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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 379

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७
मणिप्रभा को मणि समझ कर उठाने दौड़ा है, उस का काम सिद्ध
होजाता है—उसको मणि मिल जाती है । दूसरे को मणि नहीं
मिलती । प्रयोजनसिद्धि में यह विषमता पायी जाती है।]
दीपोऽपवरकस्यान्तर्वर्तते तत्प्रभा बहिः ।
दृश्यते द्वार्यथान्‍यत्र तद्वद् दृष्टा मणिप्रभा ॥३॥
किसी एक मकान में कोई दीपक रक्खा है उसकी प्रभा
किसी तंग झरोके में को निकल कर बाहर रत्न सी दीखती है ।
किसी दूसरे मकान में कोई रत्न रक्खा है, उसकी प्रभा भी किसी
झरोके में को होकर बाहर रत्न सी ही दीखती है ।
दूरे प्रभाद्वयं दृष्ट्वा मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
प्रभायां मणिबुद्धिस्तु मिथ्याज्ञानं द्वयोरपि ॥४॥
वैसी दो प्रभाओं को दूर से देखकर ‘यह मणि है’ ‘यह मणि
है’ यह समझ कर दो पुरुष उठाने दौड़ते हैं। उन दोनों ने जो
कि प्रभा को मणि समझा है उन दोनों की ही समझ भ्रम है।
न लभ्यते मणि र्दीपप्रभां प्रत्यभिधावता ।
प्रभायां धावतावश्यं लभ्येतैव मणिर्मणेः ॥५॥
यद्यपि दीपक की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ने वाले
पुरुष को मणि नहीं मिलती, परन्तु मणि की प्रभा को मणि
समझ कर दौड़ने वाला तो मणि को पा ही लेता है ।
दीपप्रभामणिभ्रान्ति र्विसंवादिभ्रमः स्मृतः ।
मणिप्रभामणिभ्रान्तिः संवादिभ्रम उच्यते ॥६॥
दीपक की प्रभा में जो मणि की भ्रान्ति है, उसे ‘विसं-
वादिभ्रम’ किंवा ‘विफलभ्रम’ कहा गया है [ क्योंकि उससे
मणि का लाभ नहीं होता ] जो तो मणि की प्रभा में मणि