Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

About this granth

Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.

The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.

This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१

Page 371Permalink

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१
नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो । जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है । [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
असन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ खमृगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है । फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखलाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोपयन्त्यस्य.वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

Page 372Permalink

३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है।
उसी को शिव भी कहते हैं।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि—माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है। अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वसदन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं—] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो—वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या

Page 373Permalink

[कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५१]

नहीं ? यह बात अपने अपने अनुभवों से ही पूछो। जो माया
सबकी कल्पना करने में समर्थ है उसके लिये दुर्घट बात कुछ
भी नहीं है। [उस माया ने ही उन दोनों मायिकों को चिद्रूप से
प्रकाशित भी कर डाला है ।]
अस्मन्निद्रापि जीवेशौ चेतनौ स्वप्नगौ सृजेत् ।
महामाया सृजत्येतावित्याश्चर्यं किमत्र ते ॥६३॥
हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—[ जिसे हमारी
माया भी कह सकते हैं] सुपने के चेतन 'जीव' और 'ईश्वर'
को उत्पन्न कर ही लेती है। फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को
उत्पन्न करले, इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है ?
सर्वज्ञत्वादिकं चेशे कल्पयित्वा प्रदर्शयेत् ।
धर्मिणं कल्पयेद् यास्याः को भारो धर्मकल्पने ॥६४॥
यह भी उस महामाया का स्वभाव ही है कि—उसने ईश्वर
में सर्वज्ञत्वादि धर्मों की कल्पना कर दिखाई है—[उसे जीव
की तरह असर्वज्ञ नहीं रक्खा है] भला जिस माया ने धर्मी
की कल्पना कर डाली है, उसे धर्म की कल्पना करने में कौन
सी कठिनाई हो सकती है ?
कूटस्थेऽप्यतिशङ्का स्यादिति चेन्मातिशङ्क्यताम् ।
कूटस्थमायिकत्वे तु प्रमाणं न हि विद्यते ॥६५॥
जीव और ईश्वर की तरह कूटस्थ को मायिक मानना ठीक
नहीं है । क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का कोई भी प्रमाण
नहीं मिलता ।
वस्तुत्वं घोषयन्त्यस्य वेदान्ताः सकला अपि ।
सपत्नरूपं वस्त्वन्यन्न सहन्तेऽत्र किंचन ॥६६॥

Page 374Permalink

३५२ पञ्चदशी
प्रत्युत सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर होकर इस कूटस्थ को ही
वास्तव पदार्थ कह रहे हैं । वे इस कूटस्थ के प्रतिपक्षी किसी
भी पदार्थ को सहन नहीं करते हैं ।
श्रुत्यर्थं विशदीकुर्मो न तर्काद्वच्मि किंचन ।
तेन तार्किकशङ्काना मत्र कोऽवसरो वद ॥६७॥
हम तो केवल श्रुति के तात्पर्य को ही विशद् करते हैं ।
तर्क के सहारे से तो हम कुछ भी नहीं कहते हैं । ऐसी अवस्था
में तार्किकों की शंकाओं का यहां अवसर ही कौनसा है ? इस
धातु का प्रयोग बहुवचन में न आने के कारण 'वच्मि' यह
प्रयोग किया है ।
तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य मुमुक्षुः श्रुति माश्रयेत् ।
श्रुतौ तु माया जीवेशौ करोतीति प्रदर्शितम् ॥६८॥
इस कारण मुमुक्षु को चाहिये कि—इस दुरवगाह आत्म-
तत्त्व को जानने के लिये कुतर्क को छोड़कर श्रुति का आश्रय ले
ले । श्रुतियों में तो जीवेश्वरों को मायिक कहा ही है ।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशकृता भवेत् ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकर्तृकः ॥६९॥
ईक्षण से लेकर प्रवेश तक की सृष्टि तो ईश्वर की बनायी
हुई है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, बन्ध तथा मोक्षरूपी संसार को
जीव ने बना लिया है । [इसका स्पष्टीकरण तृप्तिदीप के चतुर्थ
श्लोक में है]
असङ्ग एव कूटस्थः सर्वदा नास्य कश्चन ।
भवत्यतिशयस्तेन मनस्येवं विचार्यताम् ॥७०॥
मुमुक्षु लोग इस बात को अपने मन में सदा ही विचारा

