पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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करना ही, उस तत्व को ग्रहण करना कहाता है।
जब यह सर्वग्रह—जिसे तुम अनादि काल से करते आ रहे हो—
रुक जायगा उस समय जो अनुपम सत्य तत्व शेष रह जायगा,
वही तो यह है। उस तत्व को जानने के लिये आपको किसी भी
प्रमाण से सहायता लेनी नहीं पड़ेगी। क्योंकि वह तत्व तो स्वयं
प्रकाश है। वैसी स्वयंप्रकाश वस्तु को समझना हो तो किसी
अनुभवी के मुख से श्रुति का पठन करो। अनुवादों के पढ़ने से
वह बात मिलने वाली नहीं है। जो जिस मार्ग की यात्रा कर
लेता है उसके मर्म का वही सच्चा जानकार होता है वही दूसरे
को भी सच्चा मार्ग दिखा सकता है। मुरदा पुस्तकों को पढ़
लेने से बात का मर्म हाथ नहीं लगता। इस कारण अनुभवी गुरु
की आवश्यकता होती ही है।
यदि तो मन्दाधिकारी लोग उपर्युक्त सर्वग्रह का त्याग न
कर सकें तो वे बुद्धि की शरण में पहुँच जांय। बुड्ढे लोग
जैसे लकड़ी के सहारे से चलते हैं इसी प्रकार वे लोग बुद्धि के
सहारे से इसी साक्षी तत्व को पहचानें, कि यह बुद्धि जिस किसी
बाह्य या आन्तर पदार्थ की कल्पना करती है उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परात्मा बुद्धि के अधीन होता है। यों बुद्धि का
हाथ पकड़ कर इस गहन तत्व को वे लोग भी टटोल लें।