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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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जाता है [मिथ्याज्ञान तो वह तभी होता है जब कि उस ज्ञान
का विषय असत्य हो] यहाँ तो प्रमाण भूत शास्त्र के द्वारा ही
विष्णु आदि की मूर्ति का ज्ञान हमें मिलता है [फिर उसे
अतत्वज्ञान कैसे कह दें ?]
सच्चिदानन्दरूपस्य शास्त्राद् भानेऽप्यनुल्लिखन्।
प्रत्यञ्चं साक्षिणं तत्तु ब्रह्म साक्षान्न वीक्षते ॥१८॥
शास्त्र से सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म का भान हो जाने पर
भी, जब तक कोई उस ब्रह्म को प्रत्यगात्मरूप से [साक्षिरूप से]
नहीं जान लेता है, तबतक कहा जाता है कि वह ब्रह्म को
साक्षात् नहीं देख रहा है ।
शास्त्रोक्तेनैव मार्गेण सच्चिदानन्दनिश्चयात् ।
परोक्षमपि तज्ज्ञानं तत्वज्ञानं न तु भ्रमः ॥१९॥
वह ज्ञान यद्यपि परोक्ष ही होता है परन्तु शास्त्रोक्त रीति
से ही ब्रह्म के सच्चिदानन्द रूपका निश्चय करा देने के कारण
उसे तत्वज्ञान ही मानना चाहिये। वह ज्ञान भ्रम ज्ञान नहीं है।
ब्रह्म यद्यपि शास्त्रेषु प्रत्यक्त्वेनैव वर्णितम् ।
महावाक्यैस्तथाप्येतद् दुर्बोधमविचारिणः ॥२०॥
वेदान्तों [के महावाक्यों] ने तो ब्रह्म को प्रत्यगात्मा ही कहा
है परन्तु जिस अविचारी [पुरुष ने अन्वयव्यतिरेक से तत् त्वं
पदार्थों का विवेक नहीं किया है उस] के लिये यह बात
अत्यन्त ही दुर्बोध होती है [इसी कारण कहते हैं कि केवल
वाक्य से प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु विचार
सहित वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है ]