पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 376 of 726
Read in context३५४ पञ्चदशी
जिस जिस प्रक्रिया से पुरुषों को आत्मतत्व का परिज्ञान
हो जाय, वही प्रक्रिया ठीक होती है। यह बात सुरेश्वराचार्य
ने कही है।
वह आत्मतत्व एकरूप ही हैं। तत्व में किसी प्रकार की
भी भिन्नता नहीं है। बोध कराने के प्रकारों में ही भिन्नता पायी
जाती है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना है, या जिन्होंने
बोध कराना है, उन सब के चित्त एक समान नहीं होते। उनके
चित्तों में बड़ी विषमता रहती है। उनके चित्तों की विषमता के
कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। यही
अभिप्राय सुरेश्वराचार्य का है।
श्रुतितात्पर्य मखिल मबुद्ध्वा भ्राम्यते जडः ।
विवेकी त्वखिलं बुद्ध्वा तिष्ठत्यानन्दवारिधौ ॥७४॥
श्रुति का अर्थ तो एक ही हो सकता है। फिर भी जो लोग
विरुद्ध अर्थ करके आपस में विवाद करते हैं उसका कारण यह
है कि—जड लोग श्रुति के पूरे तात्पर्य को न समझ कर भ्रम
में पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को
समझ कर आनन्दसमुद्र में मग्न रहने लगते हैं।
मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्वेष यथा तथा ।
चिदाकाशस्य नो हानि र्न वा लाभ इति स्थितिः॥७५॥
विवेकी लोगों का तो यह निश्चय होता है कि—यह माया
रूपी मेघ, जगत् रूपी जल को, जैसे तैसे भले ही बरसाता रहो।
इसके बरसने से चिदाकाश का कुछ भी हानि या लाभ नहीं
होता है। यही सच्ची स्थिति भी है।