस्तु नहीं
रह जाती और यों उस समय आत्मा में आत्मा की पूर्णता आ ही
जाती है। इसी प्रकार सृष्टि बनने से पहले भी,भेदक उपाधि के न
रहने के कारण,वह परात्मा उस समय पूर्ण का पूर्ण ही रहता है।
पुराण सहित पांचों वेदों और सकल शास्त्रों को जानकर भी
केवल अनात्मज्ञ होने के कारण नारद बड़ा ही शोकी हो गया
था। उसने गुरु के सामने जाकर अपने हृदय की दुर्बलता को
यों दिखाया था कि भगवन् ! विद्या पढ़ने से पहले तो मुझे सर्व-
साधारण की तरह, तीन तरह के ताप ही तपाया करते थे, अब
तो मेरे ऊपर यह बोझ और पड़ गया है कि कहीं यह विद्या भूल
न जाय, दूसरे विद्वान् से पराजय का खटका भी लगा रहता है।
अपने से थोड़े पढ़े लिखे को देखकर गर्व भी होने लगा है, इस
कारण बार बार इसका अभ्यास करना पड़ता है। यों विद्वान् होने
से तो मेरा बोझ और भी बढ़ गया है। होना जो चाहिये था उस
से सर्वथा विपरीत हो गया है। विद्वान् होने से तो मुझे शान्ति की
आशा लगी हुई थी। आज वह पूरी नहीं हो रही है सो कृपा
करके आप मुझे वहां पहुँचा दीजिये जहां जाकर शोक नहीं
रहता। इसके उत्तर में सनत्कुमार ऋषि ने उत्तर दिया कि—सुख
९० पञ्चदशी
ही ऐसा तत्व है जिसे जानकर शोक का पार पाया जा सकता है,
सो आप सुख को ही जान लें। सुख के विषय में भी यह बात
विशेष रूप से जाननी पड़ेगी कि—यह जो वैषयिक सुख है इसे
तो हम सुख ही नहीं मानते हैं। क्योंकि इस पर तो हज़ारों शोक-
रूपी श्वापदों की वक्र दृष्टि पड़ी ही हुई है। वे तो सदा ही इस
वैषयिक सुख को नोचते रहते हैं। इसे तो सुख न कहकर दुःख
ही कहें तो भला है। यह तो ठीक है कि अद्वैत में भी सुख नहीं
है परन्तु आपको यह मालूम हो जाना चाहिये कि सुख तो स्वयं अद्वैत
ही है। स्वयंप्रकाश होने के कारण उसके लिये प्रमाण की दरकार
भी नहीं है। सुषुप्ति के समय इन्द्रियां नहीं होती हैं, जिनसे उसे
जान सकें, फिर भी सुषुप्ति को सब मानते ही हैं। जानते हो
ऐसी विचित्र बात क्यों है ? बिना प्रमाण की वस्तु को क्यों माना
जाता है ? सुनो इसका कारण सुषुप्ति की स्वयंप्रकाशता ही तो
है। उस सुषुप्ति के समय कुछ भी दुःख नहीं होता। उस समय
केवल सुख नाम की वस्तु ही शेष रह जाती है। उस समय कोई
भी विरोधी दुःख नहीं रहता, इस कारण उस समय सुख मानने
में कोई विघ्न नहीं है। जागते समय के अनेक व्यापारों से थक-
कर जब दुःखदायी प्रसंग टल जाता है तब वह प्राणी स्वस्थचित्त
होता है। उस समय ही उसे मृदुशय्या आदि से मिलने वाले
सुख का अनुभव होता है। विषयोपार्जन करता करता तंग हो
कर जब उस दुःख को हटाने के लिये कोमल शय्या पर लेट
जाता है तब उसकी बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है। अन्तर्मुख हुई
उस बुद्धिवृत्ति में सामने रक्खे हुए दर्पण की तरह स्वरूपभूत जो
आत्मानन्द है, वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। बस इसी को तो
'विषयानन्द' कहते हैं। यह विषयानन्द त्रिपुटी के ही अधीन
ब्रह्मानन्दन्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९१
(मातहत) होता है, इस कारण इससे भी जीव को यत्किंचित्
श्रम तो होता ही है। इस श्रम को हटाने के लिये यह जीव
प्रतिदिन सोना चाहा करता है या यों कहो कि परमात्मा की ओर
दौड़ लगाया करता है। वहां पहुँच कर जो अद्भुत प्रसंग होता
है उसे तो याद करते ही साधकों को बड़ी प्रसन्नता होती है।
क्योंकि उस समय सोने वाला प्राणी स्वयं ही वहां का ब्रह्मानन्द
