पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
चित्रदीपप्रकरणम् १४९
चित्रदीपप्रकरणम् १४९
[जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब मन उत्पन्न
हो जाता है। जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता जब केवल
अपने आपे का बोध ही रहता है तब बुद्धि का राज्य रहता
है । बुद्धि का काम आपे को जानना है मन का काम बाहर
के पदार्थों की देख भाल करना है !]
अहंप्रत्ययबीजत्व मिदंवृत्तेरिति स्फुटम् ।
अविदित्वा स्वमात्मानं बाह्यं वेत्ति न तु क्वचित् ॥७१॥
[मन और विज्ञान का कार्यकारणभाव इस श्लोक में
बताया गया है ] यह ‘इदंवृत्ति’ [ बाहर के पदार्थों की
प्रतीति ] ‘अहं प्रत्यय’ से [ मैं इस ज्ञान के अन्दर से ] उत्पन्न
हुआ करती है । जभी तो अपने आपे को पहले बिना जाने
कहीं भी कोई बाह्य पदार्थ को नहीं जानता। [तात्पर्य यह कि
पहले अहंवृत्ति [ मैं भाव ] उदय हो लेती है, तब पीछे से
इदंवृत्ति पैदा हुआ करती है। यों इन दोनों में कार्य कारण
भाव है।]
क्षणे क्षणे जन्मनाशावहंवृत्तेर्मितौ यतः ।
विज्ञानं क्षणिकं तेन, स्वप्रकाशं स्वतो मितेः ॥७२॥
इस अहंवृत्ति का जन्म और नाश क्षण क्षण में होता
रहता है । कभी यह पैदा होती है, क्षण भर बाद फिर मर
जाती है । यों अनुभव से विज्ञान (अहंवृत्ति) की क्षणिकता
सिद्ध हो जाती है । अपने से ही प्रमित होने के कारण यह
विज्ञान स्वयं प्रकाश भी है । [क्योंकि यह ज्ञान ही अपने
आपको जानता है, इसलिये यह स्वयं प्रकाश है ।]
१५० पञ्चदशी
विज्ञानमयकोशोयं जीव इत्यागमा जगुः ।
सर्वसंसार एतस्य जन्मनाशसुखादिकः ॥७३॥
'तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तरआत्मा विज्ञानमयः' (तै० २-४)
'विज्ञानं यज्ञं तनुते' (तै० २-५) इत्यादि आगमों ने विज्ञानमय
कोष को ही 'जीव' कहा है । जन्म, नाश तथा सुखादि नामक
यह सम्पूर्ण संसार इस विज्ञानमय कहलाने वाले जीव का
ही तो है ।
विज्ञानं क्षणिकं नात्मा विद्युदभ्रनिमेषवत् ।
अन्यस्यानुपलब्धत्वाच्छून्यं माध्यमिका जगुः ॥७४॥
माध्यमिक नाम के शून्यवादी बौद्ध तो कहते हैं कि—
बिजली, बादल, तथा निमेष के समान क्षण भर में नष्ट हो
जाने वाला क्षणिक विज्ञान, आत्मा नहीं है। इसके अतिरिक्त
और तो कुछ दीखता ही नहीं, इसलिये 'शून्य' ही आत्मा है ।
असदेवेदमित्यादाविदमीव श्रुतं ततः ।
ज्ञानज्ञेयात्मकं सर्वं जगद् भ्रान्तिप्रकल्पितम् ॥७५॥
निरधिष्ठानविभ्रान्ते रभावादात्मनोऽस्तिता ।
शून्यस्यापि ससाक्षित्वा दन्यथा नोक्तिरस्य ते ॥७६॥
उन शून्यवादियों का यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि बिना
अधिष्ठान का तो कोई भ्रम होता ही नहीं। इस कारण से इस
भ्रान्त जगत्कल्पना के अधिष्ठान आत्मा को तो मानना ही पड़ता
है। शून्यवादी का यह शून्य भी तो ससाक्षिक ही होना
चाहिये । [इस शून्य का साक्षी अर्थात् शून्य को जानने वाला
भी तो कोई होना ही चाहिये] यदि उस साक्षी को न मानोगे
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१
तो तुम्हारे [बौद्ध के] मत में शून्य का कहना भी सिद्ध नहीं
हो सकेगा। [यों शून्य को जानने वाला तत्व तो तुम्हें भी
मानना ही पड़ेगा।]
अन्यो विज्ञानमयत आनन्दमय आन्तरः।
अस्तीत्येवोपलब्धव्य इति वैदिकदर्शनम् ॥७७॥
[सभी को मना करते जाते हो फिर आत्मा क्या चीज
है? इस बात का उत्तर इस श्लोक में दिया है] तस्माद्वा एतस्मा
द्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः (तै० २-५) अस्तीत्येवोपलब्ध-
व्यस्तत्वभावेन (क० २-६-१३) इन श्रुतियों के आधार से इन
सब से भिन्न आनन्दमय आत्मा मानना चाहिये। ऐसा वैदिक
सिद्धान्त है।
अणुर्महान् मध्यमो वेत्येवं तत्रापि वादिनः।
बहुधा विवदन्ते हि श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥७८॥
['आत्मस्वरूप में ही नहीं उसके परिमाण में भी लोगों
के अनेक मत हैं' यह अब दिखाया जाता है] श्रुति और युक्ति
के सहारे से वादी लोग आत्मा को अणु, महान् या मध्यम
बताते हैं और आपस में एक दूसरे से अनेक प्रकार के विवाद
करते हैं।
अणुं वदन्त्यन्तरालाः सूक्ष्मनाडीप्रचारतः ।
रोम्णः सहस्रभागेन तुल्यासु प्रचरत्ययम् ॥७९॥
अणुत्ववादी लोग सूक्ष्म नाडियों में प्रचार के कारण
आत्मा को अणु कहते हैं। रोम के सहस्र भाग के तुल्य जो
सूक्ष्म नाडियां हैं उनमें भी वह घूमा करता है। [ऐसी सूक्ष्म
नाडियों में अणु होने के बिना आत्मा का प्रचार कैसे हो ?]
