पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
५२६ पञ्चदशी
नन्दस्वरूप ] है । अवकाश उसका अपना निजी स्वरूप है ।
उसका जो यह निजीरूप है यही मिथ्या है । पहले कहे हुए वे
तीनों रूप मिथ्या नहीं होते ।
न व्यक्तेः पूर्वमस्त्येव न पश्चाच्चापि नाशतः ।
आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत् तथा ॥६८॥
आकाश का जो वह अवकाश नाम का चौथा रूप है, वह
आकाश के व्यक्त होने से पहले भी नहीं था और नाश हो जाने
के पश्चात् भी न रहेगा । इस कारण वह तो मिथ्या ही है ।
विचार कर देख लो कि—आदि और अन्त में जो बात नहीं
रहती वह मध्य में भी नहीं होती । [ भाव यह कि उत्पत्ति
और विनाश के बीच बीच में प्रतीत होने वाला यह अवकाश
असत् पदार्थ है ]
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येवेत्याह कृष्णोऽर्जुनं प्रति ॥६९॥
अर्जुन के प्रति कृष्ण भगवान् ने भी यही कहा है कि—ये
भूत पहले भी अव्यक्त थे। हे भारत ! ये बीच में कुछ काल के
लिये व्यक्त हो गये हैं। अन्त में जाकर ये फिर अव्यक्त में लीन
हो जायेंगे।
मृद्वत् ते सच्चिदानन्दा अनुगच्छन्ति सर्वदा ।
निराकाशे सदादीना मनुभूति र्निजात्मनि ॥७०॥
घटादि कार्यों में जैसे मिट्टी तीनों कालों में अनुगत रहती
है, इसी प्रकार वे सच्चिदानन्द नाम के तीनों रूप, सदा अनुगत
रहते हैं। जब आकाश नहीं रहता—
जाते हैं] तब भी इन सच्चिदानन्द धर्मों का अनुभव अपने आत्मा
में तो होता ही रहता है ।
अवकाशे विस्मृतेऽथ तत्र किं भाति ते वद ।
शून्यमेवेति चेदस्तु नाम तादृग् विभाति हि ॥७१॥
[ उसी का स्पष्टीकरण ] बताओ कि—जब तुम अवकाश
को भूल जाते हो तब तुम्हें क्या भान होता रहता है ? यदि कहो
कि शून्य का भान होता है तो हम कहेंगे कि अच्छा यों ही
सही। तुम उसका नाम शून्य ही रख लो । वैसे तो अवकाशाभाव
रूपसे प्रतीत होने वाली वह कोई वस्तु प्रतीत तो होती ही है ।
तादृक्त्वादेव तत्सत्व मौदासीन्येन तत् सुखम् ।
आनुकूल्यप्रातिकूल्यहीनं यत्तन्निजं सुखम् ॥७२॥
[ शून्य नजर आता है ऐसा तुम कहते हो] तादृक्पने के
कारण अर्थात् उपर्युक्त रूप से प्रतीत होने के कारण ही उसकी
सत्ता तो सिद्ध हो ही जाती है [ उसका स्वरूप तो मानना ही
पड़ता है ] उस समय उदासीनावस्था होने के कारण वह तत्व
सुख ही है । जो तत्व अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न
हो वही तो निज सुख होता है ।
आनुकूल्ये हर्षधीः स्यात् प्रातिकूल्ये तु दुःखधीः ।
द्वयाभावे निजानन्दो निजदुःखं न तु क्वचित् ॥७३॥
आनुकूल्य हो तो हर्ष होता है । प्रातिकूल्य जान पड़े तो
दुःख होता है । जब तो आनुकूल्य या प्रातिकूल्य कुछ भी प्रतीत
नहीं होता तब 'निजानन्द' भासने लग पड़ता है । निजानन्द
की तरह निज दुःख भी होता होगा ऐसी शंका मत करो। क्योंकि
दुःख में निजपना तो कहीं देखा ही नहीं जाता ।
५२८ पञ्चदशी
निजानन्दे स्थिरे हर्षशोकयो र्व्यत्ययः क्षणात् ।
मनसः क्षणिकत्वेन तयोर्मानसतेष्यताम् ॥७४॥
यह निजानन्द तो स्थिर ही है [यह तो सदानन्दरूप ही
है] इसलिये सदा हर्ष ही हर्ष रहना चाहिये । शोक कदापि न
होना चाहिये । फिर भी जो क्षण क्षण में हर्ष शोक का व्यत्यय
होता रहता है वह [उस निजानन्द को ग्रहण करने वाले] मन
के क्षणिक होने से होता है । मन के क्षणिक होने से उससे गृहीत
होने वाले हर्ष और शोक भी क्षणिक ही हैं और क्षणिक होने
के कारण ही ये हर्ष तथा शोक मानस माने जाते हैं ।
आकाशेऽप्येवमानन्दः सत्ताभाने तु संमते ।
वाय्वादिदेहपर्यन्तं वस्तुष्वेवं विभाव्यताम् ॥७५॥
जैसे आत्मा में आनन्द रहता है इसी प्रकार आकाश में
भी आनन्द रहता है । आकाश में के उसी आनन्द की प्रतीति
अवकाश के विस्मरण हो जाने पर निजात्मा में होती है । यह
बात यहां तक सिद्ध की गयी । आकाश में 'सत्ता' तथा 'भान'
