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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 562

५४० पञ्चदशी
परमात्मा तो सच्चिदानन्दस्वरूप ही है परन्तु वह पर-
मात्मा [क्योंकि नामरूप की कल्पना का अधिष्ठान है इसलिए]
नामरूप के साथ तादात्म्य को पाकर भोग्य बन जाता है। जब
उन तीनों शरीरों से तथा इस नामरूपात्मक जगत् से उस
आत्मतत्त्व का विवेक [भेद ज्ञान] कर लिया जाता है तब फिर
न तो 'भोक्ता' तत्व ही रहता है और न 'भोग्य' तत्व ही रह
जाता है।
भोग्यमिच्छन् भोक्तुरर्थे शरीरमनुसंज्वरेत् ।
ज्वरास्त्रिषु शरीरेषु स्थिता, न त्वात्मनो ज्वराः ॥८॥
यह प्राणी 'भोक्ता' के लिये जब किसी 'भोग्य' पदार्थ को
चाहता है तब इसे शरीर के साथ [अनिवार्य रूप से] दुःखी
होना ही पड़ता है। ज्वर तो तीनों शरीरों में होते ही रहते हैं।
आत्मतत्त्व को तो ज्वर कभी नहीं होते।
व्याधयो धातुवैषम्ये स्थूलदेहे स्थिता ज्वराः ।
कामक्रोधादयः सूक्ष्मे, द्वयोर्बीजं तु कारणे ॥६॥
'वात' 'पित्त' 'कफ' नाम के धातुओं में जब विषमता आ
जाती है तब स्थूल शरीर में व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। ये ही
स्थूल शरीर के 'ज्वर' कहाते हैं। काम क्रोध आदि विकार सूक्ष्म
शरीर के 'ज्वर' कहे जाते हैं। परन्तु दोनों प्रकार के ज्वरों का
बीज तो कारण शरीर में ही रहता है।
अद्वैतानन्दमार्गेण परात्मनि विवेचिते ।
अपश्यन् वास्तवं भोग्यं किं नामेच्छेत् परात्मवित् ॥१०॥
अद्वैतानन्द नाम के १३वें प्रकरण में कहे हुए प्रकार से जब
[माया के कार्य नामरूप में से सच्चिदानन्दस्वरूप] परमात्म-