१५२ पञ्चदशी
अणोरणीयानेषोऽणुः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं त्विति ।
अणुत्वमाहुः श्रुतयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८०॥
अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठ० १-२-२०) एषोऽणुरात्मा
चेतसा वेदितव्यः सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं त्विति (मुण्ड० ३-१-९) इत्यादि
श्रुतियों में अनेक स्थान पर आत्मा को अणु से भी अणीयान्
तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कहा गया है ।
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाहापरा श्रुतिः ॥८१॥
वालाग्र का सौवां भाग लिया जाय, फिर उसके भी सौवें
भाग की कल्पना की जाय तो उस अत्यन्त छोटे भाग को ही जीव
जानना चाहिये । यह भी एक श्रुति में कहा है ।
दिगम्बरा मध्यमत्व माहुरापादमस्तकम् ।
चैतन्यव्याप्तिसंदृष्टे रानखाग्रश्रुतेरपि ॥८२॥
दिगम्बर [जैन] लोग आत्मा को मध्यम परिमाण वाला
मानते हैं। क्योंकि चैतन्य की व्याप्ति पैर से लेकर चोटी पर्यन्त
देखी जाती है । स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यः इस श्रुति से भी
वे आत्मा को मध्यम परिमाण वाला सिद्ध करते हैं।
सूक्ष्मनाडीप्रचारस्तु सूक्ष्मैरवयवैर्भवेत् ।
स्थूलदेहस्य हस्ताभ्यां कञ्चुकप्रतिमोकवत् ॥८३॥
आत्मा को मध्यम परिमाण वाला मानने पर भी उस
आत्मा का सूक्ष्म नाडियों में प्रचार तो सूक्ष्म अवयवों के द्वारा
ठीक इसी प्रकार हो जायगा. जैसे कि देह के हाथ आदि अवयव
जब कुरते में घुस जाते हैं तब वह देह का ही कुरते में घुसना
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
माना जाता है [आत्मा के अवयव जब सूक्ष्म नाडियों में
प्रचार करेंगे तब उसे आत्मा का ही प्रचार मान लिया जायगा।]
न्यूनाधिकशरीरेषु प्रवेशोऽपि गमागमैः ।
आत्मांशानां भवेत्, तेन मध्यमत्वं विनिश्चितम् ॥८४॥
आत्मा का जब एक नियत मध्यम परिमाण मानेंगे तब
जब वह छोटे बड़े शरीरों में प्रवेश करेगा, उस समय आत्मा
के कुछ अवयव घट बढ़ जाया करेंगे। फिर जैसे देह छोटे
बड़े हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मा के अंश भी घट बढ़ जायँगे।
यों आत्मा तो मध्यम परिमाण ही है ऐसा उन्होंने अपने मन
को समझा रक्खा है।
सांशस्य घटवन्नाशो भवत्येव, तथा सति ।
कृतनाशाकृताभ्यागमयोः को वारको भवेत् ॥८५॥
आत्मा को सावयव मानने पर घटादि की तरह उसका
नाश होगा ही। फिर कृतनाश और अकृताभ्यागम नाम के
दोषों को हटानेवाला कौन होगा उसे बताओ ? [किये हुए
पुण्य पाप जब बिना भोग दिये नष्ट हो जाते हैं तब उसे 'कृत-
नाश' कहते हैं। जब तो बिना किये ही कुछ भोगना पड़ जाता
है तब वह 'अकृताभ्यागम' कहा जाता है। आत्मा को अनित्य
मानने में ये दो दोष आते हैं।]
तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः ।