भी रहते हैं परन्तु उस का प्रतिपादन हम नहीं करते, क्योंकि
उन्हें तो तुम भी मानते ही हो । आकाश में जिस तरह सच्चिदा-
नन्द धर्म रहते हैं इसी तरह वायु से लेकर शरीरपर्यन्त पदार्थों
में भी यही बात समझ लेना कि उनमें भी सच्चिदानन्द धर्म हैं।
गतिस्पर्शौ वायुरूपं वह्ने र्दाहप्रकाशने ।
जलस्य द्रवता भूमेः काठिन्यं चेति निर्णयः ॥७६॥
सच्चिदानन्द धर्म तो सबमें हैं ही। परन्तु गति तथा स्पर्श वायु
का निज रूप हैं। अग्नि के निज रूप दाह तथा प्रकाश हैं। जल
का निज रूप द्रवत्व है । भूमि का निजरूप कठिनता होती है ।
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९
असाधारण आकार ओषध्यन्नवपुष्यपि ।
एवं विभाव्यं मनसा तत्तद्रूपं यथोचितम् ॥७७॥
ओषधि अन्न तथा शरीरों में भी उन उन का असाधारण
आकार होता ही है । उन उन के उचित रूप को अपने मन से
समझ लेना चाहिये ।
अनेकधा विभिन्नेषु नामरूपेषु चैकधा ।
तिष्ठन्ति सच्चिदानन्दा विसंवादो न कस्यचित् ॥७८॥
सब वस्तुओं में नाम रूप तो भिन्न भिन्न होते ही हैं परन्तु
सच्चिदानन्द नाम के धर्म सब में एक रूप ही होते हैं । इसमें
किसी भी विवेकी को विसंवाद नहीं है ।
निस्तत्वे नामरूपे द्वे जन्मनाशयुते च ते ।
बुद्ध्या ब्रह्मणि वीक्षस्व समुद्रे बुद्बुदादिवत् ॥७९॥
इन दीख पड़ने वाले नामरूपों की गति हमसे पूछो तो हम
कहेंगे कि—ये दोनों नाम रूप तो 'निस्तत्व' किंवा कल्पित ही
हैं । क्योंकि इनके जन्म और नाश [वार बार] होते ही रहते
हैं । समुद्र में जैसे बुलबुलों को देखते हो, इसी प्रकार इन नाम
रूपों को बुद्धि के सहारे ब्रह्मतत्व में ही देखा करो ।
सच्चिदानन्दरूपेऽस्मिन् पूर्णे ब्रह्मणि वीक्षिते ।
स्वयमेवावजानाति नामरूपे शनैः शनैः ॥८०॥
जब कोई अधिकारी इस पूर्ण सचिदानन्द ब्रह्म को बुद्धि
से देख पाता है [ बुद्धि का उड़ान मारकर सब जगह देख
आता है ] तब फिर वह धीरे धीरे नाम रूपों की अवज्ञा करने
लग पड़ता है [ उसे फिर यह सब पसारा नहीं भाता किन्तु उसे
तो कारण तत्व ही प्यारा लगने लगता है ।]
३५
५३० पञ्चदशी
यावद् यावदवज्ञा स्यात् तावत्तावत् तदीक्षणम् ।
यावद् यावद् वीक्ष्यते तत् तावत्तावदुभे त्यजेत् ॥८१॥
जितनी जितनी [ नाम रूपों की ] अवज्ञा होती जाती है
उतना ही उतना ब्रह्म का दर्शन होने लगता है । और जितना
ही जितना वह ब्रह्म तत्व दीखने लगता है उतना ही उतना वे
दोनों [नामरूप] छूटने लगते हैं [ नाम रूप की अवज्ञा से ब्रह्म
दर्शन बढ़ता है और ब्रह्मदर्शन से नाम रूप में से आस्था हट
जाती है । श्लोक का भाव यह है कि ब्रह्मज्ञान की दृढता के लिये
द्वैत की अवज्ञा करते रहना चाहिये ]
तदभ्यासेन विद्यायां सुस्थितायामयं पुमान् ।
जीवन्नेव भवेन्मुक्तो वपुरस्तु यथा तथा ॥८२ ॥
इन दोनों [ द्वैतावज्ञा और ब्रह्मदर्शन ] अभ्यासों से जब
इस अधिकारी की विद्या स्थिर हो जाती है, तब यह पुरुष जीते
जी ही मुक्त हो जाता है । उसके शरीर इन्द्रिय तथा मन प्रारब्ध
के अनुसार जैसे तैसे रह सकते हैं । [ उनसे (शरीर के भिन्न
भिन्न प्रारब्धों से) उसकी मुक्ति में बाधा नहीं होती ]
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् ।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥८३॥
उसी का चिन्तन, उसी का कथन, एक दूसरे को उसी को
समझाना और सदा तन्निष्ठ होकर रहना, इसी को ज्ञानी लोग
'ब्रह्माभ्यास' समझते हैं ।
वासनानेककालीना दीर्घकालं निरन्तरम् ।
सादरं चाभ्यस्यमाने सर्वथैव निवर्तते ॥८४॥
अनादि काल से लेकर जो वासनायें हृदय में घुसी बैठी हैं
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३१
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३१
[ और अपने आत्मा की जगह सदा से ही द्वैत का प्रतिभास
