Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 686 of 726

Read in context
Page 686

९८ पंचदशी :
गिर पड़ने पर भी प्रह्लाद की तरह विचलित नहीं होता है, बस
दुःखों के संयोग को छुड़ा देने वाली इस पुण्य अवस्था को ही
'योग' कहते हैं। ऐसे योग को निर्वेदरहित मन से बड़ी लगन से
करना चाहिए। जब कोई योगी इस रीति से सदा आत्मा को
योग में लगाए रहेगा, तब उसके योगविघ्न भाग जांयगे। फिर तो
बिना ही परिश्रम के उसे ब्रह्मसुख मिल जायगा। समुद्रजल को
अपनी चोंच से सींच कर समुद्र सुखाने के लिए जितना धीरज
टिट्टिभी ने धारण किया था, उतना धीरज कोई योग के लिए
धारण करे तो उसके मन का निग्रह हो सकता है।
मैत्रायणी शाखा में योग की विधियां लिखी हैं कि जैसे
बेईंधन की आग अपने कारण में शान्त हो जाती है, इसी प्रकार
जब वृत्तियें नहीं रह जातीं तब यह चित्त अपने कारण में शान्त
हो जाता है। जो मन अपने कारण में शान्त हो चुका है, जो मन
अब इन्द्रियार्थों की ओर को देखता भी नहीं है, ऐसे मन की दृष्टि
में कर्मवश से मिलने वाले सुखादि पदार्थ मिथ्या समझ लिए जाते
हैं। यह एक अनादिसिद्ध रहस्य है कि चित्त ही संसार है इस
कारण उस चित्त को शोध कर रखना चाहिए। जिसका चित्त
जिसमें पड़ा रहता है वह प्राणी तन्मय हुआ रहता है। चित्त
में जब प्रसाद आजाता है तब शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
प्रसन्नचित्त वाला पुरुष जब आत्मा में स्थित होता है तब उसे
अक्षय्य सुख मिल जाता है। इस मायामोहित प्राणी का चित्त
जैसे विषयों में आसक्त हो रहा है वैसे यदि ब्रह्मतत्व की ओर को
झुक जांय तो फिर कौन है जो बन्धन से छुटकारा न पा जाय ?
मन दो प्रकार का होता है एक शुद्ध दूसरा अशुद्ध । कामना
के मेल से मन में अशुद्धता आ जाती है। जब यही मन कामना