हो गया होता है। जैसे धागे में बंधा हुआ पक्षी चारों तरफ उड़
उड़ कर थक कर अपने बन्धनस्थान पर लौटा हो, इसी प्रकार
यह जीव धर्माधर्म के फलों को भोगने के लिये सुपने या जागरण
में टक्करें मार मार कर भोगदायी कर्मों के क्षीण होते ही, लीन हो
जाता है। जैसे कोई श्येन [पक्षी] उड़ते उड़ते थककर अपने
घोंसले पर को टूट पड़ा हो उसी प्रकार ब्रह्मानन्द का लम्पट यह
जीव सुषुप्ति की ओर को दौड़ा करता है। मनुष्यों में भी जैसे
नन्हा बच्चा जब दूध पीकर खाट पर लेटा होता है उस समय वह
आनन्द की मूर्ति दिखाई देता है। क्योंकि उसे उस समय रागद्वेष
नहीं होता। जो चक्रवर्ती राजा सब भोगों से तृप्त होकर बैठा है,
जिसे मनुष्यों को मिलने वाला बड़े से बड़ा सुख प्राप्त रहता है,
वह भी आनन्दमूर्ति हुआ रहता है। जो ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण है वह
जब कृतकृत्य होकर बैठता है—विद्यानन्द की अन्तिम गति जब
उसे मिल जाती है तब वह भी सुखमूर्ति बन जाता है। मुग्ध,
बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तो तीन लोक में सुखी माने जाते हैं।
जिनको लेशमात्र भी विवेक नहीं है, उनमें बालक सबसे सुखी
माना जाता है। जिन्हें कुछ विवेक है उनमें, सार्वभौम राजा सब
से सुखी गिना जाता है। जो अतिविवेकी हैं उनमें आत्मदर्शी
को सर्वाधिक सुखी समझते हैं। इन तीनों को छोड़कर और तो
९२ पंचदशी
सभी प्राणी दिन रात दुःखी बने रहते हैं—वे सुखी कभी नहीं होते।
इस कारण इन तीन का ही दृष्टान्त हमने दिया है। अब प्रकृत
बात तो यही हुई कि—यह सोता हुआ प्राणी भी इन ही तीनों
की तरह ब्रह्मानन्द में तत्पर रहता है उसे स्त्री से आलिंगित कामी
की तरह अन्दर बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं रह जाता। उस
अवस्था के विषय में श्रुति ने कहा है कि—उस समय पिता पिता
नहीं रहता। अर्थात् जीव का जीवभाव ही उतने समय के लिये
खोया जाता है। उस समय तो जीव ब्रह्मतत्व ही हो गया होता
है। क्योंकि संसारिपन का तो कोई चिह्न ही उस समय नहीं रह
जाता। जानते हो सुख दुःख देने वाली वस्तु क्या है ? सुनो !
पितापन आदि का अभिमान ही सुख दुःख का कारण हुआ
करता है। सुषुप्ति जब आती है तब यही अभिमान नहीं रह जाता
और यह प्राणी उस समय सब शोकसरिताओं के पार पहुँच गया
होता है। जब कोई पुरुष सोकर उठता है तब कहता है कि मैं
सुखपूर्वक सोया और मैंने कुछ भी नहीं जाना। अर्थात् वह उस
समय सुख और अज्ञान दोनों को जान रहा था। चित्स्वरूप होने
के कारण सोते समय सुख तो स्वयं ही प्रतीत हो जाता है। उसी
स्वयंप्रकाश सुख पर जो अज्ञान का पर्दा पड़ा है, उस की
प्रतीति भी उस सुख के सहारे से ही हो जाती है। वाजसनेयी
शाखा वालों ने सुख विज्ञान और आनन्द इन तीनों को एक ही
बात कहा है। उससे यह समझने में और भी सुभीता हो जाता है
कि स्वयंप्रकाश जो भी कोई सुख है वह ब्रह्मतत्व ही है। सुषुप्ति
के समय सुख के ऊपर जो अज्ञान का ढकना पड़ा था उसी अज्ञान
में बुद्धि और मन लीन हो जाया करते हैं। विज्ञानमय और मनोमय
का विलीन हो जाना ही 'निद्रा' कहाती है। इसी को कोई-कोई
[Header] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९३
'अज्ञान' भी कह देते हैं। पिघला हुआ घी जैसे ठण्डक लगने
से गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार भोगदायी कर्मों के सम्पर्क से
यही अज्ञान गाढ़ा हो कर 'विज्ञानमय' हो जाता है। विलीन
अवस्था के उसी अज्ञान को 'आनन्दमय' कह देते हैं। सुषुप्ति से
पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धिवृत्ति होती है, उस बुद्धिवृत्ति में
जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को
अपने मुँह में पकड़े ही पकड़े वह वृत्ति निद्रा रूप से लीन हो
जाती है तब यही 'आनन्दमय' कहाने लगती है। वह जो अन्त-
र्मुख आनन्दमय है वह, चिदाभास से मिली हुई तथा अज्ञान से
पैदा हुई अति सूक्ष्म वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख को भोगा करता है।
जागरण में जब हम सुख भोगते हैं तब तो हमें यह याद भी रहता
है कि हम सुख भोग रहे हैं परन्तु उस [ निद्रा के ] समय ऐसा
विचार न होने का कारण भी सुनलो—वे अज्ञानवृत्तियाँ बहुत ही
सूक्ष्म होती हैं, वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट नहीं होतीं इसी से
सुषुप्ति में सुखभोग का स्पष्ट परिज्ञान नहीं होता। वेदान्त का
गम्भीर मनन करने वालों ने यह बात बतलायी है। माण्डूक्य
और तापनीय आदि उपनिषदों में तो बड़ी ही स्पष्ट भाषा में
'आनन्दमय' को भोगने वाला और 'ब्रह्मानन्द' को भोग्य कहा है।
जो आत्मा जागते समय मन, बुद्धि आदि अनेक रूप हो रहा था
वही अब सुषुप्ति के समय चावलों की पिट्ठी की तरह फिर एकता
को प्राप्त हो गया होता है। पहले जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थी अब
सुषुप्ति के समय उनका एक घनपिण्ड हो गया है—मानों पानी
का जम कर बर्फ़ बन गया हो। जिस प्रज्ञानघनता का वर्णन हमने
ऊपर किया है, इसी को बहुत से लोग दुःखाभाव कह बैठते हैं।
क्योंकि उस समय सम्पूर्ण दुःखवृत्तियों का विलोप हो जाता है।
उनकी यह एकदेशीय दृष्टि ही उनके भ्रम का कारण बन जाती
है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि अज्ञान में बिम्बित चैतन्य
से ही आनन्द का भोग तब हुआ करता है। अज्ञान के पर्दे के
कारण भोग्य के स्वरूप का पता हमें चलता ही नहीं। यदि उस
का पता चल जाता तो प्राणी को विषयों में भटकना ही न पड़ता।
इसी कारण भोग में आते हुए भी उस ब्रह्मसुख की अवहेलना
करके कर्मों के प्रताप से इस जीव को फिर फिर वाहर निकलना
ही पड़ता है किंवा यों कहो कि—जागना पड़ ही जाता है।
जब यह जीव सो कर उठता है तब कुछ काल तक उस भोगे
हुए ब्रह्मानन्द की बासना तो बनी ही रहती है। जभी तो वह
बिना किसी सुखदायी विषय के ही सुखी हो कर चुप चाप बैठा
रहता है। जिन कर्मों ने सुषुप्ति में से इसे जगा लिया था वे ही
कर्म फिर इस से संसार के नाना दुःखों की भावना कराने लगते
हैं। फिर यह अभागा प्राणी धीरे धीरे हाय ! हाय ! उस जगज्जी-
वन ब्रह्मानन्द को सर्वथा भूल ही जाता है। निद्रा के पीछे और
निद्रा के पहले सभी मनुष्यों को इस ब्रह्मानन्द में बड़ा स्नेह होता
है। हां इतना तो अवश्य है वे इस आनन्द का यह नाम नहीं
जानते हैं। इतना समझ चुकने पर हम समझते हैं कि कोई भी
समझदार इस आनन्द के विषय में विवाद तो नहीं करेगा। जो
ब्रह्मानन्द बड़े परिश्रम से मिला करता है, वही ब्रह्मानन्द आल-
सियों और सर्वसाधारण को मिला ही हुआ है, फिर आप गुरु और
शास्त्र की पख क्यों लगाते हो ? ऐसा यदि कोई पूछे तो हम
कहेंगे कि हां यदि सचमुच ही वे लोग यह पहचान जांय कि
यह ब्रह्मानन्द ही है तो वे अवश्य ही कृतार्थ हो जांय। परन्तु
गुरु और शास्त्र के बिना तो यह गम्भीर तत्व किसी की समझ में
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९५
आता ही नहीं। जब तक कोई इस ब्रह्ममार्ग का भेदिया साथ