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३

Page 375Permalink

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३
करें कि यह कूटस्थ तो असङ्ग ही रहता है । [ जन्म जरा रोग
और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे
हैं परन्तु ] इन सब से इस कूटस्थ तत्व में कभी कुछ भी अतिशय
नहीं हो पाता है [यह तो सदा वैसे का वैसा ही बना
रहता है] ।
न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥७१॥
सब झंझट को छोड़कर परमार्थ का निचोड़ पूछो तो इतना
ही है किः—मरण और जन्म कुछ चीज़ ही नहीं हैं। बद्ध और
साधक कोई होता ही नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को कह
ही नहीं सकते हैं ।
अवाङ्मनसगम्यं तं श्रुतिर्बोधयितुं सदा ।
जीवमीशं जगद् वापि समाश्रित्य प्रबोधयेत् ॥७२॥
वाणी और मन से अगम्य उसी तत्व का बोध कराने के
लिये श्रुति भगवती 'जीव' या 'ईश्वर' या 'जगत्' इन तीनों में
से किसी एक को पकड़ कर, उस मन वाणी के अगम्य तत्व का
बोध करा देती है । [मन वाणी के अगम्य उस तत्व का बोध
कराने के लिये श्रुतियों में 'जीव' 'ईश्वर' तथा 'जगत्' के स्वरूप
का प्रतिपादन जहां तहां किया गया है । उसका परमतात्पर्य तो
जिस किसी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध कराने में
ही है।]
यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वीत्याचार्यभाषितम् ॥७३॥
२४

Page 376Permalink

३५४ पञ्चदशी
जिस जिस प्रक्रिया से पुरुषों को आत्मतत्व का परिज्ञान
हो जाय, वही प्रक्रिया ठीक होती है। यह बात सुरेश्वराचार्य
ने कही है।
वह आत्मतत्व एकरूप ही हैं। तत्व में किसी प्रकार की
भी भिन्नता नहीं है। बोध कराने के प्रकारों में ही भिन्नता पायी
जाती है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना है, या जिन्होंने
बोध कराना है, उन सब के चित्त एक समान नहीं होते। उनके
चित्तों में बड़ी विषमता रहती है। उनके चित्तों की विषमता के
कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। यही
अभिप्राय सुरेश्वराचार्य का है।
श्रुतितात्पर्य मखिल मबुद्ध्वा भ्राम्यते जडः ।
विवेकी त्वखिलं बुद्ध्वा तिष्ठत्यानन्दवारिधौ ॥७४॥
श्रुति का अर्थ तो एक ही हो सकता है। फिर भी जो लोग
विरुद्ध अर्थ करके आपस में विवाद करते हैं उसका कारण यह
है कि—जड लोग श्रुति के पूरे तात्पर्य को न समझ कर भ्रम
में पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को
समझ कर आनन्दसमुद्र में मग्न रहने लगते हैं।
मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्वेष यथा तथा ।
चिदाकाशस्य नो हानि र्न वा लाभ इति स्थितिः॥७५॥
विवेकी लोगों का तो यह निश्चय होता है कि—यह माया
रूपी मेघ, जगत् रूपी जल को, जैसे तैसे भले ही बरसाता रहो।
इसके बरसने से चिदाकाश का कुछ भी हानि या लाभ नहीं
होता है। यही सच्ची स्थिति भी है।

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५५

Page 377Permalink

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३५५
इमं कूटस्थदीपं योऽनुसन्धत्ते निरन्तरम् ।
स्वयं कूटस्थरूपेण दीप्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥७६॥
जो सदा ही इस कूटस्थदीप का विचार करेंगे, वे स्वयं ही
सदा कूटस्थरूप होकर चमक उठेंगे ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यविरचितपंचदश्यां कूटस्थदीपप्रकरणं समाप्तम्

