पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५२८ पञ्चदशी
निजानन्दे स्थिरे हर्षशोकयो र्व्यत्ययः क्षणात् ।
मनसः क्षणिकत्वेन तयोर्मानसतेष्यताम् ॥७४॥
यह निजानन्द तो स्थिर ही है [यह तो सदानन्दरूप ही
है] इसलिये सदा हर्ष ही हर्ष रहना चाहिये । शोक कदापि न
होना चाहिये । फिर भी जो क्षण क्षण में हर्ष शोक का व्यत्यय
होता रहता है वह [उस निजानन्द को ग्रहण करने वाले] मन
के क्षणिक होने से होता है । मन के क्षणिक होने से उससे गृहीत
होने वाले हर्ष और शोक भी क्षणिक ही हैं और क्षणिक होने
के कारण ही ये हर्ष तथा शोक मानस माने जाते हैं ।
आकाशेऽप्येवमानन्दः सत्ताभाने तु संमते ।
वाय्वादिदेहपर्यन्तं वस्तुष्वेवं विभाव्यताम् ॥७५॥
जैसे आत्मा में आनन्द रहता है इसी प्रकार आकाश में
भी आनन्द रहता है । आकाश में के उसी आनन्द की प्रतीति
अवकाश के विस्मरण हो जाने पर निजात्मा में होती है । यह
बात यहां तक सिद्ध की गयी । आकाश में 'सत्ता' तथा 'भान'
भी रहते हैं परन्तु उस का प्रतिपादन हम नहीं करते, क्योंकि
उन्हें तो तुम भी मानते ही हो । आकाश में जिस तरह सच्चिदा-
नन्द धर्म रहते हैं इसी तरह वायु से लेकर शरीरपर्यन्त पदार्थों
में भी यही बात समझ लेना कि उनमें भी सच्चिदानन्द धर्म हैं।
गतिस्पर्शौ वायुरूपं वह्ने र्दाहप्रकाशने ।
जलस्य द्रवता भूमेः काठिन्यं चेति निर्णयः ॥७६॥
सच्चिदानन्द धर्म तो सबमें हैं ही। परन्तु गति तथा स्पर्श वायु
का निज रूप हैं। अग्नि के निज रूप दाह तथा प्रकाश हैं। जल
का निज रूप द्रवत्व है । भूमि का निजरूप कठिनता होती है ।