आकाशवत् सर्वगतो निरंशः श्रुतिसम्मतः ॥८६॥
यों परिशेष से यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा तो
महान् [विभु=व्यापक] ही है। यह न तो अणु है और न यह
मध्यम परिमाण वाला ही है। आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः
१०
१५४ पञ्चदशी
निष्कलं निष्क्रियम् [ श्वेता० ६-१९ ] इत्यादि श्रुतियें आत्मा को
आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक तथा निरवयव मानती हैं ।
इत्युक्त्वा तद्विशेषे तु बहुधा कलहं ययुः ।
अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपश्चिदचिद्रूप इत्यपि ॥८७॥
यों आत्मा की विभुता तो सिद्ध हो गयी । परन्तु
उसके विशेष धर्मों के विषय में भी अनेक विवाद चलते हैं ।
कोई कहता है आत्मा 'अचिद्रूप' है। दूसरा आत्मा को 'चिद्रूप'
मानता है । कोई उसे चिदचिद्रूप भी बता देता है ।
प्राभाकरास्तार्किकाश्च प्राहुरस्याचिदात्मताम् ।
आकाशवद् द्रव्यमात्मा शब्दवत् तद्गुणश्चितिः ॥८८॥
प्राभाकर और तार्किक दोनों ही इसको अचिद्रूप बताते
हैं। वे कहते हैं कि—आत्मा भी आकाश की तरह एक द्रव्य है।
शब्द जैसे आकाश का गुण है इसी प्रकार चिति [ चैतन्य ]
उस. आत्मा का गुण है। [ इस चैतन्य गुण ने ही इस आत्मा
को पृथिवी आदि सब से भिन्न कर दिया है ] ।
इच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च धर्माधर्मौ सुखासुखे ।
तत्संस्काराश्च तस्यैते गुणाश्चितिवदीरिताः ॥८९॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्माधर्म, सुख, दुःख, तथा उनके
संस्कार ये सब चेतना के समान ही आत्मा के गुण हैं ।
आत्मनो मनसा योगे स्वादृष्टवशतो गुणाः ।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते सुषुप्तेऽदृष्टसंक्षयात् ॥९०॥
आत्मा का जब मन से योग हो जाता है, तब अपने अदृष्ट
के प्रताप से ये गुण उत्पन्न हो जाते हैं, तथा सुषुप्ति के समय
जब अदृष्ट का क्षय हो जाता है तब ये गुण नष्ट हो जाते हैं ।
चितिमत्त्वाच्चेतनोऽयमिच्छाद्वेषप्रयत्नवान् ।
स्याद्धर्माधर्मयोः कर्ता भोक्ता दुःखादिमत्त्वतः ॥९१॥
चिति नामक गुणवाला होने से यह चेतन है [ यों स्वयं
अचिद्रूप होने पर भी इसको चेतन मान लिया जाता है ]
चेतन होने का एक और भी प्रमाण है कि इसमें इच्छा, द्वेष
तथा प्रयत्न नाम के गुण विद्यमान हैं। यह आत्मा धर्माधर्म
का कर्ता है। दुःखादिवाला होने से इसे भोक्ता माना जाता है
[ यों उसमें ईश्वर तत्व से विलक्षणता पायी जाती है। ]
यथात्र कर्मवशतः कादाचित्कं सुखादिकम् ।
तथा लोकान्तरे देहे कर्मणेच्छादि जन्यते ॥९२॥
जैसे कर्म के वश यहाँ ( इस लोक में ) कभी कभी होने
वाले सुखादि होते हैं, इसी प्रकार लोकान्तर में [ मिले हुए ]
दूसरे देह में भी, कर्म से ही इच्छादि हो जाते हैं।
विभु होने पर आत्मा लोकान्तर गमन आदि कैसे करेगा ?
