Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 678 of 726

Read in context
Page 678

९० पञ्चदशी
ही ऐसा तत्व है जिसे जानकर शोक का पार पाया जा सकता है,
सो आप सुख को ही जान लें। सुख के विषय में भी यह बात
विशेष रूप से जाननी पड़ेगी कि—यह जो वैषयिक सुख है इसे
तो हम सुख ही नहीं मानते हैं। क्योंकि इस पर तो हज़ारों शोक-
रूपी श्वापदों की वक्र दृष्टि पड़ी ही हुई है। वे तो सदा ही इस
वैषयिक सुख को नोचते रहते हैं। इसे तो सुख न कहकर दुःख
ही कहें तो भला है। यह तो ठीक है कि अद्वैत में भी सुख नहीं
है परन्तु आपको यह मालूम हो जाना चाहिये कि सुख तो स्वयं अद्वैत
ही है। स्वयंप्रकाश होने के कारण उसके लिये प्रमाण की दरकार
भी नहीं है। सुषुप्ति के समय इन्द्रियां नहीं होती हैं, जिनसे उसे
जान सकें, फिर भी सुषुप्ति को सब मानते ही हैं। जानते हो
ऐसी विचित्र बात क्यों है ? बिना प्रमाण की वस्तु को क्यों माना
जाता है ? सुनो इसका कारण सुषुप्ति की स्वयंप्रकाशता ही तो
है। उस सुषुप्ति के समय कुछ भी दुःख नहीं होता। उस समय
केवल सुख नाम की वस्तु ही शेष रह जाती है। उस समय कोई
भी विरोधी दुःख नहीं रहता, इस कारण उस समय सुख मानने
में कोई विघ्न नहीं है। जागते समय के अनेक व्यापारों से थक-
कर जब दुःखदायी प्रसंग टल जाता है तब वह प्राणी स्वस्थचित्त
होता है। उस समय ही उसे मृदुशय्या आदि से मिलने वाले
सुख का अनुभव होता है। विषयोपार्जन करता करता तंग हो
कर जब उस दुःख को हटाने के लिये कोमल शय्या पर लेट
जाता है तब उसकी बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है। अन्तर्मुख हुई
उस बुद्धिवृत्ति में सामने रक्खे हुए दर्पण की तरह स्वरूपभूत जो
आत्मानन्द है, वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। बस इसी को तो
'विषयानन्द' कहते हैं। यह विषयानन्द त्रिपुटी के ही अधीन