करा रही हैं ] वे दीर्घ काल तक निरन्तर और श्रद्धापूर्वक
ज्ञानाभ्यास करने पर पूर्ण रूप से भाग जाती हैं।
मृच्छक्तिवद् ब्रह्मशक्ति रनेकाननृतान सृजेत् ।
यद्वा जीवगता निद्रा स्वप्नश्चात्र निदर्शनम् ॥८५॥
मिट्टी की शक्ति जैसे घट शराव आदि अनेक अनृत पदार्थों
को बना डालती है , इसी प्रकार ब्रह्म की शक्ति भी अनेक कार्यों
को बना डालती है । अथवा यों समझो कि—जीव की निद्रा
सुपना इसके उदाहरण हैं [ जैसे जीव की निद्रा शक्ति अनेक
स्वप्नों को उत्पन्न कर देती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति
अनेक कार्यों का सर्जन कर डालती है ]
निद्राशक्तिर्यथा जीवे दुर्घटस्वप्नकारिणी ।
ब्रह्मण्येषा स्थिता माया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥८६॥
जैसे यह जीव की निद्राशक्ति दुर्घट स्वप्नों को बना देती है,
इसी प्रकार ब्रह्म में रहने वाली यह माया नाम की शक्ति 'सृष्टि'
'स्थिति' तथा 'प्रलय' कर डालती है ।
स्वप्ने वियद्गतिं पश्येत् स्वमूर्धच्छेदनं यथा ।
मुहूर्ते वत्सरौघं च मृतपुत्रादिकं पुनः ॥८७॥
[निद्रा की दुर्घटकारिता देखा कि]—सुपने में कभी आकाश
में उड़ान मारता दीख पड़ता है, कभी अपने सिर कटन की
बात को प्रत्यक्ष देखता है, कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत
जाते हैं, कभी फिर मरे हुए पुत्रादि देखने को मिल जाते हैं ।
इदं युक्तमिदं नेति व्यवस्था तत्र दुर्लभा ।
यथा यथेष्यते यद्यत् तत्तद् युक्तं तथा तथा ॥८८॥
५३२ पंचदशी
'यह ठीक है' और 'यह ठीक नहीं है' ऐसी व्यवस्था सपने
के पदार्थों में हो ही नहीं सकती। वे तो जैसे जैसे देखे जाते
हैं, वैसे वैसे ही वे ठीक होते हैं।
ईदृशो महिमा दृष्टो निद्राशक्तेर्यदा तदा।
मायाशक्ते रचिन्त्योऽयं महिमेति किमद्भुतम् ॥८६॥
जब कि जीव की निद्राशक्ति की भी ऐसी महिमा देखी
गई है [जब कि वह भी अपने में तर्कशास्त्र को चलने नहीं देती
है] तब फिर ब्रह्म की माया शक्ति की महिमा अचिन्त्य हो तो
इसमें आश्चर्य क्यों करते हो ?
शयाने पुरुषे निद्रा स्वप्नं बहुविधं सृजेत् ।
ब्रह्मण्येवं निर्विकारे विकारान् कल्पत्यसौ ॥९०॥
पुरुष जब सोया पड़ा है [कोई भी प्रयत्न नहीं करत] तो
भी उसकी निद्रा अनेक तरह के स्वप्नों को उत्पन्न करती रहती
है, इसी प्रकार निर्विकार ब्रह्म में रहने वाली यह माया भी इस
नाना जगत् को कल्पित कर लेती है।
खानिलाग्निजलोर्व्यण्डलोकप्राणिशिलादिकाः ।
विकाराः प्राणिधीष्वन्तश्चिच्छाया प्रतिबिम्बिता ॥९१॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, अण्ड, लोक, प्राणी
तथा शिला आदि माया के बनाये हुए पेदार्थ हैं। प्राणियों की
बुद्धियों में [इतनी विशेषता है कि उनमें] चैतन्य की छाया
प्रतिबिम्बित हो गई है, इस कारण वे चेतन हो गये हैं [जिनमें
चैतन्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ पाया है वे जड रह गये हैं]
चेतनाचेतनेष्वेषु सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
समानं ब्रह्म, भिद्येते नामरूपे पृथक् पृथक् ॥९२॥
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३३
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३३
सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म तो चेतन और अचेतन सभी पदार्थों
में समान होता है। उनके केवल 'नाम' और 'रूप' ये ही दोनों
भिन्न भिन्न होते हैं। [चेतन और अचेतन का भेद चिद्रूप ब्रह्म
का किया हुआ नहीं है क्योंकि ब्रह्मतत्व तो चेतन और अचेतन
सभी का उपादान है]।
ब्रह्मण्येते नामरूपे परे चित्रमिव स्थिते।
उपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दधीर्भवेत् ॥९३॥
पटरूपी आधार में जैसे चित्र बना रहता है, इसी प्रकार
ये नाम और रूप भी ब्रह्मतत्व में स्थित हो रहे हैं अर्थात् कल्पित