9. Dhyanadipa

Page 378Permalink

ॐ
ध्यानदीपप्रकरणम्
संवादिभ्रमवद् ब्रह्मतत्त्वोपास्त्यापि मुच्यते ।
उत्तरे तापनीयेऽतः श्रुतोपास्तिरनेकधा ॥१॥
जो मनुष्य संवादिभ्रम में आकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता
है, जैसे उसे उसकी अभिप्रेत वस्तु मिल ही जाती है, उसी
प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना करने से भी मोक्ष मिल जाता है
[यद्यपि यह मोक्ष का सीधा रास्ता नहीं है] इसी कारण तापनीय
उपनिषत् में अनेक प्रकार से ब्रह्मतत्व की उपासनायें सुनी गयी हैं।
जिन लोगों ने उपनिषदों का श्रवण कर लिया हो और बुद्धि
की मन्दता आदि किसी प्रतिबन्ध से वाक्यार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान
उत्पन्न न होता हो, उसके लाभ के लिए, अपरोक्षज्ञान को पैदा
कर के मोक्ष दिलाने वाली उपासनाओं का विधान, इस प्रकरण
में किया है ।
मणिप्रदीपप्रभयो र्मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ॥२॥
जो मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ता
है और जो दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने
दौड़ पड़ा है, यद्यपि उन दोनों ही को मिथ्याज्ञान तो समान ही
है, तो भी प्रयोजनसिद्धि में विषमता [फ़र्क] पायी जाती है।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७

Page 379Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७
मणिप्रभा को मणि समझ कर उठाने दौड़ा है, उस का काम सिद्ध
होजाता है—उसको मणि मिल जाती है । दूसरे को मणि नहीं
मिलती । प्रयोजनसिद्धि में यह विषमता पायी जाती है।]
दीपोऽपवरकस्यान्तर्वर्तते तत्प्रभा बहिः ।
दृश्यते द्वार्यथान्‍यत्र तद्वद् दृष्टा मणिप्रभा ॥३॥
किसी एक मकान में कोई दीपक रक्खा है उसकी प्रभा
किसी तंग झरोके में को निकल कर बाहर रत्न सी दीखती है ।
किसी दूसरे मकान में कोई रत्न रक्खा है, उसकी प्रभा भी किसी
झरोके में को होकर बाहर रत्न सी ही दीखती है ।
दूरे प्रभाद्वयं दृष्ट्वा मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
प्रभायां मणिबुद्धिस्तु मिथ्याज्ञानं द्वयोरपि ॥४॥
वैसी दो प्रभाओं को दूर से देखकर ‘यह मणि है’ ‘यह मणि
है’ यह समझ कर दो पुरुष उठाने दौड़ते हैं। उन दोनों ने जो
कि प्रभा को मणि समझा है उन दोनों की ही समझ भ्रम है।
न लभ्यते मणि र्दीपप्रभां प्रत्यभिधावता ।
प्रभायां धावतावश्यं लभ्येतैव मणिर्मणेः ॥५॥
यद्यपि दीपक की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ने वाले
पुरुष को मणि नहीं मिलती, परन्तु मणि की प्रभा को मणि
समझ कर दौड़ने वाला तो मणि को पा ही लेता है ।
दीपप्रभामणिभ्रान्ति र्विसंवादिभ्रमः स्मृतः ।
मणिप्रभामणिभ्रान्तिः संवादिभ्रम उच्यते ॥६॥
दीपक की प्रभा में जो मणि की भ्रान्ति है, उसे ‘विसं-
वादिभ्रम’ किंवा ‘विफलभ्रम’ कहा गया है [ क्योंकि उससे
मणि का लाभ नहीं होता ] जो तो मणि की प्रभा में मणि

Page 380Permalink

३५८ पञ्चदशी

की भ्रान्ति है, उसको 'संवादिभ्रम' किंवा 'सफलभ्रम' कहते
हैं [क्योंकि उस भ्रमसे मणि का लाभ हो ही जाता है]
बाष्पं धूमतया बुद्ध्वा तत्राङ्गारानुमानतः ।
वह्निर्यदृच्छया लब्धः स संवादिभ्रमो मतः ॥७॥
किसी ने किसी देशमें वाष्प [भाप] को देखा उसे धूम
समझ कर उस देश में अंगारों का अनुमान किया और वहां से
अग्नि को लेने चल पड़ा। अब यदि दैवगति से उसे वहां अग्नि
मिलजाय तो उसका वाष्प को धूम समझना 'सफलभ्रम'
माना गया है।
गोदावर्युदके गङ्गोदकं मत्वा विशुद्धये ।
संप्रोक्ष्य शुद्धि माप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥८॥
गोदावरी और गंगा का जल दोनों ही शुद्धि कारक माने
जाते हैं। जो तो गोदावरी के जल को गंगा जल समझ कर
उससे शुद्ध होने के लिये प्रोक्षण करता है, वह भी शुद्ध हो
जाता है। गोदावरी के जल को गंगाजल समझना भ्रम तो
है, परन्तु इसे 'संवादिभ्रम' कहते हैं।
ज्वरेणार्त्तः सन्निपातं भ्रान्त्या नारायणं स्मरन् ।
मृतः स्वर्गमवाप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥९॥
ज्वर से जिसे सन्निपात होगया हो, सन्निपात के पागल-
पन में यदि वह नारायण का स्मरण भ्रम से भी करने लगे,
तो वह मर कर स्वर्ग को जाता है। यह भी संवादिभ्रम ही है।
प्रत्यक्षस्यानुमानस्य तथा शास्त्रस्य गोचरे।
उक्तन्यायेन सवादिभ्रमाः सन्ति हि कोटिशः ॥१०॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९

