पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३१
[ और अपने आत्मा की जगह सदा से ही द्वैत का प्रतिभास
करा रही हैं ] वे दीर्घ काल तक निरन्तर और श्रद्धापूर्वक
ज्ञानाभ्यास करने पर पूर्ण रूप से भाग जाती हैं।
मृच्छक्तिवद् ब्रह्मशक्ति रनेकाननृतान सृजेत् ।
यद्वा जीवगता निद्रा स्वप्नश्चात्र निदर्शनम् ॥८५॥
मिट्टी की शक्ति जैसे घट शराव आदि अनेक अनृत पदार्थों
को बना डालती है , इसी प्रकार ब्रह्म की शक्ति भी अनेक कार्यों
को बना डालती है । अथवा यों समझो कि—जीव की निद्रा
सुपना इसके उदाहरण हैं [ जैसे जीव की निद्रा शक्ति अनेक
स्वप्नों को उत्पन्न कर देती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति
अनेक कार्यों का सर्जन कर डालती है ]
निद्राशक्तिर्यथा जीवे दुर्घटस्वप्नकारिणी ।
ब्रह्मण्येषा स्थिता माया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥८६॥
जैसे यह जीव की निद्राशक्ति दुर्घट स्वप्नों को बना देती है,
इसी प्रकार ब्रह्म में रहने वाली यह माया नाम की शक्ति 'सृष्टि'
'स्थिति' तथा 'प्रलय' कर डालती है ।
स्वप्ने वियद्गतिं पश्येत् स्वमूर्धच्छेदनं यथा ।
मुहूर्ते वत्सरौघं च मृतपुत्रादिकं पुनः ॥८७॥
[निद्रा की दुर्घटकारिता देखा कि]—सुपने में कभी आकाश
में उड़ान मारता दीख पड़ता है, कभी अपने सिर कटन की
बात को प्रत्यक्ष देखता है, कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत
जाते हैं, कभी फिर मरे हुए पुत्रादि देखने को मिल जाते हैं ।
इदं युक्तमिदं नेति व्यवस्था तत्र दुर्लभा ।
यथा यथेष्यते यद्यत् तत्तद् युक्तं तथा तथा ॥८८॥