हो रहे हैं। [सब कुछ की कल्पना का आधार होने से ही तो
वह ब्रह्मतत्व सर्वगत सिद्ध होता है] उस सर्वगत ब्रह्मतत्व को
यदि कोई जानना चाहे, तो वह कल्पित नाम रूपों की उपेक्षा
किंवा परित्याग कर दे । [ कल्पितनाम रूप छूट जायंगे तो
पीछे से अधिष्ठान ब्रह्म का दर्शन अवश्य होगा अर्थात् फिर
उसे अकल्पित सच्चिदानन्द तत्व दीखने लग पड़ेगा। उस
अकल्पित तत्व को कल्पित नाम रूपों ने ढक रक्खा है। हमारा
काम यह है कि अकल्पित से कल्पित को फिर ढक दें। इसी
को 'ईश्वरतत्व से ढकना' भी कहते हैं। यही बात ईशावास्य
के पहले मन्त्र में कही है ]।
जलस्थेऽधोमुखे स्वस्य देहे दृष्टेऽप्युपेक्ष्य तम्।
तीरस्थ एव देहे खे तात्पर्यं स्याद् यथा तथा ॥९४॥
पानी में जब अधोमुख अपना देह दीख पड़ता है तो जैसे
उसकी उपेक्षा करके, अपने तीरस्थ देह में ही तात्पर्य किंवा
ममता बनी रहती है, इसी प्रकार
५३४ पञ्चदशी
रूपों का परित्याग कर देने पर ही सच्चिदानन्द तत्व के दर्शन
हो सकते हैं । ]
सहस्रशो मनोराज्ये वर्तमाने सदैव तत् ।
सर्वैरपेक्ष्यते यद्वदुपेक्षा नामरूपयोः ॥९५॥
जैसे हजारों मनोराज्य हो रहे हों तो भी उनकी सब सदैव
उपेक्षा कर देते हैं, इसी प्रकार विवेकी लोग हजारों प्रकार से
दीखने वाले इन नाम रूपों की भी उपेक्षा किया करें ।
क्षणे क्षणे मनोराज्यं भवत्येवान्यथान्यथा ।
गतं गतं पुनर्नास्ति व्यवहारो बहिरस्तथा ॥९६॥
मनोराज्य जिस प्रकार क्षण क्षण में बदला करता है, जो
बीत जाता है वह फिर लौट कर नहीं आता, इसी प्रकार यह
बाह्य व्यवहार भी [क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता
है वह फिर लौट कर नहीं आता है ]
न बाल्यं यौवने लभ्यं यौवनं स्थाविरे तथा ।
मृतः पिता पुनर्नास्ति नायात्येव गतं दिनम् ॥९७॥
देख लो कि जवानी में बचपन ढूँढे भी नहीं मिलता है ।
बुढ़ापे में जवानी का भी यही हाल हो जाता है । मरा हुआ
पिता फिर लौट कर नहीं आता है । बीता हुआ दिन फिर नहीं
फिरता है ।
मनोराज्याद् विशेषः कः क्षणध्वंसिनि लौकिके ।
अतोऽस्मिन् भासमानेऽपि तत्सत्यत्वधियं त्यजेत् ॥९८॥
[ इस सब का तात्पर्य यही ह कि ] जो लौकिक पदार्थ
क्षणध्वंसी हैं उनमें मनोराज्य से विशेषता ही क्या है ? इसलिये
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३५
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३५
[ क्षणिक होने के कारण ] हम कहते हैं कि लौकिक पदार्थों के
भासने पर भी उनको सत्य समझना छोड़ दो ।
उपेक्षिते लौकिके धीर्निर्विघ्ना ब्रह्मचिन्तने ।
नटवत् कृत्रिमास्थायां निर्वहत्येव लौकिकम् ॥९९॥
जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा कर दी जायगी तब [ब्रह्म
चिन्तन का जो विघ्न है वह जाता रहेगा और ] बुद्धि ब्रह्मचिन्तन
में निर्विघ्न लग जायगी [ यदि पूछो कि फिर ज्ञानी लोगों का
व्यवहार कैसे चलेगा तो सुनो । ] नट लोग नाटक करते समय
जैसे बनावटी आस्था से अपने काम का निभाव कर लेते हैं,
इसी प्रकार ज्ञानी के लौकिक काम तो बनावटी आस्था से भी
निभ जाते हैं ।
प्रवहत्यपि नीरेऽधः स्थिरा प्रौढशिला यथा ।
नामरूपान्यथात्वेऽपि कूटस्थं ब्रह्म नान्यथा ॥१००॥
पानी ऊपर बहता भी रहो, परन्तु उस पानी के नीचे पड़ी
हुई भारी शिला जैसे स्थिर रहती है , हिलती जुलती नहीं, इसी
प्रकार नाम रूप में परिवर्तन होता भी रहो-[ बुद्धि संसरण
करती भी रहो ] परन्तु कूटस्थ जो ब्रह्म है [ उस बुद्धि का साक्षी
जो निर्विकार ज्ञानी आत्मा है ] वह कभी अन्यथा [विकारी]
नहीं हो जाता । [अर्थात् ज्ञानी लोग संसार के साथ बहते नहीं]
व्यवहार में आने पर भी ज्ञानी में विकार नहीं आता । उसकी
बुद्धि जब व्यवहार में लगी रहती है तब भी उसका साक्षी आत्मा
निर्विकार ही रहता है ।