Page 381Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९
प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्रों में उक्त प्रकार के अनन्त
'संवादिभ्रम' पाये जाते हैं ।
अन्यथा मृत्तिकादारुशिलाः स्युर्देवताः कथम् ।
अग्नित्वादिधियोपास्याः कथं वा योषिदादयः ॥११॥
यदि संवादिभ्रम कोई चीज़ न हो तो, मिट्टी लकड़ी और
पत्थर की प्रतिमायें देवता कैसे हो जांय ? ये तो संवादिभ्रम
को मान करही फलसिद्धि के लिये देवता भाव से पूजी जाती
हैं। यदि संवादिभ्रम न हो तो स्त्री आदि को अग्नि आदि
समझकर उपासना का विधान क्यों किया जाय ? 'मनोब्रह्मे-
त्युपासीत (छा० ३-१८-१) आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छा० ३-१९-१)
इत्यादि की भी यही गति है। ये भी सब संवादिभ्रम ही हैं]
अयथावस्तुविज्ञानात् फलं लभ्यत ईप्सितम् ।
काकतालीयतः सोऽयं संवादिभ्रम उच्यते ॥१२॥
वस्तु को उलटा समझ कर भी जब किसी को काक-
तालीयन्याय किंवा दैवगति से अभिलषित फल मिल जाता है
तब यही 'संवादिभ्रम' कहाता है ।
स्वयंभ्रमोपि संवादी यथा सम्यक् फलप्रदः ।
ब्रह्मतत्त्वोपासनापि तथा मुक्तिफलप्रदा ॥१३॥
संवादी भ्रम यद्यपि स्वयं भ्रम ही है, तौ भी जैसे वह ठीक
फलदायी हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना भी
यद्यपि अयथावस्तुविषयक ( यथार्थ वस्तु को विषय न करने
वाली किंवा यथार्थ वस्तु तक न पहुँचनेवाली ) होती है तौ भी
मुक्तिरूपी फल को तो दे ही जाती है ।

Page 382Permalink

१६० पञ्चदशी

वेदान्तेभ्यो ब्रह्मतत्व मखण्डैकरसात्मकम् ।
परोक्षमवगम्यैतदहमस्मीत्युपासते ॥१४॥
वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एकरसात्मक ब्रह्मतत्व को परोक्ष
रूप से जब जान लेते हैं तब उसके बाद उस ब्रह्म को 'अहं
ब्रह्मास्मि' (बृ० १-३-१०) मैं ब्रह्म हूँ इस रूप में उपासना करने
लगते हैं। [शास्त्र से परोक्ष रूप से जान लिया हुआ ब्रह्म उपा-
सना का विषय होता है।]
प्रत्यग्व्यक्तिमनुल्लिख्य शास्त्राद् विष्ण्वादिमूर्तिवत् ।
अस्ति ब्रह्मेति सामान्यज्ञानमत्र परोक्षधीः ॥१५॥
विष्णु आदि की मूर्ति को बताने वाले शास्त्र के कहने से
जैसे मूर्ति का परोक्ष ज्ञान हो जाता है, उसी तरह प्रत्यक्षरूप से
आत्मा को विषय न भी करके जब वेदान्त के कहने से केवल
इतना सामान्य ज्ञान हो जाता है कि 'ब्रह्म है' तब यही ज्ञान इस
उपासना में 'परोक्षज्ञान' कहाता है।
चतुर्भुजाद्यवगतावपि मूर्ति मनुल्लिखन् ।
अक्षैः परोक्षज्ञान्येव न तदा विष्णुमीक्षते ॥१६॥
शास्त्र से तो विष्णु को चतुर्भुज आदि जान लिया जाता है,
परन्तु भावना के प्रताप से जब तक वह मूर्ति इन्द्रियों से दीख
नहीं पड़ती, तब तक पुरुष परोक्ष ज्ञानी ही रहता है। क्योंकि
उपासना के समय वह साधक अपने उपास्य विष्णु को नहीं
देखता।
परोक्षत्वापराधेन भवेन्नातत्त्ववेदनम् ।
प्रमाणेनैव शास्त्रेण सत्वमूर्तेर्विभासनात् ॥१७॥
परोक्षता रूपी कमी से ही कोई ज्ञान मिथ्याज्ञान नहीं हो
Page 383Permalink