न हो तब तक ब्रह्मदुर्ग पर अधिकार पाना सरल काम नहीं है।
प्रकृत बात तो यही हुई कि जहां जहां विषय न हों और
सुख होता हो वहां वहां इस ब्रह्मानन्द की 'वासना' को समझ लो।
विषयों के मिलने पर भी, जब कि उनकी इच्छा नहीं रह जाती
और मनोवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है, तब उसमें आनन्द का प्रति-
बिम्ब पड़ जाता है। बस इसी को 'विषयानन्द' जान लो। 'ब्रह्मा-
नन्द' 'वासनानन्द' और 'प्रतिबिम्ब' [विषयानन्द] इन तीन के
सिवाय तो इस जगत् में चौथा आनन्द है ही नहीं। इन तोनों
आनन्दों में भी यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यह स्वयं-
प्रकाश 'ब्रह्मानन्द' ही 'वासनानन्द' और 'विषयानन्दों' को यदा
तदा उत्पन्न कर देता है।
यहां तक श्रुति, युक्ति और अनुभव के सहारे से यह सिद्ध
किया गया है कि सुषुप्ति काल में यह स्वयंप्रकाश और चेतन
ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में उस ब्रह्मानन्द को कैसे
जानें ? सो भी सुन लीजिए—सुषुप्ति के समय जिस 'आनन्द-
मय' को हमने ऊपर बताया है, वही जब 'विज्ञानमय' हो जाता
है तब स्थानभेद के, कारण कभी जागरण और कभी स्वप्न में
पहुँच जाता है। नेत्र में 'जागरण' होता है, कण्ठ में 'स्वप्न'
होता है और हृदय कमल में 'सुषुप्ति' होती है। यह चेतन जब
जागता है तब पैरों से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त कर लेता है।
तपे हुए लोहपिण्ड के साथ जैसे अग्नि हिल मिल कर एक होजाती
है, इसी प्रकार इस देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त हुआ यह
चेतन, निश्चित रूप से यह मान बैठता है कि 'मैं तो मनुष्य हूँ'।
यह मनुष्य क्रम से 'उदासीन' 'सुखी' और 'दुःखी' इन तीन अव-
९६ पञ्चदशी
स्थाओं में रहने लगता है। इन तीनों अवस्थाओं में से सुख दुःख
की दो अवस्थायें कर्म से उत्पन्न हुआ करती हैं। परन्तु उदासी-
नता तो किसी भी कर्म से उत्पन्न नहीं होती [ वह तो स्वाभाविक ही
होती है ]। बाह्य पदार्थों के भोग से या फिर मनोराज्य से भिन्न
भिन्न प्रकार के सुख दुःख होते हैं। परन्तु कभी कभी ऐसा भी
होता है कि उस समय न तो सुख ही होता है और न दुःख ही।
उस समय निजानन्द की धुंधली प्रतीति सब ही को होती है।
उस समय प्रायः सभी यह कहा करते हैं कि आज मुझे कुछ भी
चिन्ता नहीं है। आज तो मैं सुखपूर्वक बैठा हूँ। 'मैं सुखपूर्वक'
हूँ' इस प्रकार सूक्ष्म अहंकार से ढका रहने के कारण ही इस
आनन्द को हम मुख्यानन्द नहीं कह सकते। इसे तो मुख्य
आनन्द की वासना समझना चाहिए, जो कि अहंकार के छनने
में को छन कर हमें अस्पष्ट दीख रही है—जो अपनी ओर को
हमारा विशेष ध्यान नहीं खींच सकी है। जिस घड़े के अन्दर
जल भर रहा हो उस के बाहर जो शीतलता आजाती है वह शीत-
लता जल नहीं होती, किन्तु वह तो जल का गुण होता है। उस
शीतलता को देखकर जल का तो अनुमान ही हो जाता है। इसी
प्रकार यह उदासीनता का सुख ही 'ब्रह्मानन्द' नहीं है। यह तो
'ब्रह्मानन्द' की वासना है। इस वासना से तो 'ब्रह्मानन्द' का अनु-
मान होता है। निरोध समाधिका अभ्यास करने से जितना इस
अहंकार का विस्मरण होता जायगा, योगी की दृष्टि उतनी ही सूक्ष्म
होने लगेगी और उसी परिमाण से योगी को निजानन्द का अनु-
भव भी होने लग पड़ेगा। जब अहंकार का विस्मरण पूर्ण रूप से हो
जाता है, तब यह परमसूक्ष्म होकर रहता है—लीन नहीं होता—
इस कारण इस अवस्था को निद्रा नहीं कह सकते। यही कारण