निश्चिद्रे दर्पणे भाति वस्तुगर्भं बृहद् वियत् ।
सच्चिद्घने तथा नानाजगद्गर्भमिदं वियत् ॥१०१॥
दर्पण में कोई भी छिद्र नहीं होता [ जहां कि कोई भी वस्तु
समा सके ] परन्तु दर्पण में ऐसा मालूम होता है मानो अगणित
वस्तुओं से भरा हुआ आकाश ही उसके अन्दर बैठा हो ।
ठीक इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चि-
दून अखण्ड ब्रह्म में [ व्यर्थ ही ] प्रतीत हो रहा है ।
अदृष्ट्वा दर्पणं नैव तदन्तस्थेक्षणं तथा।
अमत्वा सच्चिदानन्दं नामरूपमतिः कुतः ॥१०२॥
जब तक पहले कोई दर्पण को नहीं देख लेता तब तक
उसके अन्दर की वस्तु को कोई भी नहीं देख पाता। इसी प्रकार
जब तक कि सच्चिदानन्द तत्व की प्रतीति किसी को नहीं हो
लेती है तब तक उसे नामरूपात्मक जगत् की प्रतीति कैसे
होगी ? [दर्पण के अन्दर की वस्तु को देखने से पहले दर्पण
का दीख लेना जैसे आवश्यक है इसी प्रकार नामरूप (जगत्)
का परिज्ञान होने से पहले ही सच्चिदानन्दतत्व की प्रतीति हो
लेती है ]
प्रथमं सच्चिदानन्दे भासमानेऽथ तावता ।
बुद्धिं नियम्य नैवोर्ध्वं धारयेन्नामरूपयोः ॥१०३॥
[सावधान होकर सुनिए] बुद्धिवृत्ति के उदय होने से पहले
तो तुम्हें सच्चिदानन्द तत्व का ही भास होता है। हम कहते हैं
कि बस यहीं अपनी बुद्धि को रोक रक्खो [ उस सच्चिदानन्द
मात्र का ही ग्रहण करते रहो] उसके बाद आये हुए नाम रूप
में बुद्धि को मत जाने दो इस तरह अभ्यास को बढ़ाने पर
निर्विषय ब्रह्म की प्रतीति होने लगेगी ।
हमको तो अकेले सच्चिदानन्द की प्रतीति नहीं होती । उसके
[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३७
[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३७
साथ ही नामरूप भी प्रतीत होते हैं। अकेले सच्चिदानन्द की
प्रतीति का क्या उपाय करें? यही बात इस श्लोक में
बतायी है।
एवं च निर्जगद् ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
अद्वैतानन्द एतस्मिन् विश्राम्यन्तु जनाश्चिरम् ॥१०४॥
जब तुम ब्रह्म को इस प्रकार निर्जगत् कर सकोगे तब वह
ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप हो जायगा। [उसकी नामरूप धारी
कालिमा धुल जायगी।] बस इसी को 'अद्वैतानन्द' कहते हैं।
मुमुक्षुलोग चिरकाल तक इसी 'अद्वैतानन्द' में विश्राम
लेते रहें।
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे तृतीयेऽध्याय ईरितः ।
अद्वैतानन्द एव स्याज्जगन्मिथ्यात्वचिन्तया ॥१०५॥
ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में तृतीयाध्याय समाप्त हुआ। जगत्
के मिथ्यात्व की चिन्ता करने से 'अद्वैतानन्द' जाग
उठता है।
इतिश्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे
अद्वैतानन्दो नाम तृतीयोऽध्यायः
14. Vidyananda
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम्
योगेनात्मविवेकेन द्वैतमिथ्यात्वचिन्तया ।
ब्रह्मानन्दं पश्यतोऽथ विद्यानन्दो निरूप्यते ॥१॥
क्रमानुसार पहले तीन अध्यायों में वर्णित योग से या आत्म-
विवेक से या फिर द्वैत के मिथ्यापन की चिन्ता करने से, जब
कोई ब्रह्मानन्द के साक्षात् दर्शन कर रहा हो, उस समय उसको
जो ज्ञानानन्द होता है उसी का निरूपण इस प्रकरण में किया
जायगा ।
विषयानन्दवद् विद्यानन्दो धीवृत्तिरूपकः ।
दुःखाभावादिरूपेण प्रोक्त एष चतुर्विधः ॥२॥
जिस प्रकार वह विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है,
इसी प्रकार यह 'विद्यानन्द' भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही
है । इस विद्यानन्द को दुःखाभाव आदि चार प्रकार का कहते हैं ।
दुःखाभावश्च कामाप्तिः कृतकृत्योहमित्यसौ ।
प्राप्तप्राप्योहमित्येव चातुर्विध्यमुदाहृतम् ॥३॥
(१) मुझे कोई भी दुःख नहीं, (२) मेरी सब कामनायें