जाता है [मिथ्याज्ञान तो वह तभी होता है जब कि उस ज्ञान
का विषय असत्य हो] यहाँ तो प्रमाण भूत शास्त्र के द्वारा ही
विष्णु आदि की मूर्ति का ज्ञान हमें मिलता है [फिर उसे
अतत्वज्ञान कैसे कह दें ?]
सच्चिदानन्दरूपस्य शास्त्राद् भानेऽप्यनुल्लिखन्।
प्रत्यञ्चं साक्षिणं तत्तु ब्रह्म साक्षान्न वीक्षते ॥१८॥
शास्त्र से सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म का भान हो जाने पर
भी, जब तक कोई उस ब्रह्म को प्रत्यगात्मरूप से [साक्षिरूप से]
नहीं जान लेता है, तबतक कहा जाता है कि वह ब्रह्म को
साक्षात् नहीं देख रहा है ।
शास्त्रोक्तेनैव मार्गेण सच्चिदानन्दनिश्चयात् ।
परोक्षमपि तज्ज्ञानं तत्वज्ञानं न तु भ्रमः ॥१९॥
वह ज्ञान यद्यपि परोक्ष ही होता है परन्तु शास्त्रोक्त रीति
से ही ब्रह्म के सच्चिदानन्द रूपका निश्चय करा देने के कारण
उसे तत्वज्ञान ही मानना चाहिये। वह ज्ञान भ्रम ज्ञान नहीं है।
ब्रह्म यद्यपि शास्त्रेषु प्रत्यक्त्वेनैव वर्णितम् ।
महावाक्यैस्तथाप्येतद् दुर्बोधमविचारिणः ॥२०॥
वेदान्तों [के महावाक्यों] ने तो ब्रह्म को प्रत्यगात्मा ही कहा
है परन्तु जिस अविचारी [पुरुष ने अन्वयव्यतिरेक से तत् त्वं
पदार्थों का विवेक नहीं किया है उस] के लिये यह बात
अत्यन्त ही दुर्बोध होती है [इसी कारण कहते हैं कि केवल
वाक्य से प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु विचार
सहित वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है ]

Page 384Permalink

३६२ पंचदशी
देहाद्यात्मत्वविभ्रान्तौ जाग्रत्यां न हठात् पुमान्।
ब्रह्मात्मत्वेन विज्ञातुं क्षमते मन्दधीत्वतः ॥२१॥
देहादि को आत्मा समझने का भ्रम जब तक किसी को
बना हुआ है, तब तक कोई भी पुरुष मन्द बुद्धि होने के
कारण, ब्रह्म को आत्मा जान ही नहीं सकता [ ब्रह्मज्ञान का
विरोधी जो देहादियों में आत्मता का भ्रम बना हुआ है उस
भ्रम को विचार ही हटा सकता है—उस भ्रम को हटाने के
लिये केवल विचार की ही आवश्यकता है]
ब्रह्ममात्रं सुविज्ञेयं श्रद्धालुः शास्त्रदर्शिनः ।
अपरोक्षद्वैतबुद्धिः परोक्षाद्वैतबुद्ध्यनुद् ॥२२॥
जो श्रद्धालु हैं, जो शास्त्रदर्शी हैं, उसको ब्रह्म का परोक्ष
ज्ञान होजाना तो बड़ा ही सुकर है। क्योंकि अपरोक्षद्वैत बुद्धि
परोक्ष अद्वैत बुद्धि को नष्ट करती ही नहीं।
अपरोक्षशिलाबुद्धिर्न परोक्षेशतां नुदेत् ।
प्रतिमादिषु विष्णुत्वे को वा विप्रतिपद्यते ॥२३॥
लोक में भी देखलो, पत्थर की प्रतिमा में जो प्रत्यक्ष शिला
बुद्धि होती है, वह उसके परोक्ष ईश्वरपने को हटा नहीं
देती। प्रतिमा आदि को विष्णु मानते हुए किसी को दुविधा
नहीं होती।
अश्रद्धालो रविश्वासो नोदाहरणमर्हति ।
श्रद्धालुारेव सर्वत्र वैदिकेष्वधिकारतः ॥२४॥
इस मामले में अश्रद्धालु लोगों के अविश्वास का उदा-
हरण देना ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक कामों में सब जगह
श्रद्धालु ही अधिकारी होता है।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३

