पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextपंचदशी ८८
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से छुटकारे का दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। देव को जानकर
ही फांसा खुल जाता है। क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर जन्म
लेना नहीं पड़ता। जो धीर पुरुष देव को जान लेता है वह इसी
जन्म और इसी लोक में हर्ष शोक से छूट जाता है। किये या
बेकिये पुण्य पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते।” उपर्युक्त
श्रुतियों में ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि और आनन्द की प्राप्ति
दोनों ही बातों की घोषणा की गयी है।
आनन्द के मुख्य तीन भेद हैं एक ‘ब्रह्मानन्द’ दूसरा ‘विद्या-
नन्द’ तीसरा ‘विषयानन्द’। सबसे पहले ब्रह्मानन्द का विवेचन
करेंगे—
भृगु के पिता वरुण ने उसको ब्रह्म का लक्षण बताया कि
‘जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे से जीते हैं
तथा मरते समय जिसमें लीन हो जाते हैं वह ब्रह्म है।’ इस
लक्षण को जब उसने अन्न, प्राण, मन और बुद्धि में घटाकर देखा
तब उसे यह निश्चय हो गया कि ये ब्रह्मतत्व नहीं है। अन्त में
जाकर इसी लक्षण के सहारे से उसे आनन्द के ही ब्रह्म होने का
निश्चय हुआ। क्योंकि आनन्द से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं उसी
से जीते हैं और उसी में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण आनन्द
ही ब्रह्मतत्व है। इसमें फिर उसे संशय नहीं रहा।
भूतों के उत्पन्न होने से पहले [त्रिविध द्वैत के न होने से]
भूमा परमात्मा ही था। क्योंकि प्रलय काल में ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयरूपी
त्रिविध द्वैत होता ही नहीं। उस परमात्मा में से जब विज्ञानमय
उत्पन्न हुआ तब वह ‘ज्ञाता’ हो गया। जब मनोमय उत्पन्न हुआ
तब ‘ज्ञान’ होने लगा। जब शब्दादि विषय उत्पन्न हुए तब वे ‘ज्ञेय’
हो गये। ये तीनों ही उत्पत्ति से पहले नहीं थे। आप उस अवस्था