इसका समाधान यह है कि—जैसे इस देह में कर्म के वश
इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं तो इसे यहाँ आत्मा का रहना मान
लिया जाता है, इसी प्रकार कर्म के वश जब लोकान्तर में
देहान्तर मिलता है तब उस देहावच्छिन्न आत्मा के प्रदेश में
ही सुखादि उत्पन्न होने लगते हैं और वहाँ आत्मा का गमनादि
मान लिया जाता है। वस्तुतः आत्मा में गमनादि कुछ
नहीं होता।
एवं च सर्वगस्यापि संभवेतां गमागमौ ।
कर्मकाण्डः समग्रोऽत्र प्रमाणमिति तेऽवदन् ॥९३॥
इस प्रकार सर्वग [ सर्वत्र व्यापक ] आत्मा का भी आना
१५६ पञ्चदशी
जाना संभव हो जाता है। आत्मा में कर्तृत्वादि धर्म रहते हैं
इस बात में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड प्रमाण है ऐसा वे कहते हैं।
[ यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मकाण्ड की रचना क्यों की
गयी है ? ]
आनन्दमयकोशो यः सुषुप्तौ परिशिष्यते ।
अस्पष्टचित् स आत्मैषां पूर्वकोशोऽस्य ते गुणाः ॥९४॥
सुषुप्ति के समय जो 'आनन्दमय कोश' शेष रह जाता है
जिसमें चेतनता अस्पष्ट रूप से रहती है, कोशों में सबसे
पहला कोश यह आनन्दमय कोश ही इन प्रभाकर आदियों का
आत्मा है। वे पूर्वोक्त इच्छा आदि इसी के गुण हैं। [ तात्पर्य
यह कि जिस आत्मा को हमने पहले आनन्दमय कहा था
इच्छादि वाला वही उनका सम्मत आत्मा है । ]
गूढं चैतन्यमुत्प्रेक्ष्य जडबोधस्वरूपताम् ।
आत्मनो ब्रुवते भाट्टाश्चिदुत्प्रेक्षोत्थितस्मृतेः ॥९५॥
कुमारिल भट्ट के अनुयायी तो इसी आत्मा के गूढ अर्थात्
अस्पष्ट चैतन्य की ऊहना कर लेते हैं फिर इसको चैतन्य और
जड उभय रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि सोकर उठे हुए पुरुष
को जो स्मृति होती है उससे चैतन्य की उत्प्रेक्षा होती है। सो-
कर उठा हुआ पुरुष जब स्मरण करता है तब उससे सुषुप्ति
के समय के चैतन्य की ऊहना कर ली जाती है।
जडो भूत्वा तदास्वाप्समिति जाड्यस्मृतिस्तदा ।
विना जाड्यानुभूतिं न कथंचिदुपपद्यते ॥९६॥
[ चैतन्य की उत्प्रेक्षा करने की उनकी परिपाटी यह है
'कि ]—सुषुप्ति के समय 'मैं जड होकर सोया पड़ा था' ऐसा
चित्रदीपप्रकरणम् १५७
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एक जडता का स्मरण सोकर उठे हुए पुरुषों को होता है । सो
यह स्मरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सुषुप्ति काल
की जडता को उसने अनुभव न किया हो [ बस इसी से उस
समय की जड़ता का अनुभव मान लिया जाता है । ]
द्रष्टुर्दृष्टेरलोपश्च श्रुतः सुप्तौ ततस्त्वयम् ।
अप्रकाशप्रकाशाभ्यामात्मा खद्योतवद् युतः ॥९७॥
नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् [बृह० ४-३-२३]
इस श्रुति में कहा है कि द्रष्टा आत्मा की जो स्वरूपभूत दृष्टि
है उसका लोप कभी नहीं होता । क्योंकि वह दृष्टि विनाश-
रहित स्वभाव वाली है । इस प्रमाण से भी यही सिद्ध होता
है कि यह आत्मा खद्योत के समान प्रकाश और अप्रकाश
[ स्फुरण और अस्फुरण ] दोनों ही से युक्त है ।
निरंशस्योभयात्मत्वं न कथंचिद्घटिष्यते ।
तेन चिद्रूप एवात्मेत्याहुः सांख्यविवेकिनः ॥९८॥
निरंश [ निरवयव ] पदार्थ किसी प्रकार भी उभय रूप
नहीं हो सकता । इस कारण सांख्यविवेकी यह मानते हैं कि
आत्मा तो केवल चिद्रूप ही है ।
जाड्यांशः प्रकृते रूपं विकारि त्रिगुणं च तत् ।
चितो भोगापवर्गार्थं प्रकृतिः सा प्रवर्तते ॥९९॥
[जाड्य का जो स्मरण उठे हुए पुरुषों को होता है उस
स्मरण में] जो जाड्य भाग है वह तो प्रकृति का रूप है । वह