है कि साधक का देह गिर नहीं जाता । गीता के छठे अध्याय में
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप . ९७
है कि साधक का देह गिर नहीं जाता । गीता के छठे अध्याय में
भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा है कि—जिस समय द्वैत का भान
बन्द हो जाय और नींद भी न आये, उस समय जो सुख किसी
को प्रतीत होता हो बस वही ब्रह्मानन्द कहाता है । साधक को
चाहिए कि धीर बुद्धि के सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की
साधना किया करे और जब मन को आत्मसंस्थ कर चुके—जब
मन को यह निश्चय कराया जा चुके कि यह सब कुछ आत्मा ही
है, उससे भिन्न यह कुछ भी नहीं है—ऐसी अवस्था जब आजाय
फिर सब कुछ सोचना बन्द कर दे । यही योग की अन्तिम स्थिति
है । ऐसी उच्च स्थिति पाने की विधि यह है कि—जो मन स्वभाव-
दोष से चंचल है अस्थिर है, जो किसी एक विषय के साथ बंध
कर कभी नहीं ठहरता, ऐसा मन जिस कारण से बाहर निकला
हो, उसकी ओर से उसे रोक कर, उस के दोष उसे दिखा कर,
उसे वैराग्य का उपदेश दे दे कर, वहां से हटा ले और आत्मा के
बस में करता जाय । इस प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास
के प्रताप से आत्मा में ही शान्त हो जाता है । जब इस योगी
का मन शान्त हो जाता है, जब इसका रजोगुण नष्ट हो जाता
है, जब वह निष्पाप हो जाता है, तब उसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति
हो जाती है, तभी उसे उत्तम सुख मिलता है ।
जिस समय चित्त योगसेवा करते करते रुक कर आराम पा लेता
है, जब अपने आप से अपने आप को देख कर मग्न होने लगता
है, जिस समय आत्मा में स्थित हुआ योगी अनन्त तथा बुद्धिग्राह्य
अतीन्द्रिय और अपूर्व सुख का अनुभव किया करता है, जब वह
योगी आत्मतत्व को कभी नहीं भूलता, जिस आत्मा को पाकर दूसरे
लाभ तुच्छ दीखने लगते हैं, जहां पहुँच कर योगी दुःखों के पर्वत
९८ पंचदशी :
गिर पड़ने पर भी प्रह्लाद की तरह विचलित नहीं होता है, बस
दुःखों के संयोग को छुड़ा देने वाली इस पुण्य अवस्था को ही
'योग' कहते हैं। ऐसे योग को निर्वेदरहित मन से बड़ी लगन से
करना चाहिए। जब कोई योगी इस रीति से सदा आत्मा को
योग में लगाए रहेगा, तब उसके योगविघ्न भाग जांयगे। फिर तो
बिना ही परिश्रम के उसे ब्रह्मसुख मिल जायगा। समुद्रजल को
अपनी चोंच से सींच कर समुद्र सुखाने के लिए जितना धीरज
टिट्टिभी ने धारण किया था, उतना धीरज कोई योग के लिए
धारण करे तो उसके मन का निग्रह हो सकता है।
मैत्रायणी शाखा में योग की विधियां लिखी हैं कि जैसे
बेईंधन की आग अपने कारण में शान्त हो जाती है, इसी प्रकार
जब वृत्तियें नहीं रह जातीं तब यह चित्त अपने कारण में शान्त
हो जाता है। जो मन अपने कारण में शान्त हो चुका है, जो मन
अब इन्द्रियार्थों की ओर को देखता भी नहीं है, ऐसे मन की दृष्टि
में कर्मवश से मिलने वाले सुखादि पदार्थ मिथ्या समझ लिए जाते
हैं। यह एक अनादिसिद्ध रहस्य है कि चित्त ही संसार है इस
कारण उस चित्त को शोध कर रखना चाहिए। जिसका चित्त
जिसमें पड़ा रहता है वह प्राणी तन्मय हुआ रहता है। चित्त
में जब प्रसाद आजाता है तब शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
प्रसन्नचित्त वाला पुरुष जब आत्मा में स्थित होता है तब उसे
अक्षय्य सुख मिल जाता है। इस मायामोहित प्राणी का चित्त
जैसे विषयों में आसक्त हो रहा है वैसे यदि ब्रह्मतत्व की ओर को
झुक जांय तो फिर कौन है जो बन्धन से छुटकारा न पा जाय ?
