पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextदर्पण में कोई भी छिद्र नहीं होता [ जहां कि कोई भी वस्तु
समा सके ] परन्तु दर्पण में ऐसा मालूम होता है मानो अगणित
वस्तुओं से भरा हुआ आकाश ही उसके अन्दर बैठा हो ।
ठीक इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चि-
दून अखण्ड ब्रह्म में [ व्यर्थ ही ] प्रतीत हो रहा है ।
अदृष्ट्वा दर्पणं नैव तदन्तस्थेक्षणं तथा।
अमत्वा सच्चिदानन्दं नामरूपमतिः कुतः ॥१०२॥
जब तक पहले कोई दर्पण को नहीं देख लेता तब तक
उसके अन्दर की वस्तु को कोई भी नहीं देख पाता। इसी प्रकार
जब तक कि सच्चिदानन्द तत्व की प्रतीति किसी को नहीं हो
लेती है तब तक उसे नामरूपात्मक जगत् की प्रतीति कैसे
होगी ? [दर्पण के अन्दर की वस्तु को देखने से पहले दर्पण
का दीख लेना जैसे आवश्यक है इसी प्रकार नामरूप (जगत्)
का परिज्ञान होने से पहले ही सच्चिदानन्दतत्व की प्रतीति हो
लेती है ]
प्रथमं सच्चिदानन्दे भासमानेऽथ तावता ।
बुद्धिं नियम्य नैवोर्ध्वं धारयेन्नामरूपयोः ॥१०३॥
[सावधान होकर सुनिए] बुद्धिवृत्ति के उदय होने से पहले
तो तुम्हें सच्चिदानन्द तत्व का ही भास होता है। हम कहते हैं
कि बस यहीं अपनी बुद्धि को रोक रक्खो [ उस सच्चिदानन्द
मात्र का ही ग्रहण करते रहो] उसके बाद आये हुए नाम रूप
में बुद्धि को मत जाने दो इस तरह अभ्यास को बढ़ाने पर
निर्विषय ब्रह्म की प्रतीति होने लगेगी ।
हमको तो अकेले सच्चिदानन्द की प्रतीति नहीं होती । उसके