Page 385Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३
सकृदाप्तोपदेशेन परोक्षज्ञान मुद्भवत् ।
विष्णुमूर्त्युपदेशो हि न मीमांसामपेक्षते ॥२५॥
आप्त पुरुष के एक बार के उपदेश से ही परोक्ष ज्ञान हो जाता
है। लोक में भी देखलो कि विष्णुमूर्तिका उपदेश बहस और
तर्क की अपेक्षा नहीं करता [जिसको उससे ज्ञान होना होता
है उस पहली बार के उपदेश से ही हो जाता है । ]
कर्मोपास्ती विचार्येते अनुष्ठेयाविनिर्णयात् ।
बहुशाखाविप्रकीर्णं निर्णोतुं कः प्रभुर्नरः ॥२६॥
अनुष्ठान करने योग्य कर्म तथा उपासनाओं में सन्देह
हो सकता है, इससे उनका विचार किया जाता है। क्योंकि
अनेक शाखाओं में जहां तहां प्रतिपादित किये हुए कर्म को
कोई भी पुरुष सहसा निर्णय नहीं कर सकता ।
निर्णीतोऽर्थः कल्पसूत्रै ग्रथित स्तावतास्तिकः ।
विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठातुमञ्जसा ॥२७॥
जैमिनि आदि पूर्वाचार्यों ने जिस अर्थ का निश्चय कर
दिया है, उसी अर्थ [कर्म पद्धति] को कल्प सूत्रों ने संग्रह कर
लिया है। आस्तिक पुरुष तो बस इतने ही से सन्तुष्ट हो जाता
है और विचार किये बिना भी कर्म को भले प्रकार कर
सकता है ।
उपास्तीनामनुष्ठानमार्षग्रन्थेषु वर्णितम् ।
विचाराक्षममर्त्याश्च तच्छ्रुत्वोपासते गुरोः ॥२८॥
उपासनाओं की रीति भी आर्ष ग्रन्थों में कही गयी है ।
जो पुरुष स्वयं विचार नहीं कर सकते, वे कल्पों में कही हुई
उपासनाओं को गुरुमुख से सुनकर करने लगते हैं ।

Page 386Permalink

३६४ पञ्चदशी
वेदवाक्यानि निर्णोतु मिच्छन् मीमांसतां जनः ।
आप्तोपदेशमात्रेण ह्यनुष्ठानं हि सम्भवेत् ॥२९॥
वेद वाक्यों का निर्णय चाहने वाला आजकल का पुरुष,
अपनी बुद्धि को सन्तुष्ट करने के लिये उनका विचार करता
है तो करे । उन कर्मों का अनुष्ठान तो केवल इतने से ही हो
सकता है कि वे आप्तों के उपदेश हैं ।
ब्रह्मसाक्षात्कृति स्त्वेवं विचारेण विना नृणाम् ।
आप्तोपदेशमात्रेण न सम्भवति कुत्रचित् ॥३०॥
कर्मानुष्ठान की तरह, विचार किये विना केवल आप्त
पुरुष के कहदेने से ही ब्रह्म साक्षात्कार तो कभी भी संभव
नहीं है ।
परोक्षज्ञान मश्रद्धा प्रतिबध्नाति नेतरत् ।
अविचारोऽपरोक्षस्य ज्ञानस्य प्रतिबन्धकः ॥३१॥
अश्रद्धा ही परोक्षज्ञान को होने से रोकती रहती है, अवि-
चार नहीं, [जब अश्रद्धा टूट जाती है तब एक बार के उपदेश
से ही परोक्षज्ञान हो सकता है] अविचार तो अपरोक्षज्ञान का
प्रतिबन्धक है । [विचार के द्वारा जब तक अविचार को निवृत्त
नहीं कर दिया जाता तब तक अपरोक्षज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता
इस कारण विचार करना चाहिये ।]
विचार्याप्यापरोक्ष्येण ब्रह्मात्मानं न वेत्ति चेत् ।
आपरोक्ष्यावसानत्वादू भूयो भूयो विचारयेत् ॥३२॥
'तत्' 'त्वं' पदार्थों को विचार कर भी यदि ब्रह्म और आत्मा
की एकता को प्रत्यक्षरूप में नहीं जान सका है तो बार बार
विचार ही करना चाहिये । क्योंकि विचार की समाप्ति तभी

