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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 554

५३२ पंचदशी
'यह ठीक है' और 'यह ठीक नहीं है' ऐसी व्यवस्था सपने
के पदार्थों में हो ही नहीं सकती। वे तो जैसे जैसे देखे जाते
हैं, वैसे वैसे ही वे ठीक होते हैं।
ईदृशो महिमा दृष्टो निद्राशक्तेर्यदा तदा।
मायाशक्ते रचिन्त्योऽयं महिमेति किमद्भुतम् ॥८६॥
जब कि जीव की निद्राशक्ति की भी ऐसी महिमा देखी
गई है [जब कि वह भी अपने में तर्कशास्त्र को चलने नहीं देती
है] तब फिर ब्रह्म की माया शक्ति की महिमा अचिन्त्य हो तो
इसमें आश्चर्य क्यों करते हो ?
शयाने पुरुषे निद्रा स्वप्नं बहुविधं सृजेत् ।
ब्रह्मण्येवं निर्विकारे विकारान् कल्पत्यसौ ॥९०॥
पुरुष जब सोया पड़ा है [कोई भी प्रयत्न नहीं करत] तो
भी उसकी निद्रा अनेक तरह के स्वप्नों को उत्पन्न करती रहती
है, इसी प्रकार निर्विकार ब्रह्म में रहने वाली यह माया भी इस
नाना जगत् को कल्पित कर लेती है।
खानिलाग्निजलोर्व्यण्डलोकप्राणिशिलादिकाः ।
विकाराः प्राणिधीष्वन्तश्चिच्छाया प्रतिबिम्बिता ॥९१॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, अण्ड, लोक, प्राणी
तथा शिला आदि माया के बनाये हुए पेदार्थ हैं। प्राणियों की
बुद्धियों में [इतनी विशेषता है कि उनमें] चैतन्य की छाया
प्रतिबिम्बित हो गई है, इस कारण वे चेतन हो गये हैं [जिनमें
चैतन्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ पाया है वे जड रह गये हैं]
चेतनाचेतनेष्वेषु सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
समानं ब्रह्म, भिद्येते नामरूपे पृथक् पृथक् ॥९२॥