मन दो प्रकार का होता है एक शुद्ध दूसरा अशुद्ध । कामना
के मेल से मन में अशुद्धता आ जाती है। जब यही मन कामना
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९९
से हीन हो जाता है तब उसे 'शुद्ध मन' कहते हैं । मनुष्यों के
बन्ध और मोक्ष का कारण यह मन ही है । विषयों में आसक्त
मन मनुष्य को बँधवा देता है । निर्विषय बने हुए मन से मनुष्य
को मुक्ति मिल जाती है । जिस चित्त को आत्मा में लगा दिया
जाता है, जिस चित्त के रजस्तमोमल समाधिरूपी जल से धो
दिये जाते हैं, उस चित्त को समाधि में जो आनन्द आता है,
उसका वर्णन वाणी से किया ही नहीं जा सकता । क्योंकि वह
तो एक अलौकिक ही सुख है । वाणी आदि लौकिक साधन
उसे कैसे दिखा सकेंगे ? उसे तो मौन की अमानवी भाषा में ही
समझना होगा । वह स्वरूपभूत सुख तो अन्तःकरण से ही ग्रहण
किया जा सकता है । यद्यपि हरएक साधक मन को चिरकाल
तक आत्मा में स्थिर नहीं कर सकता, फिर भी यदि किसी को
क्षणभर की समाधि भी होने लगे तो उसे अगाध ब्रह्मानन्द समुद्र
का निश्चय तो हो ही जाता है । जो श्रद्धालु हैं, जिन्हें इसकी
चाट लग जाती है, उन्हें तो इसका निश्चय होकर ही रहता है ।
एक बार जब उन्हें निश्चय हो जाता है तब फिर वे सदा ही उस
पर विश्वास किये रहते हैं । जिनको एक बार भी इस तत्व का
निश्चय हो जाता है वे लोग उदासीनता के समय आने वाली
आनन्द की वासना को 'दूर हट' कह देते हैं और तब भी इस
मुख्य ब्रह्मानन्द की भावना को बड़ी तत्परता से किया करते हैं ।
परपुरुष के व्यसन वाली नारी की तरह बाह्य व्यापार करता हुआ
भी धीर पुरुष, जब एक बार भी इस तत्व में विश्राम पा लेता है,
तब सदा इसी आनन्द को चखता रहता है । 'धीर' हम उसी को
कहते हैं कि जब इन्द्रियां विषयों की ओर को जाने को जोर
जबरदस्ती करने लगें तब भी जो आत्मानन्द के आस्वाद की इच्छा
१०० पञ्चदशी
से उन सब को डाट बता कर उसी की चिन्ता में लगा रहे।
बोझा उठाने वाला पुरुष जब सिर के बोझ को उतार कर फेंक
देता है, उस समय उसे जैसा विश्राम मिलता है, संसार की खट-
पट के छूट जाने से जब वैसी बुद्धि किसी की हो जाय, तब उसे
ही हम 'विश्राम पाना' कहते हैं। इस तत्व में विश्राम पा लेने
वाले पुरुष की ऐसी अवस्था हो जाती है कि वह उदासीनकाल
में जैसे आनन्दतत्पर रहता है, ठीक उसी तरह सुख दुःख के
कारणों या सुख दुःखों के प्राप्त होने पर भी उसी लगन से
आत्मानन्द का स्वाद लेता रहता है। वह शरीर को सुख दुःख
भोगने देता है और मन से ब्रह्मानन्द को चखता रहता है। संसार
के जो कोई विषय ब्रह्मानन्द का अनुसन्धान नहीं करने देते,
उनकी ओर से तो वह इतना लापरवाह हो जाता है जैसे कोई
सती होने वाली स्त्री शृङ्गार की ओर से लापरवाह हो गई हो।
ॅ धीर पुरुष की बुद्धि तो कन्वे की आंख की तरह कभी आत्मानन्द
को भोगती और कभी आत्मानन्द का विरोध न करने वाले संसारी
सुखों का अनुभव किया करती है। कव्वे की एक ही पुतली होती
है, वही कभी दाहिनी आंख में और कभी बांयी आंख में आया
जाया करती है, इसी प्रकार तत्वज्ञानी की मति दोनों आनन्दों में
चक्कर लगाती रहती है। 'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों
आनन्दों को भोगने वाला तत्वज्ञानी तो दुभाषिये की तरह का
होता है। दुभाषिया जैसे दोनों की बात समझ लेता है ऐसे ही
तत्वज्ञानी 'लौकिक' और 'वैदिक' दोनों आनन्दों को लूटा करता
है। जो पुरुष आधा गंगाजल में डूब रहा हो और आधा धूप में
खड़ा हो वह जैसे सर्दी गर्मी दोनों को एक साथ अनुभव किया
करता है इसी प्रकार दुखों से उसे उद्वेग नहीं होता क्योंकि उसी
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप १०१
समय उसे वह महानन्द भी तो मिल ही रहा है। वह तो अब
दो दृष्टि वाला हो गया है। विपत्ति के पहाड़ टूटने पर भी वह
वैदिक ब्रह्मानन्द को याद करके उद्विग्न नहीं हो पाता है।
इस प्रकार जागरण काल में चाहे तो दुःखानुभव हो रहा हो
चाहे सुखानुभव होता हो, और चाहे वह उदासीन होकर चुप-
चाप बैठा हो, तत्वज्ञानी को सदा ही ब्रह्मानन्द दीखा करता है।
इतना ही नहीं, इस जागरण की वासना से जो सपने बनते हैं
उनमें भी उसको ब्रह्मसुख भासने लग पड़ता है। सपने आनन्द-
वासना से भी आते हैं और अविद्यावासना से भी आते हैं। जब
इस ज्ञानी को अविद्यावासना के स्वप्न आयेंगे तब इसे भी अज्ञा-
नियों की तरह सुख दुःख देखना पड़ेगा ही।
सुषुप्ति अवस्था में, उदासीन काल में, समाधि भावना के
समय तथा सुख दुःख भोगते हुए भी स्वयंप्रकाश ब्रह्मानन्द को
प्रकाशित करने वाला योगी का प्रत्यक्ष कैसा होता है वह इस
प्रकरण में बताया गया।
12. Atmananda
[ १२ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप
योगी लोग तो योग के द्वारा निजानन्द को पा ही लेंगे, पर
जिनकी योग में गति नहीं है वे इस आत्मानन्द को कैसे जानें ?