विकारी है । वह सत्व रज तम इन त्रिगुणात्मक है । चेतन
पुरुष को भोग और अपवर्ग दिलाने के लिये वह प्रकृति प्रवृत्त
हुआ करती है ।
जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात्
१५८ पञ्चदशी
तक यह प्रकृति उसे भोग देती है जब यह पुरुष भोगों से उकता
जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात्
मुक्ति दे देती है ]
असङ्गायाश्चिते र्बन्धमोक्षौ भेदाग्रहान्मतौ ।
बन्धमुक्तिव्यवस्थार्थं पूर्वेषामिव चिद्भिदा ॥११०॥
यद्यपि चिति असंग ही है। परन्तु भेदाग्रह के कारण
बंध भी जाती है और मुक्त भी हो जाती है। बन्ध और
मुक्ति की व्यवस्था के लिये ये सांख्य भी पहलों [नैयायिकों,
प्राभाकरों, भाट्टों] की तरह चेतनों का भेद मानते हैं।
प्रश्न यह था कि चिति जब असंग है और प्रकृति तथा
पुरुष अत्यन्त विविक्त है, फिर विचारी प्रकृति की प्रवृत्ति
से असंग पुरुष को भोग और अपवर्ग कैसे होगये ? इसका
उत्तर यह है कि—प्रकृति और पुरुष के भेद को ग्रहण न करने
से भोग और अपवर्ग [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही हो
गये हैं।
महतः परमव्यक्तमिति प्रकृति रुच्यते ।
श्रुतावसङ्गता तद्वदसङ्गो हीत्यतः स्फुटा ॥१११॥
महतः परमव्यक्तम् [ कठ० ३-११ ] इस श्रुति में प्रकृति
के होने का वर्णन है। असङ्गो ह्ययं पुरुषः [ बृ० ४-३-१५ ]
इस श्रुति में पुरुष की असंगता का प्रतिपादन किया गया है।
चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् ।
ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यः परः श्रुतः ॥१०२॥
[ जीव के विषय में ही नहीं ईश्वर विषय में भी वादियों
के बड़े उलटे सीधे विचार हैं। उन्हीं को अब दिखाया जाता
चित्रदीपप्रकरणम् १५९
चित्रदीपप्रकरणम् १५९
है ] योग वाले कहते हैं कि-चेतन आत्माओं की सन्निधि में
जो प्रकृति प्रवृत्त होती है उस प्रकृति को नियम में रखनेवाला
'ईश्वर' है । उसी को श्रुति में जीवों से 'पर' कहा गया है ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेश इति हि श्रुतिः ।
आरण्यके संभ्रमेण ह्यन्तर्याम्युपपादितः ॥१०३॥
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः [ श्वे० ६-१६ ] इस श्रुति में जीव से
पर ईश्वर का प्रतिपादन किया गया है कि प्रधान तथा क्षेत्रज्ञों,
[ जीवों ] का पालक, सत्त्वादि गुणों का ईश, किंवा नियामक
है । बृहदारण्यक के अन्तर्यामि ब्राह्मण में तो बड़ी तत्परता से
'अन्तर्यामी' का उपपादन किया गया है ।
अत्रापि कलहायन्ते वादिनः स्वस्वयुक्तिभिः ।
वाक्यान्धपि यथाप्रज्ञं दाढर्यायोदाहरन्ति हि ॥१०४॥
इस ईश्वर विषय में भी वादी लोग अपनी अपनी युक्तियों
से विवाद करते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अपने
मत की दृढ़ता के लिये श्रुति वाक्यों का उद्धार भी करते हैं ।
क्लेशकर्मविपाकै स्तदाशयैरप्यसंयुतः ।
पुंविशेषो भवेदीशो जीववत् सोप्यसंगचित् ॥१०५॥
अविद्या आदि पाँच क्लेशों, चारों प्रकार के कर्मों, कर्म-
विपाकों तथा इन सब के संस्कारों से अस्पृष्ट रहनेवाला, जो
कोई पुरुषविशेष है, वही ईश्वर है । वह भी जीव के समान
ही असङ्ग और चिद्रूप है ।
तथापि पुंविशेषत्वाद् घटतेऽस्य नियन्तृता ।
अव्यवस्थौ बन्धमोक्षा वापतेतामिहान्यथा ॥१०६॥
यद्यपि वह ईश्वर असङ्गचित् है तौ भी, पुरुषविशेष होने
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के कारण, यह नियामक हो सकता है। ईश्वर को यदि निया-
मक न मानें तो बन्धामोक्ष की कोई व्यवस्था ही इस लोक
में न रहेगी। [फिर इस व्यवस्था को कौन करेगा ?]