पूर्ण हो गई हैं, (३) मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, (४) मुझे जो पाना
था सो प्राप्त हो गया है, यों 'विद्यानन्द' चार प्रकार का होता है ।
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५३९
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५३९
ऐहिकं चामुष्मिकं चेत्येवं दुःखं द्विधेरितम् ।
निवृत्तिमैहिकस्याह बृहदारण्यकं वचः ॥४॥
दुःख दो प्रकार का होता है—एक इस लोक का दूसरा
परलोक का । बृहदारण्यक का [अगला] श्लोक ऐहिक [इस लोक
के] दुःख की निवृत्ति को कह रहा है।
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् ? कस्य कामाय ? शरीरमनुसंज्वरेत् ॥५॥
यदि कोई पुरुष आत्मा को जान जाय कि 'यह तत्त्व मैं
हूँ' तो बताओ फिर वह किस वस्तु की चाहना को लेकर और
किस के लिए इस शरीर के पीछे [इसके दुःख से] दुःखी होता
फिरे ? [जब वह आत्मा को पहचानेगा तब उसे पता चलेगा
कि उसके आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु है ही नहीं। इसीलिए वह
कुछ भी चाहना छोड़ देगा। जब उसे ज्ञात होगा कि आत्मा
ऐसा असंग तत्त्व है उसको किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं
है बस फिर वह किसी के लिए कुछ भी न चाहेगा ।]
जीवात्मा परमात्मा चेत्यात्मा द्विविध ईरितः ।
चित्तादात्म्यात् त्रिभिर्देहैर्जीवः सन् भोक्तृतां व्रजेत् ॥६॥
'जीवात्मा' और 'परमात्मा' इन दो तरह का आत्मा कहा
जाता है। चैतन्य का 'स्थूल' 'सूक्ष्म' तथा 'कारण' नाम के तीन
शरीरों के साथ तदात्म्य [तादात्म्य भ्रम] जब हो जाता है तब
चैतन्य ही भोक्ता बन जाता है और वही भोक्ता 'जीव' कहाने
लगता है।
परात्मा सच्चिदानन्दस्तादात्म्यं नामरूपयोः ।
गत्वा भोग्यत्वमापन्न स्तद्विवेके तु नोभयम् ॥७॥
आत्मतत्त्व का विवेक [भेद ज्ञान] कर लिया जाता है तब फिर
५४० पञ्चदशी
परमात्मा तो सच्चिदानन्दस्वरूप ही है परन्तु वह पर-
मात्मा [क्योंकि नामरूप की कल्पना का अधिष्ठान है इसलिए]
नामरूप के साथ तादात्म्य को पाकर भोग्य बन जाता है। जब
उन तीनों शरीरों से तथा इस नामरूपात्मक जगत् से उस
आत्मतत्त्व का विवेक [भेद ज्ञान] कर लिया जाता है तब फिर
न तो 'भोक्ता' तत्व ही रहता है और न 'भोग्य' तत्व ही रह
जाता है।
भोग्यमिच्छन् भोक्तुरर्थे शरीरमनुसंज्वरेत् ।
ज्वरास्त्रिषु शरीरेषु स्थिता, न त्वात्मनो ज्वराः ॥८॥
यह प्राणी 'भोक्ता' के लिये जब किसी 'भोग्य' पदार्थ को
चाहता है तब इसे शरीर के साथ [अनिवार्य रूप से] दुःखी
होना ही पड़ता है। ज्वर तो तीनों शरीरों में होते ही रहते हैं।
आत्मतत्त्व को तो ज्वर कभी नहीं होते।
व्याधयो धातुवैषम्ये स्थूलदेहे स्थिता ज्वराः ।
कामक्रोधादयः सूक्ष्मे, द्वयोर्बीजं तु कारणे ॥६॥
'वात' 'पित्त' 'कफ' नाम के धातुओं में जब विषमता आ
जाती है तब स्थूल शरीर में व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। ये ही
स्थूल शरीर के 'ज्वर' कहाते हैं। काम क्रोध आदि विकार सूक्ष्म
शरीर के 'ज्वर' कहे जाते हैं। परन्तु दोनों प्रकार के ज्वरों का
बीज तो कारण शरीर में ही रहता है।
अद्वैतानन्दमार्गेण परात्मनि विवेचिते ।
अपश्यन् वास्तवं भोग्यं किं नामेच्छेत् परात्मवित् ॥१०॥
अद्वैतानन्द नाम के १३वें प्रकरण में कहे हुए प्रकार से जब
[माया के कार्य नामरूप में से सच्चिदानन्दस्वरूप] परमात्म-
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४१
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४१
तत्त्व का विवेक कर लिया जाता है [जब उस आत्मतत्त्व को
इस सब नामरूपात्मक जगत् से पृथक् पहचान लिया जाता
है] जब ज्ञानी को कोई भी सच्चा भोग्य नहीं दीख पड़ता [जब
वह इस प्रपंच को मिथ्या मान लेता है] तब बताओ कि
वह परात्मा का जानने वाला ज्ञानी कौन से भोग्य की
इच्छा करे ?
