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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 680

९२ पंचदशी

सभी प्राणी दिन रात दुःखी बने रहते हैं—वे सुखी कभी नहीं होते।
इस कारण इन तीन का ही दृष्टान्त हमने दिया है। अब प्रकृत
बात तो यही हुई कि—यह सोता हुआ प्राणी भी इन ही तीनों
की तरह ब्रह्मानन्द में तत्पर रहता है उसे स्त्री से आलिंगित कामी
की तरह अन्दर बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं रह जाता। उस
अवस्था के विषय में श्रुति ने कहा है कि—उस समय पिता पिता
नहीं रहता। अर्थात् जीव का जीवभाव ही उतने समय के लिये
खोया जाता है। उस समय तो जीव ब्रह्मतत्व ही हो गया होता
है। क्योंकि संसारिपन का तो कोई चिह्न ही उस समय नहीं रह
जाता। जानते हो सुख दुःख देने वाली वस्तु क्या है ? सुनो !
पितापन आदि का अभिमान ही सुख दुःख का कारण हुआ
करता है। सुषुप्ति जब आती है तब यही अभिमान नहीं रह जाता
और यह प्राणी उस समय सब शोकसरिताओं के पार पहुँच गया
होता है। जब कोई पुरुष सोकर उठता है तब कहता है कि मैं
सुखपूर्वक सोया और मैंने कुछ भी नहीं जाना। अर्थात् वह उस
समय सुख और अज्ञान दोनों को जान रहा था। चित्स्वरूप होने
के कारण सोते समय सुख तो स्वयं ही प्रतीत हो जाता है। उसी
स्वयंप्रकाश सुख पर जो अज्ञान का पर्दा पड़ा है, उस की
प्रतीति भी उस सुख के सहारे से ही हो जाती है। वाजसनेयी
शाखा वालों ने सुख विज्ञान और आनन्द इन तीनों को एक ही
बात कहा है। उससे यह समझने में और भी सुभीता हो जाता है
कि स्वयंप्रकाश जो भी कोई सुख है वह ब्रह्मतत्व ही है। सुषुप्ति
के समय सुख के ऊपर जो अज्ञान का ढकना पड़ा था उसी अज्ञान
में बुद्धि और मन लीन हो जाया करते हैं। विज्ञानमय और मनोमय
का विलीन हो जाना ही 'निद्रा' कहाती है। इसी को कोई-कोई