पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५३९
ऐहिकं चामुष्मिकं चेत्येवं दुःखं द्विधेरितम् ।
निवृत्तिमैहिकस्याह बृहदारण्यकं वचः ॥४॥
दुःख दो प्रकार का होता है—एक इस लोक का दूसरा
परलोक का । बृहदारण्यक का [अगला] श्लोक ऐहिक [इस लोक
के] दुःख की निवृत्ति को कह रहा है।
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् ? कस्य कामाय ? शरीरमनुसंज्वरेत् ॥५॥
यदि कोई पुरुष आत्मा को जान जाय कि 'यह तत्त्व मैं
हूँ' तो बताओ फिर वह किस वस्तु की चाहना को लेकर और
किस के लिए इस शरीर के पीछे [इसके दुःख से] दुःखी होता
फिरे ? [जब वह आत्मा को पहचानेगा तब उसे पता चलेगा
कि उसके आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु है ही नहीं। इसीलिए वह
कुछ भी चाहना छोड़ देगा। जब उसे ज्ञात होगा कि आत्मा
ऐसा असंग तत्त्व है उसको किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं
है बस फिर वह किसी के लिए कुछ भी न चाहेगा ।]
जीवात्मा परमात्मा चेत्यात्मा द्विविध ईरितः ।
चित्तादात्म्यात् त्रिभिर्देहैर्जीवः सन् भोक्तृतां व्रजेत् ॥६॥
'जीवात्मा' और 'परमात्मा' इन दो तरह का आत्मा कहा
जाता है। चैतन्य का 'स्थूल' 'सूक्ष्म' तथा 'कारण' नाम के तीन
शरीरों के साथ तदात्म्य [तादात्म्य भ्रम] जब हो जाता है तब
चैतन्य ही भोक्ता बन जाता है और वही भोक्ता 'जीव' कहाने
लगता है।
परात्मा सच्चिदानन्दस्तादात्म्यं नामरूपयोः ।
गत्वा भोग्यत्वमापन्न स्तद्विवेके तु नोभयम् ॥७॥