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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 693

ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०५
यह राग तो है नहीं, वह तो स्त्री आदि नियत विषयों में ही
होता है । वह श्रद्धा भी नहीं है, वह तो यागादि में ही परिमित
रहती है । वह भक्ति भी नहीं है, भक्ति तो गुरु देवादि तक ही
चलती है । वह इच्छा भी नहीं है, इच्छा तो अप्राप्त पदार्थ की
ही होती है ? इसका समाधान यह है कि—वह आत्मप्रेम तो
एक प्रकार की केवल सुख ही को विषय करने वाली सात्विक
वृत्ति ही है । उस प्रेम को तो सत्वगुण से बनी हुई केवल सुख
के साथ नथी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो । इस प्रीति
को इच्छा नहीं कह सकते, क्योंकि प्राप्त, नष्ट और अप्राप्त तीनों
ही विषय में यह रहती है । इच्छा तो केवल अप्राप्त की ही रहती
है । अन्नपान आदि हमारे सुख के साधन हैं, इसलिए जैसे वे
प्रिय हैं, आत्मा को भी यदि इस प्रकार से सुख का साधन होने
से ही प्रिय मानोगे, तो यह बताना पड़ेगा, कि यह आत्मा किस
के सुख का साधन है ? इस आत्मा से किसको खुश करना है ?
आत्मा स्वयं ही आत्मा को प्रसन्न करे, इसमें अपने कन्धे पर
चढ़ बैठने वाला 'कर्मकर्तृविरोध' आता है । विषयजन्य जितने
भी सुख हैं उनमें तो साधारण सी प्रीति प्राणी को होती है, परन्तु
आत्मा तो अतिप्रिय होता है । यह प्रीति विषयसुख में कभी
कभी नहीं भी रहती—कभी कभी विषयसुख को छोड़ कर चली
भी जाती है—परन्तु आत्मा में प्रीति न रहे यह तो कभी हो ही
नहीं सकता । प्राणी का स्वभाव है कि वह एक विषयसुख से
प्रेम करना छोड़ देता है दूसरे विषयसुख से नेह का नाता जोड़
लेता है । परन्तु यह आत्मतत्त्व तो छोड़ा या पकड़ा जाने वाला
ही नहीं है । फिर उसमें प्रेम का व्यभिचार कैसे हो ? लेना या
छोड़ना जिसमें नहीं है, उसकी कोई उपेक्षा ही कैसे कर सकेगा ?