पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextॐ
ध्यानदीपप्रकरणम्
संवादिभ्रमवद् ब्रह्मतत्त्वोपास्त्यापि मुच्यते ।
उत्तरे तापनीयेऽतः श्रुतोपास्तिरनेकधा ॥१॥
जो मनुष्य संवादिभ्रम में आकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता
है, जैसे उसे उसकी अभिप्रेत वस्तु मिल ही जाती है, उसी
प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना करने से भी मोक्ष मिल जाता है
[यद्यपि यह मोक्ष का सीधा रास्ता नहीं है] इसी कारण तापनीय
उपनिषत् में अनेक प्रकार से ब्रह्मतत्व की उपासनायें सुनी गयी हैं।
जिन लोगों ने उपनिषदों का श्रवण कर लिया हो और बुद्धि
की मन्दता आदि किसी प्रतिबन्ध से वाक्यार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान
उत्पन्न न होता हो, उसके लाभ के लिए, अपरोक्षज्ञान को पैदा
कर के मोक्ष दिलाने वाली उपासनाओं का विधान, इस प्रकरण
में किया है ।
मणिप्रदीपप्रभयो र्मणिबुद्ध्याभिधावतोः ।
मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ॥२॥
जो मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ता
है और जो दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने
दौड़ पड़ा है, यद्यपि उन दोनों ही को मिथ्याज्ञान तो समान ही
है, तो भी प्रयोजनसिद्धि में विषमता [फ़र्क] पायी जाती है।