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५

Page 387Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५
हो सकती है जब अपरोक्ष ज्ञान हो जाय [ अपरोक्ष ज्ञान
करादेने के अतिरिक्त विचार का कोई भी काम नहीं है ] ।
विचारयन्नामरणं नैवात्मानं लभेत चेत् ।
जन्मान्तरे लभेतैव प्रतिबन्धक्षये सति ॥३३॥
मरण पर्यन्त विचार करते रहने पर भी यदि किसी को
आत्मा का साक्षात्कार न हो गया हो तो,प्रतिबन्धों के हट जाने
पर, दूसरे किसी जन्म में तो उसे साक्षात्कार हो ही जायगा ।
इह वामुत्र वा विद्येत्येवं सूत्रकृतोदितम् ।
शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युिरिति श्रुतिः ॥३४॥
ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् (ब्रह्म सू० ३-४-५१)इस
सूत्र में व्यास देव ने कहा है कि विचार करने वाले को इस
जन्म या दूसरे जन्मों में ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । 'शृण्वन्तोऽप्यत्र
बहवो यन्न विद्युः' ( क० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि
प्रतिबन्ध होने पर बहुतों को इस जन्म में ज्ञान नहीं होता ।
गर्भ एव शयानः सन् वामदेवोऽवबुद्धवान् ।
पूर्वाभ्यस्तविचारेण यद्वदध्ययनादिषु ॥३५॥
'गर्भे नु सन्नन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ( ऐतरेय ४-
५ ) इस श्रुति में कहा गया है कि—वामदेव को गर्भवास के
दिनों में ही अपरोक्ष ज्ञान हो गया था । इससे यह सिद्ध होता
है कि इस जन्म में श्रवणादि कर लेने वाले को दूसरे जन्म में
३४—कोई प्रतिबन्ध न हो तो श्रवण आदि से इस जन्म में भी ज्ञान हो
जाता है । प्रतिबन्ध हो तो इस जन्म में न होकर दूसरे जन्मों में होता
है । प्रतिबन्ध के साधक प्रमाण देखे जाते हैं । जैसे कि वामदेव को गर्भ
में ज्ञान हुआ था । बहुत से तो इस तत्व को सुन कर भी नहीं समझते हैं ।

Page 388Permalink

भी अपरोक्ष ज्ञान होता है। दैनिक व्यवहार में भी देख लो
कि—पठन पाठन आदि कामों में पहले अभ्यास किये हुए
विचार से कभी कभी अगले दिन बिना ही याद किये स्मरण
आ जाता है।
बहुवारमधीतेऽपि तदा नायाति चेत् पुनः।
दिनान्तरेऽनधीत्यैव पूर्वाधीतं स्मरेत् पुमान् ॥३६॥
बहुत बार याद करने पर भी, उस दिन यदि याद नहीं
आता,तो कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन बिना ही याद
किये पहले पढ़े हुए पाठ याद आ जाते हैं।
कालेन परिपच्यन्ते कृषिगर्भादयो यथा।
तद्वदात्मविचारोपि शनैः कालेन पच्यते ॥३७॥
खेती और गर्भ आदि जैसे तुरन्त ही तैयार नहीं हो जाते।
किन्तु पकने में इन्हें कुछ समय लगता ही है। इसी प्रकार
आत्मविचार भी धीरे-धीरे काल पाकर परिपक्व हुआ करता है।
पुनः पुनर्विचारेऽपि त्रिविधप्रतिबन्धतः ।
न वेत्ति तत्वमित्येतद् वार्तिके सम्यगीरितम् ॥३८॥
बार बार विचार करने पर भी, तीन प्रकार के प्रतिबन्धों
के होने से तत्व का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यह बात
वार्तिककार ने भले प्रकार समझायी है ।
कुतस्तज्ज्ञानमिति चेत् तद्धि बन्धपरिक्षयात् ।
असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा ॥३९॥
वार्तिककार ने उन प्रतिबन्धों का निरूपण इन नौ श्लोकों
में यों किया है—जो ज्ञान पहले जन्म में उत्पन्न नहीं हो पाया
था वह ज्ञान अब इस दूसरे जन्म में किस कारण से उत्पन्न