इसी प्रश्न का उत्तर यह है कि हम चाहे जितनी उदारता दिखायें
सर्वसाधारण तो इस गहन बात को समझ ही नहीं सकेंगे । इस
मार्ग द्वारा उनका तिल भर भी उपकार नहीं हो सकेगा । वे जिस
प्रवृत्ति मार्ग में लगे हैं उनके लिए वही ठीक है । प्रवृत्ति मार्ग की
दुःखपरम्परा से ही तो आत्मजिज्ञासा जागा करती है । संसारनदी
के प्रवाह को रोक कर खड़ी हो जाने वाली बाधायें जब तक
किसी के सामने आकर खड़ी नहीं हो जातीं तब तक किसी के
भी हटाने से प्रवृत्ति मार्ग छोड़ा नहीं जाता । यह तो अपने अनु-
भव से ही शिक्षा मिलने पर छूटता है और तब निवृत्ति आकर ज्ञान
की उत्पत्ति कर देती है । प्रवृत्ति से जिज्ञासा होती है और निवृत्ति
से ज्ञान हो जाता है । यों आप उन प्रवृत्तिमार्गियों को व्यर्थ फँसा
हुआ मत समझो । इस संसार नाम की पाठशाला में सभी अपनी
अपनी शक्ति के अनुसार शिक्षण ले रहे हैं । इसमें जल्दी का
प्रश्न थोड़ा सा भी नहीं है । उन्हें तो उनके अधिकार के अनुसार
कर्म या उपासना में ही लगा देना श्रेयस्कर होगा । हर किसी
को आत्मानन्द की बात बताना ठीक नहीं है । आवश्यकता से
पहले दी हुई चीज़ से लाभ के स्थान में हानि होती है । हां,
ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०३
जो तो मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु हों उनको निम्न रीति से आत्मानन्द का
बोध करा देना चाहिए। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी इसी श्रेणी
की थी। याज्ञवल्क्य ने उसे जिस रीति से समझाया था उस ही
रीति से उसको भी समझा देना पर्याप्त होगा। याज्ञवल्क्य ने कहा
था कि—अरे मैत्रेयी ! अपने जी से ही पूछ लो—तुमको स्वयं
पति के लिए तो पति प्रिय नहीं होता है। पति, पत्नी, पुत्र, वित्त,
पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव, वेद, भूत, और सभी कुछ
अपने मतलब से ही तो प्रिय हो जाते हैं। इनमें से एक भी तो
पदार्थ स्वरूप से प्यारा नहीं है। जितनी भी प्रीतियां हैं वे सब
एकपक्षीय [एकतर्फ़ा] होती हैं—जब किसी पत्नी को भोग की
इच्छा होती है तब ही वह अपने पति से प्यार करने लगती है।
परन्तु उसका पति भूखा हो, किसी काम में लगा हो, रोगग्रस्त
हो, तो वह उसे नहीं चाहता। तब उसे प्रेम का उत्तर नहीं
मिलता। ऐसी अवस्था में तो पत्नी का प्रेम एकपक्षीय सिद्ध होता
है। उसका यह प्रेम, पति के लिए है ही नहीं। यह तो स्वार्थ
के लिए ही है। यदि उसका यह प्रेम पति के लिए होता तो
पति किसी भी अवस्था में होकर उस प्रेम का अभिनन्दन [स्वागत]
करता। उधर पति का भी यही हाल होता है—वह भी जब
अपनी पत्नी से प्रेमालाप करता है तब अपने ही मतलब से करता
है। उसका प्रेम भी पत्नी के निमित्त नहीं होता। जब तो दोनों
ओर से एक साथ ही प्रेम उमड़ पड़ा हो, तब भी यही उपर्युक्त
विश्लेषण काम दे सकता है। दोनों ही प्रेमी अपनी इच्छा को
लेकर प्रवृत्त हुआ करते हैं। देखा जाता है कि—दाढ़ी मूँछ की
कीलें चुभ रही हैं, बालक रो रहा है, तौ भी प्रेमी पिता बालक
को चूमता ही जाता है। उसके चिल्लाने पर भी उसे छोड़ना
१०४ पञ्चदशी
नहीं चाहता। क्या कोई भी इस प्रेम को बालक के लिए किया
हुआ प्रेम कह सकेगा ? पिता का यह प्रेम स्पष्ट ही एकपक्षीय
प्रेम है। यह तो अपनी तुष्टि के लिए ही किया गया है। जिस जड
