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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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उनकी यह एकदेशीय दृष्टि ही उनके भ्रम का कारण बन जाती
है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि अज्ञान में बिम्बित चैतन्य
से ही आनन्द का भोग तब हुआ करता है। अज्ञान के पर्दे के
कारण भोग्य के स्वरूप का पता हमें चलता ही नहीं। यदि उस
का पता चल जाता तो प्राणी को विषयों में भटकना ही न पड़ता।
इसी कारण भोग में आते हुए भी उस ब्रह्मसुख की अवहेलना
करके कर्मों के प्रताप से इस जीव को फिर फिर वाहर निकलना
ही पड़ता है किंवा यों कहो कि—जागना पड़ ही जाता है।
जब यह जीव सो कर उठता है तब कुछ काल तक उस भोगे
हुए ब्रह्मानन्द की बासना तो बनी ही रहती है। जभी तो वह
बिना किसी सुखदायी विषय के ही सुखी हो कर चुप चाप बैठा
रहता है। जिन कर्मों ने सुषुप्ति में से इसे जगा लिया था वे ही
कर्म फिर इस से संसार के नाना दुःखों की भावना कराने लगते
हैं। फिर यह अभागा प्राणी धीरे धीरे हाय ! हाय ! उस जगज्जी-
वन ब्रह्मानन्द को सर्वथा भूल ही जाता है। निद्रा के पीछे और
निद्रा के पहले सभी मनुष्यों को इस ब्रह्मानन्द में बड़ा स्नेह होता
है। हां इतना तो अवश्य है वे इस आनन्द का यह नाम नहीं
जानते हैं। इतना समझ चुकने पर हम समझते हैं कि कोई भी
समझदार इस आनन्द के विषय में विवाद तो नहीं करेगा। जो
ब्रह्मानन्द बड़े परिश्रम से मिला करता है, वही ब्रह्मानन्द आल-
सियों और सर्वसाधारण को मिला ही हुआ है, फिर आप गुरु और
शास्त्र की पख क्यों लगाते हो ? ऐसा यदि कोई पूछे तो हम
कहेंगे कि हां यदि सचमुच ही वे लोग यह पहचान जांय कि
यह ब्रह्मानन्द ही है तो वे अवश्य ही कृतार्थ हो जांय। परन्तु
गुरु और शास्त्र के बिना तो यह गम्भीर तत्व किसी की समझ में