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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ८९
का ध्यान कीजिये—जबकि ये उपर्युक्त तीनों हा नहीं थे, यदि
आप उस अवस्था में जाने का साहस कर सकते हों तो सुनिये—
उस अवस्था में एक द्वैतरहित पूर्ण पदार्थ अनुभव में आता ही
है। द्वैतरहित पूर्ण पद को देखना हो तो यहां लोक में वर्तमान
काल में भी देख लो कि समाधि के समय निर्द्वैत पूर्ण आत्मा का
अनुभव विद्वान् को होता ही है। सुषुप्ति और मूर्च्छा में उस निर्द्वैत
पूर्ण तत्व का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ ही करता है। सुषुप्ति
आदि के समय इस पूर्ण पद के टुकड़े कर डालने वाली वस्तु नहीं
रह जाती और यों उस समय आत्मा में आत्मा की पूर्णता आ ही
जाती है। इसी प्रकार सृष्टि बनने से पहले भी,भेदक उपाधि के न
रहने के कारण,वह परात्मा उस समय पूर्ण का पूर्ण ही रहता है।
पुराण सहित पांचों वेदों और सकल शास्त्रों को जानकर भी
केवल अनात्मज्ञ होने के कारण नारद बड़ा ही शोकी हो गया
था। उसने गुरु के सामने जाकर अपने हृदय की दुर्बलता को
यों दिखाया था कि भगवन् ! विद्या पढ़ने से पहले तो मुझे सर्व-
साधारण की तरह, तीन तरह के ताप ही तपाया करते थे, अब
तो मेरे ऊपर यह बोझ और पड़ गया है कि कहीं यह विद्या भूल
न जाय, दूसरे विद्वान् से पराजय का खटका भी लगा रहता है।
अपने से थोड़े पढ़े लिखे को देखकर गर्व भी होने लगा है, इस
कारण बार बार इसका अभ्यास करना पड़ता है। यों विद्वान् होने
से तो मेरा बोझ और भी बढ़ गया है। होना जो चाहिये था उस
से सर्वथा विपरीत हो गया है। विद्वान् होने से तो मुझे शान्ति की
आशा लगी हुई थी। आज वह पूरी नहीं हो रही है सो कृपा
करके आप मुझे वहां पहुँचा दीजिये जहां जाकर शोक नहीं
रहता। इसके उत्तर में सनत्कुमार ऋषि ने उत्तर दिया कि—सुख