पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३६२ पंचदशी
देहाद्यात्मत्वविभ्रान्तौ जाग्रत्यां न हठात् पुमान्।
ब्रह्मात्मत्वेन विज्ञातुं क्षमते मन्दधीत्वतः ॥२१॥
देहादि को आत्मा समझने का भ्रम जब तक किसी को
बना हुआ है, तब तक कोई भी पुरुष मन्द बुद्धि होने के
कारण, ब्रह्म को आत्मा जान ही नहीं सकता [ ब्रह्मज्ञान का
विरोधी जो देहादियों में आत्मता का भ्रम बना हुआ है उस
भ्रम को विचार ही हटा सकता है—उस भ्रम को हटाने के
लिये केवल विचार की ही आवश्यकता है]
ब्रह्ममात्रं सुविज्ञेयं श्रद्धालुः शास्त्रदर्शिनः ।
अपरोक्षद्वैतबुद्धिः परोक्षाद्वैतबुद्ध्यनुद् ॥२२॥
जो श्रद्धालु हैं, जो शास्त्रदर्शी हैं, उसको ब्रह्म का परोक्ष
ज्ञान होजाना तो बड़ा ही सुकर है। क्योंकि अपरोक्षद्वैत बुद्धि
परोक्ष अद्वैत बुद्धि को नष्ट करती ही नहीं।
अपरोक्षशिलाबुद्धिर्न परोक्षेशतां नुदेत् ।
प्रतिमादिषु विष्णुत्वे को वा विप्रतिपद्यते ॥२३॥
लोक में भी देखलो, पत्थर की प्रतिमा में जो प्रत्यक्ष शिला
बुद्धि होती है, वह उसके परोक्ष ईश्वरपने को हटा नहीं
देती। प्रतिमा आदि को विष्णु मानते हुए किसी को दुविधा
नहीं होती।
अश्रद्धालो रविश्वासो नोदाहरणमर्हति ।
श्रद्धालुारेव सर्वत्र वैदिकेष्वधिकारतः ॥२४॥
इस मामले में अश्रद्धालु लोगों के अविश्वास का उदा-
हरण देना ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक कामों में सब जगह
श्रद्धालु ही अधिकारी होता है।