रत्न को कुछ भी इच्छा नहीं है, उसकी जब यत्न से रक्षा की जाती
है तब इस प्रेम को भी तो स्वार्थ ही समझ लो। क्या कोई इस
प्रेम को रत्नार्थ प्रेम कह सकता है ? बैल नहीं चाहता कि मैं
बोझ ढोऊँ। हमने उसे ज़बरदस्ती इस काम के लिए क़ैद कर
रक्खा है। उस बैल पर हम प्रेम करते हैं। क्या इस प्रेम को
कोई बैल के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा। यह प्रेम तो
स्पष्ट ही हमारे लिए है। ब्राह्मणत्वमूलक पूजा से जब हमें प्रसन्नता
होती है तब यह सन्तुष्टि ब्राह्मण जाति की नहीं स्वयं अपनी ही
होती है। जब हम स्वर्ग या ब्रह्मलोक को पाना चाहते हैं तब
हमारा उद्देश्य इन लोकों का उपकार करना नहीं होता। किन्तु
अपना भोग ही उसका लक्ष्य होता है। हम विष्णु आदि देवताओं
की पूजा अपने पापनाश के लिए करते हैं। निष्पाप देवताओं को
तो उसकी कुछ दर्कार ही नहीं होती। यह तो स्वार्थ के लिए ही
की जाती है। 'हम व्रात्य् न हो जायँ' इसी उद्देश्य से तो हम
वेदों को पढ़ते हैं, वेद तो व्रात्य हो ही नहीं सकते । स्थान,
तृषा, पाक, शोषण और अवकाश की आवश्यकता होती है
इसी से तो हम पांचों भूतों को चाहते हैं। यहाँ भी हमारा स्वार्थ
(मतलब) ही मुख्य होता है। कहाँ तक कहते जायें, सभी कुछ
अपने मतलब से प्रिय होता है। जब सब कामों में अपनी ही
प्रधानता है तब यह हमारा स्पष्ट कर्त्तव्य हो जाता है कि हम
अपने आपे के बारे में ही बुद्धि को दृढ़ कर डालें।
अब प्रश्न होता है कि—यह उपर्युक्त आत्मप्रेम कैसा है ?
ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०५
यह राग तो है नहीं, वह तो स्त्री आदि नियत विषयों में ही
होता है । वह श्रद्धा भी नहीं है, वह तो यागादि में ही परिमित
रहती है । वह भक्ति भी नहीं है, भक्ति तो गुरु देवादि तक ही
चलती है । वह इच्छा भी नहीं है, इच्छा तो अप्राप्त पदार्थ की
ही होती है ? इसका समाधान यह है कि—वह आत्मप्रेम तो
एक प्रकार की केवल सुख ही को विषय करने वाली सात्विक
वृत्ति ही है । उस प्रेम को तो सत्वगुण से बनी हुई केवल सुख
के साथ नथी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो । इस प्रीति
को इच्छा नहीं कह सकते, क्योंकि प्राप्त, नष्ट और अप्राप्त तीनों
ही विषय में यह रहती है । इच्छा तो केवल अप्राप्त की ही रहती
है । अन्नपान आदि हमारे सुख के साधन हैं, इसलिए जैसे वे
प्रिय हैं, आत्मा को भी यदि इस प्रकार से सुख का साधन होने
से ही प्रिय मानोगे, तो यह बताना पड़ेगा, कि यह आत्मा किस
के सुख का साधन है ? इस आत्मा से किसको खुश करना है ?
आत्मा स्वयं ही आत्मा को प्रसन्न करे, इसमें अपने कन्धे पर
चढ़ बैठने वाला 'कर्मकर्तृविरोध' आता है । विषयजन्य जितने
भी सुख हैं उनमें तो साधारण सी प्रीति प्राणी को होती है, परन्तु
आत्मा तो अतिप्रिय होता है । यह प्रीति विषयसुख में कभी
कभी नहीं भी रहती—कभी कभी विषयसुख को छोड़ कर चली
भी जाती है—परन्तु आत्मा में प्रीति न रहे यह तो कभी हो ही
नहीं सकता । प्राणी का स्वभाव है कि वह एक विषयसुख से
प्रेम करना छोड़ देता है दूसरे विषयसुख से नेह का नाता जोड़
लेता है । परन्तु यह आत्मतत्त्व तो छोड़ा या पकड़ा जाने वाला
ही नहीं है । फिर उसमें प्रेम का व्यभिचार कैसे हो ? लेना या
छोड़ना जिसमें नहीं है, उसकी कोई उपेक्षा ही कैसे कर सकेगा ?