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७

Page 389Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७
हुआ करता है ? इसका उत्तर यह है कि प्रतिबन्ध के क्षीण हो
जाने से वह ज्ञान हो जाता है। वह प्रतिबन्ध (१) भूत (२)
भावी और (३) वर्तमान भेद से तीन प्रकार का होता है।
अधीतवेदवेदार्थोऽप्यत एव न मुच्यते ।
हिरण्यनिधिदृष्टान्तादिदमेव हि दर्शितम् ॥४०॥
किसी प्रतिबन्ध के होने से ही वेद के ज्ञाता लोग भी मुक्त
नहीं हो पाते 'तद्यथा हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न
विन्देयुः एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरह र्ब्रह्मलोकं गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं
न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः' [छा० ८-३-२] भूगर्भविद्या को न
जानने वाले लोग, हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते भी रहते हैं,
परन्तु उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रति
दिन ब्रह्म के पास जाती हैं परन्तु विषयवासना रूपी अनृत
से ढकी रहने के कारण उसको पा नहीं सकती ।] हिरण्य-
निधि के दृष्टान्त से इस प्रतिबन्ध को ही दिखाया गया है।
अतीतेनापि महिषीस्नेहेन प्रतिबन्धतः ।
भिक्षुस्तत्त्वं न वेदेति गाथा लोके प्रगीयते ॥४१॥
भूत प्रतिबन्धक को लोक में देखलो कि बीते हुए महिषी
के स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण भिक्षु ने तत्व को नहीं
जाना था। यह गाथा वेदान्त संप्रदाय में प्रसिद्ध है । [कोई
यति पहले गृहस्थ आश्रम में किसी भैंस पर बड़ा प्रेम रखता
था। इसी बीच में उसने संन्यास लेलिया। वेदान्तका श्रवण
करने पर भी उसी महिषी स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के
कारण गुरु से कही हुई बात उसकी समझ में नहीं आयी थी।

Page 390Permalink

३६८ पञ्चदशी
अनुसृत्य गुरुः स्नेहं महिष्यां तत्व मुक्तवान् ।
ततो यथावद् वेदैष प्रतिबन्धस्य संक्षयात् ॥४२॥
गुरु ने उसके महिषी स्नेह का अनुसरण करके महिषी में
[रूपी उपाधि में] ही तत्व [ ब्रह्म ] बतादिया था । तब उसने
महिषी की उपासना की और उपासना करते करते जब उसके
[महिषीस्नेह रूपी] प्रतिबन्ध का क्षय होगया तब वह पूर्ण रूप
से ज्ञानी हो गया था ।
प्रतिबन्धो वर्तमानो विषयासक्तिलक्षणः ।
प्रज्ञामान्द्यं कुतर्कश्च विपर्ययदुराग्रहः ॥४३॥
वर्तमान प्रतिबन्धों में से पहला तो विषयासक्ति है ।
दूसरा प्रज्ञा की मन्दता है । तीसरा कुतर्क है [जिसके कारण
श्रुति के अर्थ की अन्यथा ऊहना की जाती है] चौथा प्रति-
बन्ध अपने विपरीत ज्ञान पर दुराग्रह करते जाना है । [आत्मा
कर्ता भोक्ता है, यह विपरीत ज्ञान कहाता है । इस बात पर
बिना युक्ति के डटे रहना चौथा प्रतिबन्ध है । [इन चारों में
से कोई भी एक हो तो ज्ञान का उदय नहीं होता । ]
शमाद्यैः श्रवणद्यैश्च तत्रतत्रोचितैः क्षयम् ।
नीतेऽस्मिन् प्रतिबन्धेऽतः स्वस्य ब्रह्मत्वमश्नुते ॥४४॥
शम दम उपरति आदि तथा श्रवण मनन निदिध्यासनों
में से जो जो जिस जिस प्रतिबन्ध को हटा सकते हों,
उन उन से उस उस प्रतिबन्ध के नष्ट कर दिये जाने पर,
अपने आपही अपने ब्रह्मभाव की प्राप्ति होजाती है ।
आगामिप्रतिबन्धश्च वामदेवे समीरितः ।
एकेन जन्मना क्षीणो, भरतस्य त्रिजन्मभिः ॥४५॥