भीषास्मादित्येवमादा वसङ्गस्य परात्मनः ।
श्रुतं तद्युक्तमप्यस्य क्लेशकर्माद्यसंगमात् ॥१०७॥
भीषास्माद्वातः पवते [ तै० २-८ ] इत्यादि श्रुतियों में इस
असंग परमात्मा को नियन्ता बताया गया है। उसमें जीवों
में पाये जाने वाले क्लेशादि के न होने से उसकी नियामकता
युक्तिसंगत भी है।
जीवानाम्प्यसङ्गत्वात् क्लेशादिर्न ह्यथापि च ।
विवेकाग्रहः क्लेशकर्मादि प्रागुदीरितम् ॥१०८॥
असङ्ग होने के कारण यद्यपि जीव भी क्लेशादि से रहित ही
हैं परन्तु विवेकाग्रह [ प्रकृति और पुरुष के भेद को न
समझने ] के कारण इन जीवों को क्लेशादि होते हैं, यह बात हम
पहले कह चुके हैं।
नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छा गुणानीशस्य मन्वते ।
असङ्गस्य नियन्तृत्व मयुक्तमिति तार्किकाः ॥१०९॥
तार्किक लोग तो असंग आत्मा के नियामकपने को सहन
ही नहीं करते इससे उन्होंने तो जीवों से विलक्षण रखने के लिये
ईश्वर में नित्य ज्ञान, नित्य प्रयत्न तथा नित्य इच्छा को माना है।
पुंविशेषत्वमप्यस्य गुणैरेव न चान्यथा ।
सत्यकामः सत्यसंकल्प इत्यादि श्रुतिर्जगौ ॥११०॥
[गुणों ही के कारण उसको पुरुष विशेष मान लिया है।
जीवों के इच्छा आदि गुण अनित्य हैं। ईश्वर के इच्छा आदि
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तीनों गुण नित्य हैं । ] इनके अतिरिक्त जीव और ईश्वर के
विलक्षण होने का और कोई कारण नहीं है । इन गुणों की
नित्यता के विषय में श्रुति ने स्वयं कहा है कि वह् सत्य काम
है सत्य संकल्प है ।
नित्यज्ञानादिमत्त्वेऽस्य सृष्टिरैव सदा भवेत् ।
हिरण्यगर्भ ईशोऽतो लिङ्गदेहेन संयुतः ॥१११॥
ईश्वर को यदि नित्यज्ञानादिवाला मानें तो वह सदा
सृष्टि ही बनाता रहे । इस कारण लिङ्गदेह से युक्त हिरण्यगर्भ
को ही ईश्वर मानना चाहिये । [ समष्टि लिङ्ग शरीर के अभि-
मानी परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं । उसके लिंगदेह अर्थात्
मन में जब इच्छा होगी तभी वह सृष्टि बनायेगा, यों सदा
सृष्टि नहीं रहेगी । कभी कभी होगी । ]
उद्गीथब्राह्मणे तस्य माहात्म्यमतिविस्तृतम् ।
लिङ्गसत्त्वेऽपि जीवत्वं नास्य कर्माद्यभावतः ॥११२॥
इस हिरण्यगर्भ की महत्ता उद्गीथ ब्राह्मण में विस्तारपूर्वक
वर्णित है । लिङ्ग शरीर होने पर भी इसमें जीवभाव तो इस
लिये नहीं आता कि इसके अविद्या, काम तथा कर्म नहीं होते हैं ।
स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते ।
वैराजो देह ईशोऽतः सर्वतो मस्तकादिमान् ॥११३॥
स्थूल देह के बिना तो केवल लिङ्गदेह कहीं भी दीखता नहीं
है, इस कारण स्थूल शरीरों की समष्टि का अभिमानी जो 'विराट्'
है वही ईश्वर है ।
सहस्रशीर्षेत्येवं च विश्वतश्चक्षुरित्यपि ।
श्रुतमित्याहुरनिशं विश्वरूपस्य चिन्तकाः ॥११४॥
सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता ।
१६२ पञ्चदशी
विराट् के उपासक अपने समर्थन में कहते हैं कि सहस्र
शीर्षा पुरुषः [ श्वे० ३-४ ] तथा विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतस्पात् [ श्वे०
३-३ ] इत्यादि वाक्य अनेक बार श्रुतियों में आये हैं । इन
वाक्यों से विराट् के ईश्वरभाव का समर्थन होता है ।
सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता ।
ततश्चतुर्मुखो देव एवेशो नेतरः पुमान् ॥११५॥
उपर्युक्त श्रुति के अनुसार यदि उस ईश्वर को सब ओर
हाथ पैर वाला मान लें तो ऐसी कीड़ियां भी हैं जिनके चारों
ओर हाथ पैर होते हैं वे भी ईश्वर हो जांयगी । इस कारण
चार मुख वाला देवता ही ईश्वर है दूसरा कोई नहीं ।
पुत्रार्थं तमुपासीना एवमाहुः, प्रजापतिः ।
प्रजा असृजतेत्यादिश्रुतिं चोदाहरन्त्यमी ॥११६॥
