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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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५३४ पञ्चदशी
रूपों का परित्याग कर देने पर ही सच्चिदानन्द तत्व के दर्शन
हो सकते हैं । ]
सहस्रशो मनोराज्ये वर्तमाने सदैव तत् ।
सर्वैरपेक्ष्यते यद्वदुपेक्षा नामरूपयोः ॥९५॥
जैसे हजारों मनोराज्य हो रहे हों तो भी उनकी सब सदैव
उपेक्षा कर देते हैं, इसी प्रकार विवेकी लोग हजारों प्रकार से
दीखने वाले इन नाम रूपों की भी उपेक्षा किया करें ।
क्षणे क्षणे मनोराज्यं भवत्येवान्यथान्यथा ।
गतं गतं पुनर्नास्ति व्यवहारो बहिरस्तथा ॥९६॥
मनोराज्य जिस प्रकार क्षण क्षण में बदला करता है, जो
बीत जाता है वह फिर लौट कर नहीं आता, इसी प्रकार यह
बाह्य व्यवहार भी [क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता
है वह फिर लौट कर नहीं आता है ]
न बाल्यं यौवने लभ्यं यौवनं स्थाविरे तथा ।
मृतः पिता पुनर्नास्ति नायात्येव गतं दिनम् ॥९७॥
देख लो कि जवानी में बचपन ढूँढे भी नहीं मिलता है ।
बुढ़ापे में जवानी का भी यही हाल हो जाता है । मरा हुआ
पिता फिर लौट कर नहीं आता है । बीता हुआ दिन फिर नहीं
फिरता है ।
मनोराज्याद् विशेषः कः क्षणध्वंसिनि लौकिके ।
अतोऽस्मिन् भासमानेऽपि तत्सत्यत्वधियं त्यजेत् ॥९८॥
[ इस सब का तात्पर्य यही ह कि ] जो लौकिक पदार्थ
क्षणध्वंसी हैं उनमें मनोराज्य से विशेषता ही क्या है ? इसलिये