आत्मानन्दोक्तरीत्यास्मिन् जीवात्मन्यवधारिते ।
भोक्ता नैवास्ति कोऽप्यत्र, शरीरे तु ज्वरः कुतः ॥११॥
आत्मानन्द नाम के १२वें अध्याय में बतायी हुई रीति से
जीवात्मा के [असंग कूटस्थ चैतन्य] स्वरूप का निश्चय जब किसी
को हो जायगा तब फिर कोई भी भोक्ता [या कामयिता]
ही नहीं रहेगा [ विचार की आंच के सामने भोक्तृ भाव जल
जायगा] ऐसी अवस्था में इस विचारे जड़ शरीर में ज्वर होगा
ही कैसे ? [ इसको ज्वर के होने का पता कैसे चलेगा ? ]
पुण्यपापद्वये चिन्ता दुःखमामुष्मिकं भवेत् ।
प्रथमाध्याय एवोक्तं चिन्ता नैनं तपेदिति ॥१२॥
पुण्य या पाप करने की इच्छा [नीयत] ही पारलौकिक दुःख
कहाता है । प्रथमाध्याय में [ ११ वें प्रकरण में ] बताया गया
है कि इस ज्ञानी को तो चिन्ता सताती ही नहीं ।
यथा पुष्करपर्णेऽस्मिन्नपामश्लेषणं तथा ।
वेदनादूर्ध्वमागामि कर्मणोऽश्लेषणं बुधे ॥१३॥
जैसे इस कमल के पत्ते में पानी का संपर्क नहीं होता इसी
प्रकार आत्मज्ञान हो जाने के बाद इस ज्ञानी में आगामी कर्मों
का सम्बन्ध नहीं होता ।
५४२ पञ्चदशी
उसे नहीं रहती । यही बात तद्यथा पुष्करपर्णे इत्यादि श्रुति में
कही गयी है । ]
इषीकातृणतूलस्य वह्निदाहः क्षणाद् यथा ।
तथा संचितकर्मास्य दग्धं भवति वेदनात् ॥१४॥
तद्यथेषीकतूल मग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते
(छा. ५-२४-३) इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे सर
कण्डे या कांस की रूई, आग में एक क्षण में जल जाती है,
इसी प्रकार ज्ञानी के [ करोड़ों कल्पों से ] संचित किये हुए
कर्म भी ज्ञान [ के माहात्म्य ] से [ तत्क्षण ] दग्ध हो जाते हैं ।
[ यों उसे संचित कर्मों की चिन्ता भी नहीं रह जाती ] कि इन
का क्या बनेगा ? ]
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥१५॥
गीता में भी कहा है कि—हे अर्जुन ! जिस प्रकार प्रदीप्त
अग्नि ईंधनों को जला डालती है, इसी प्रकार [ सुलगी हुई ]
यह ज्ञानाग्नि भी, तीनों प्रकार के कर्मों [ क्रियमाण आगामी और
संचित ] को भस्मसात् कर देती है ।
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१६॥
गीता में ही यह भी कहा है कि—जिस ज्ञानी को अहंकार
युक्त भाव नहीं रहता, [ कि यह मैं करता हूँ मैं करने वाला हूँ ]
जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं होती, वह यदि इन
सब लोकों को मार भी दे, तो भी वह मारने वाला नहीं समझा
जाता और इस कर्म से वह बन्धन में भी नहीं आ सकता ।
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३
मातापित्रोर्वधः स्तेयं भ्रूणहत्यान्यदीदृशम् ।
न मुक्तिं नाशयेत् पापं मुखकान्तिर्न नश्यति ॥१७॥
यही बात कौषीतकी उपनिषत् में यों कही गयी है कि—
माता पिता का वध, चोरी, गर्भपात या और ऐसा ही पाप कर्म
ज्ञानी की मुक्ति को रोक नहीं सकता। ऐसे ऐसे महाभयंकर
पापों से भी ज्ञानी के चेहरे की कान्ति फीकी नहीं पड़ती।
दुःखाभाववदेवास्य सर्वकामाप्तिरीरिता ।
सर्वान् कामानसावाप्त्वा ह्यमृतोऽभवदित्यतः ॥१८॥
ज्ञानी के दुःखाभाव का वर्णन यहां तक किया गया। उसी
तरह ज्ञानी को सब कामनाओं की प्राप्ति भी बतायी गयी है।
ऐतरेय श्रुति में कहा गया है कि यह ज्ञानी सब कामनाओं को
पाकर अमर हो चुका है ।
जक्षन् क्रीडन् रतिं प्राप्तः स्त्रीभिर्यानैस्तथैतरैः ।
शरीरं न स्मरेत्, प्राणः कर्मणा जीवयेदसुम् ॥१९॥
[ छान्दोग्य में तो यहां तक कहा है कि ]—खाता, खेलता,
स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता, तथा और भोग्य
पदार्थों को भोगता हुआ भी ज्ञानी, इस शरीर को याद तक
नहीं करता [ उसे यह मालूम ही नहीं रहता कि यह शरीर क्या