सन्तान के लिये उसके उपासक लोगों ने यह बात कही
है । वे लोग अपनी पुष्टि में 'प्रजापतिः प्रजा असृजत' इत्यादि
श्रुति का प्रमाण भी देते हैं ।
विष्णोर्नाभेः समुद्भूतो वेधाः कमलजस्ततः ।
विष्णुरेवेश इत्याहुर्लोके भागवता जनाः ॥११७॥
भागवतों का कहना है कि—कमलयोनि विधाता तो विष्णु
की नाभि से उत्पन्न हुआ है । इस कारण 'विष्णु' ही ईश्वर है ।
शिवस्य पादावन्वेष्टुं शार्ङ्ग्यशक्तस्ततः शिवः ।
ईशो न विष्णु रित्याहुः शैवा आगममानिनः ॥११८॥
आगममानी शैव तो कहते हैं कि—शिव के पैरों को
ढूँढते ढूँढते शार्ङ्गी अशक्त हो गया था । इस कारण विष्णु
ईश्वर नहीं है किन्तु 'शिव' ही ईश्वर है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १६३
चित्रदीपप्रकरणम् १६३
पुरत्रयं सादयितुं विघ्नेशं सोऽप्यपूजयत् ।
विनायकं प्राहुरीशं गाणपत्यमते रताः ॥११९॥
गणेश के उपासकों का तो कहना है कि—त्रिपुर को नष्ट
करने के लिये शिव ने भी विघ्नेश की पूजा की थी। इस
कारण वे 'विनायक' को ही ईश्वर मानते हैं।
एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथाऽन्यथा ।
मन्त्रार्थवादकल्पादीनाश्रित्य प्रतिपेदिरे ॥१२०॥
और भी भैरव आदि देवताओं के उपासकों ने अपने अपने
पक्षों के अभिमान में आ आकर मन्त्रों, अर्थवादों, तथा कल्पों
का [झूठ मूठ] सहारा लेकर, कुछ का कुछ वर्णन कर डाला है।
अन्तर्यामिणमारभ्य स्थावरान्तेशवादिनः ।
सन्त्यश्वत्थार्कवंशादेः कुलदैवतदर्शनात् ॥१२१॥
अन्तर्यामी से लेकर स्थावर पर्यन्तों को ईश्वर माननेवाले
लोग संसार में हैं। क्योंकि अश्वत्थ, अर्क, तथा वंशादि भी
कुल के देवता पाये जाते हैं ।
तत्वनिश्चयकामेन न्यायागमविचारिणाम् ।
एकैव प्रतिपत्तिः स्यात् साप्यत्र स्फुटमुच्यते ॥१२२॥
तत्व का निश्चय करने की इच्छा को लेकर जो भी कोई
पुरुष न्याय तथा आगमों का विचार करेंगे, उन सब की तो
एक ही प्रतिपत्ति [ निश्चय ] होगी [ वे सब तो एक ही निश्चय
पर पहुँचेंगे ] उसी निश्चय का वर्णन अब यहाँ स्पष्ट किया
जाता है ।
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१२३ ॥
का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि
१६४ पंचदशी
सम्पूर्ण विचारकों का एकमात्र निश्चय श्रुति के शब्दों में
इस प्रकार है कि—माया को ही प्रकृति [ अर्थात् इस जगत्
का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि
वाले उस अन्तर्यामी को महेश्वर [ किंवा माया का अधिष्ठाता
अथवा इस जगत् का निमित्त कारण ] मान लेना चाहिये ।
इस मायी महेश्वर के अंशरूप जीवों से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त
हो रहा है ।
इति श्रुत्यनुसारेण न्याय्यो निर्णय ईश्वरे ।
तथा सत्यविरोधः स्यात् स्थावरान्तेशवादिनाम् ॥१२४॥
इस श्रुति के अनुसार तो ईश्वर के विषय में ऊपर कहे
हुए सभी निर्णय न्याय्य [ ठीक ] हो जाते हैं । ऐसी सूरत में
जो लोग स्थावरों तक को ईश्वर मानते हैं उन का भी
कोई विरोध नहीं रह जाता है ।
माया चेयं तमोरूपा तापनीये तदीरणात् ।
अनुभूतिं तत्र मानं प्रतिजज्ञे श्रुतिः स्वयम् ॥१२५॥
यह माया तमोरूपा है । तापनीय उपनिषत् में इसको
तमोरूप बताया गया है । श्रुति ने माया को तमोरूप सिद्ध
करने के लिये अनुभव को भी प्रमाण माना है ।
जडं मोहात्मकं तच्चेत्यनुभावयति श्रुतिः ।
आबालगोपं स्पष्टत्वादानन्त्यं तस्य साब्रवीत् ॥१२६॥
श्रुति ने उस अनुभव को यों दिखाया है कि वह [ माया ]
जड है और मोहरूप है । इस जड और मोहरूप माया को
बच्चे और ग्वाले तक सभी जानते हैं । इसी कारण श्रुति ने
इस माया को अनन्त भी कहा है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १६५
चित्रदीपप्रकरणम् १६५
