पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३६४ पञ्चदशी
वेदवाक्यानि निर्णोतु मिच्छन् मीमांसतां जनः ।
आप्तोपदेशमात्रेण ह्यनुष्ठानं हि सम्भवेत् ॥२९॥
वेद वाक्यों का निर्णय चाहने वाला आजकल का पुरुष,
अपनी बुद्धि को सन्तुष्ट करने के लिये उनका विचार करता
है तो करे । उन कर्मों का अनुष्ठान तो केवल इतने से ही हो
सकता है कि वे आप्तों के उपदेश हैं ।
ब्रह्मसाक्षात्कृति स्त्वेवं विचारेण विना नृणाम् ।
आप्तोपदेशमात्रेण न सम्भवति कुत्रचित् ॥३०॥
कर्मानुष्ठान की तरह, विचार किये विना केवल आप्त
पुरुष के कहदेने से ही ब्रह्म साक्षात्कार तो कभी भी संभव
नहीं है ।
परोक्षज्ञान मश्रद्धा प्रतिबध्नाति नेतरत् ।
अविचारोऽपरोक्षस्य ज्ञानस्य प्रतिबन्धकः ॥३१॥
अश्रद्धा ही परोक्षज्ञान को होने से रोकती रहती है, अवि-
चार नहीं, [जब अश्रद्धा टूट जाती है तब एक बार के उपदेश
से ही परोक्षज्ञान हो सकता है] अविचार तो अपरोक्षज्ञान का
प्रतिबन्धक है । [विचार के द्वारा जब तक अविचार को निवृत्त
नहीं कर दिया जाता तब तक अपरोक्षज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता
इस कारण विचार करना चाहिये ।]
विचार्याप्यापरोक्ष्येण ब्रह्मात्मानं न वेत्ति चेत् ।
आपरोक्ष्यावसानत्वादू भूयो भूयो विचारयेत् ॥३२॥
'तत्' 'त्वं' पदार्थों को विचार कर भी यदि ब्रह्म और आत्मा
की एकता को प्रत्यक्षरूप में नहीं जान सका है तो बार बार
विचार ही करना चाहिये । क्योंकि विचार की समाप्ति तभी