कर रहा है ? वह तो निरन्तर आत्मसागर में डूबा रहता है ]
उस समय उस का प्राण प्रारब्ध कर्मों के सहारे से उस शरीर
को जीवित रखता रहता है । [ जब उस शरीर के प्रारब्ध कर्म
समाप्त हो जायेंगे तब वह शरीर तुरन्त ही गिर जायगा ] ।
सर्वान् कामान् सहाप्नोति नान्यवज्जन्म कर्मभिः ।
वर्तन्ते श्रोत्रिये भोगा युगपत् क्रमवर्जिताः ॥२०॥
५४४ पञ्चदशी
तैत्तिरीय श्रुति में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण
कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानी लोग
जैसे कर्मों को कर करके जन्मपरम्परा में फंसे रहते हैं,
वैसे इन [दिखावटी] कर्मों से ज्ञानी को जन्म लेना नहीं पड़ता ।
अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार भोगों को भोगा करते हैं श्रोत्रिय
को वैसे भोग नहीं होता । उसको तो सब भोग एक ही साथ
बिना क्रम के होते हैं । [ इसी प्रकरण के ३४ श्लोक में जाकर
यह विषय स्पष्ट हो गया है । ]
युवा रूपी च विद्यावान् नीरोगो दृढचित्तवान् ।
सैन्योपेतः सर्वपृथ्वीं वित्तपूर्णां प्रपालयन् ॥२१॥
सर्वै र्मानुष्यकै र्भोगैः संपन्नस्तृप्तभूमिपः ।
यमानन्दमवाप्नोति ब्रह्मविच्च तमश्नुते ॥२२॥
जवान हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो, नीरोग हो, स्थिर
चित्त हो, भारी सेना हो, धन धान्य से पूर्ण पृथिवी का शासन
कर रहा हो, अथवा संक्षेप में यों कहना चाहिए कि मनुष्यों को
जितने भी भोग प्राप्त हो सकते हैं वे सभी उसे प्राप्त हों, ऐसे
तृप्त भूपति को जो आनन्द मिल सकता है, ब्रह्मज्ञानी पुरुष भी
उसी आनन्द को लूटा करता है [ तैत्तिरीय और बृहदारण्यक
उपनिषदों में यह बात कही गई है । ]
मर्त्यभोगे द्वयोर्नास्ति काम स्तृप्तिस्ततः समा ।
भोगानिष्कामतैकस्य परस्यापि विवेकतः ॥२३॥
[प्रश्न यह है कि सार्वभौम राजा को विषयों की प्राप्ति होती
है, श्रोत्रिय को कोई विषय प्राप्त नहीं होता । फिर भी इन
दोनों का आनन्द, एक सा कैसे होता है ? इसी का उत्तर इस
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श्लोक में दिया है] सार्वभौम राजा और श्रोत्रिय इन दोनों को
ही मर्त्यभोगों की इच्छा नहीं रहती, इस कारण इन दोनों को
एक सी ही तृप्ति होती है। भेद केवल इतना ही है कि सार्व-
भौम राजा तो भोग चुकने पर निष्काम हुआ है। दूसरा
श्रोत्रिय तो विवेक के प्रताप से [बिना भोगे ही] निष्काम हो
जाता है। यों इन दोनों को एक सी ही तृप्ति हो जाती है।
श्रोत्रियत्वाद् वेदशास्त्रैर्भोगदोषानवेक्षते ।
राजा बृहद्रथो दोषांस्तान् गाथाभिरुदाहरत् ॥२४॥
देहदोषांश्चित्तदोषान् भोग्यदोषाननेकशः ।
श्रोत्रिय होने के कारण, वेद शास्त्रों के द्वारा, वह भोगों
के दोषों को देखता रहता है [इस कारण विवेक के प्रताप से
वह निष्काम हो जाता है] बृहद्रथ राजा ने मैत्रायणी शाखा में
गाथाओं के द्वारा विषय के दोषों का वर्णन किया है [उसमें
देह, चित्त तथा भोग्य के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन आया है]
शुना वान्ते पायसे नो कामस्तद्वद्विवेकिनः ॥२५॥
कुत्ते से वमन की हुई खीर को खान का विचार भी जैसे
कोई नहीं करता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष को दोषयुक्त भोगों
की कामना ही नहीं होती ।
निष्क्रामत्वे समेऽप्यत्र राज्ञः साधनसंचये ।
दुःखमासीद् भाविनाशादतिभीरनुवर्तते ॥२६॥
[श्रोत्रिय की महिमा सार्वभौम राजों से ऊँची है] यद्यपि
श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान रूप से निष्काम हुए प्रतीत
होते हैं, परन्तु राजा को तो साधनों को इकट्ठा करने में पहले
भी [काफी] दुःख हुआ था 'आगामी में तो ये सब भोग नष्ट