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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 565

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३
मातापित्रोर्वधः स्तेयं भ्रूणहत्यान्यदीदृशम् ।
न मुक्तिं नाशयेत् पापं मुखकान्तिर्न नश्यति ॥१७॥
यही बात कौषीतकी उपनिषत् में यों कही गयी है कि—
माता पिता का वध, चोरी, गर्भपात या और ऐसा ही पाप कर्म
ज्ञानी की मुक्ति को रोक नहीं सकता। ऐसे ऐसे महाभयंकर
पापों से भी ज्ञानी के चेहरे की कान्ति फीकी नहीं पड़ती।
दुःखाभाववदेवास्य सर्वकामाप्तिरीरिता ।
सर्वान् कामानसावाप्त्वा ह्यमृतोऽभवदित्यतः ॥१८॥
ज्ञानी के दुःखाभाव का वर्णन यहां तक किया गया। उसी
तरह ज्ञानी को सब कामनाओं की प्राप्ति भी बतायी गयी है।
ऐतरेय श्रुति में कहा गया है कि यह ज्ञानी सब कामनाओं को
पाकर अमर हो चुका है ।
जक्षन् क्रीडन् रतिं प्राप्तः स्त्रीभिर्यानैस्तथैतरैः ।
शरीरं न स्मरेत्, प्राणः कर्मणा जीवयेदसुम् ॥१९॥
[ छान्दोग्य में तो यहां तक कहा है कि ]—खाता, खेलता,
स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता, तथा और भोग्य
पदार्थों को भोगता हुआ भी ज्ञानी, इस शरीर को याद तक
नहीं करता [ उसे यह मालूम ही नहीं रहता कि यह शरीर क्या
कर रहा है ? वह तो निरन्तर आत्मसागर में डूबा रहता है ]
उस समय उस का प्राण प्रारब्ध कर्मों के सहारे से उस शरीर
को जीवित रखता रहता है । [ जब उस शरीर के प्रारब्ध कर्म
समाप्त हो जायेंगे तब वह शरीर तुरन्त ही गिर जायगा ] ।
सर्वान् कामान् सहाप्नोति नान्यवज्जन्म कर्मभिः ।
वर्तन्ते श्रोत्रिये भोगा युगपत् क्रमवर्जिताः ॥२०॥