पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextभी अपरोक्ष ज्ञान होता है। दैनिक व्यवहार में भी देख लो
कि—पठन पाठन आदि कामों में पहले अभ्यास किये हुए
विचार से कभी कभी अगले दिन बिना ही याद किये स्मरण
आ जाता है।
बहुवारमधीतेऽपि तदा नायाति चेत् पुनः।
दिनान्तरेऽनधीत्यैव पूर्वाधीतं स्मरेत् पुमान् ॥३६॥
बहुत बार याद करने पर भी, उस दिन यदि याद नहीं
आता,तो कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन बिना ही याद
किये पहले पढ़े हुए पाठ याद आ जाते हैं।
कालेन परिपच्यन्ते कृषिगर्भादयो यथा।
तद्वदात्मविचारोपि शनैः कालेन पच्यते ॥३७॥
खेती और गर्भ आदि जैसे तुरन्त ही तैयार नहीं हो जाते।
किन्तु पकने में इन्हें कुछ समय लगता ही है। इसी प्रकार
आत्मविचार भी धीरे-धीरे काल पाकर परिपक्व हुआ करता है।
पुनः पुनर्विचारेऽपि त्रिविधप्रतिबन्धतः ।
न वेत्ति तत्वमित्येतद् वार्तिके सम्यगीरितम् ॥३८॥
बार बार विचार करने पर भी, तीन प्रकार के प्रतिबन्धों
के होने से तत्व का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यह बात
वार्तिककार ने भले प्रकार समझायी है ।
कुतस्तज्ज्ञानमिति चेत् तद्धि बन्धपरिक्षयात् ।
असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा ॥३९॥
वार्तिककार ने उन प्रतिबन्धों का निरूपण इन नौ श्लोकों
में यों किया है—जो ज्ञान पहले जन्म में उत्पन्न नहीं हो पाया
था वह ज्ञान अब इस दूसरे जन्म में किस कारण से उत्पन्न