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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 380 of 726

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Page 380

३५८ पञ्चदशी

की भ्रान्ति है, उसको 'संवादिभ्रम' किंवा 'सफलभ्रम' कहते
हैं [क्योंकि उस भ्रमसे मणि का लाभ हो ही जाता है]
बाष्पं धूमतया बुद्ध्वा तत्राङ्गारानुमानतः ।
वह्निर्यदृच्छया लब्धः स संवादिभ्रमो मतः ॥७॥
किसी ने किसी देशमें वाष्प [भाप] को देखा उसे धूम
समझ कर उस देश में अंगारों का अनुमान किया और वहां से
अग्नि को लेने चल पड़ा। अब यदि दैवगति से उसे वहां अग्नि
मिलजाय तो उसका वाष्प को धूम समझना 'सफलभ्रम'
माना गया है।
गोदावर्युदके गङ्गोदकं मत्वा विशुद्धये ।
संप्रोक्ष्य शुद्धि माप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥८॥
गोदावरी और गंगा का जल दोनों ही शुद्धि कारक माने
जाते हैं। जो तो गोदावरी के जल को गंगा जल समझ कर
उससे शुद्ध होने के लिये प्रोक्षण करता है, वह भी शुद्ध हो
जाता है। गोदावरी के जल को गंगाजल समझना भ्रम तो
है, परन्तु इसे 'संवादिभ्रम' कहते हैं।
ज्वरेणार्त्तः सन्निपातं भ्रान्त्या नारायणं स्मरन् ।
मृतः स्वर्गमवाप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥९॥
ज्वर से जिसे सन्निपात होगया हो, सन्निपात के पागल-
पन में यदि वह नारायण का स्मरण भ्रम से भी करने लगे,
तो वह मर कर स्वर्ग को जाता है। यह भी संवादिभ्रम ही है।
प्रत्यक्षस्यानुमानस्य तथा शास्त्रस्य गोचरे।
उक्तन्यायेन सवादिभ्रमाः सन्ति हि कोटिशः ॥१०॥