अचिदात्मघटादीनां यत् स्वरूपं जडं हि तत् ।
यत्र कुण्ठीभवेद् बुद्धिः स मोह इति लौकिकाः ॥१२७॥
अचित्स्वरूप जो घटादि पदार्थ हैं, उन का जो स्वरूप है,
वही 'जड' कहाता है । जहाँ जाकर बुद्धि कुण्ठित हो जाय ।
वह 'मोह' कहाता है, ऐसा लौकिक लोग कहते हैं ।
इत्थं लौकिकदृष्ट्यैतत् सर्वैरप्यनुभूयते ।
युक्तिदृष्ट्या त्वनिर्व्वाच्यं नासदासीदिति श्रुतेः ॥१२८॥
इस प्रकार लौकिक दृष्टि से तो उस माया को सभी जड
और मोहरूप अनुभव करत हैं । परन्तु युक्ति की कसौटी पर
तो वह अनिर्वाच्य ही सिद्ध होती है । [ युक्ति की दृष्टि में
तो उसे सत् या असत् कुछ भी नहीं कह सकते ] । नासदासीत्
[ ऋग्वेद ] इस श्रुति में भी उस माया को सदसदनिर्वचनीय
ही कहा गया है ।
नासदासीद् विभातत्वान्नो सदासीच्च बाधनात् ।
विद्यादृष्ट्या श्रुतं तुच्छं तस्य नित्यनिवृत्तितः ॥१२९॥
[ ऊपर की श्रुति का अभिप्राय यह है ] विभात [ सब
को ज्ञात ] होने से वह तत्व असत् नहीं था । नेह नानास्ति किं
चन [ बृ० ४-४-१९ ] इस श्रुति में आत्मा से भिन्न सब तत्वों
का बाध किया है, इस कारण वह तत्व सत् भी नहीं था ।
[ सत् और असत् उभय रूप होना तो किसी की समझ में
आनेवाली बात ही नहीं है । यों वह माया नामक तत्व युक्ति
की दृष्टि से अनिर्वचनीय पदार्थ है ] ज्ञानदृष्टि आ जाने पर
तो उस माया की सदा के लिये निवृत्ति हो जाती है इसी
कारण श्रुति में उस को तुच्छ कहा है । तुच्छमिदं रूपमस्य
१६६ पञ्चदशी
तुच्छाऽनिर्वचनीया च वास्तवी चेत्यसौ त्रिधा ।
ज्ञेया माया त्रिभिर्बोधैः श्रौत-यौक्तिक-लौकिकैः॥१३०॥
श्रौत बोध को मानें तो वह माया 'तुच्छ' है। यौक्तिक
बोध को मानें तो वह 'अनिर्वचनीय' समझ में आती है।
लौकिक बोध पर विश्वास कर बैठें तो उसको 'वास्तविक' ही
मानना पड़ता है। [श्रुति उसे तुच्छ कहती है, युक्ति
उसे अनिर्वचनीय बताती है। लौकिक प्राणी उसे सच्चा
मानते हैं।]
अस्य सत्वमसत्वं च जगतो दर्शयत्यसौ ।
प्रसारणाच्च संकोचाद् यथा चित्रपटस्तथा ॥१३१॥
यह माया कभी तो इस जगत् को सत् दिखाती है और
कभी इसको असत् बता देती है। मानों लपेटने और फैलाने
से कोई चित्रपट कभी चित्रों को सत् और कभी उनको असत्
दिखाता हो ।
अस्वतन्त्रा हि माया स्यादप्रतीतेर्विना चितिम् ।
स्वतन्त्रापि तथैव स्यादसङ्गस्यान्यथाकृतेः ॥१३२॥
चिति [अर्थात् अपने प्रकाशक चैतन्य] के बिना यह
माया प्रतीत ही नहीं होती इस बात पर दृष्टि डालें तो कहना
पड़ता है कि वह माया अस्वतन्त्र है—[स्वाधीन नहीं है]
परन्तु जब यह देखते हैं कि उसने असङ्ग आत्मा को दूसरी
तरह का [ससङ्ग] बना डाला है तब कहना पड़ जाता है कि
वह तो स्वतन्त्र भी है।
कूटस्थासङ्गमात्मानं जगत्त्वेन करोति सा ।
चिदाभासस्वरूपेण जीवेशावपि निर्ममे ॥१३३॥
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
उस माया ने, कूटस्थ असङ्ग आत्मा को बिगाड़ कर, उस
का जगत् बना दिया है। उसी ने चिदाभास स्वरूप से जीव
और ईश्वर का भी निर्माण किया है। [यही उस का अन्यथा-
करण कहाता है।]
कूटस्थ मनुपद्रुत्य करोति जगदादिकम्।
दुर्घटैकविधायिन्यां मायायां का चमत्कृतिः ॥१३४॥
इस माया की होशियारी तो देखो कि—यह माया कूटस्थ
में किसी प्रकार का उपद्रव भी नहीं करती है [उसको
जैसे का तैसा भी रहने देती है] और उसी से जगदादि को
भी बना डालती है। दुर्घट कामों को करने का वीड़ा उठाने
वाली इस माया में यह कोई चमत्कार की बात नहीं है [कि
कूटस्थता को भी बना रहने दे और उसको जगदादिस्वरूप भी
कर डाले। ऐसा न करे तो उसे माया ही कौन कहे?]
द्रवत्वमुदके वह्नावौष्ण्यं काठिन्यमश्मनि।
मायाया दुर्घटत्वं च स्वतः सिद्ध्यति नान्यतः ॥१३५॥
पानी में द्रवत्व, वह्नि में उष्णता, पत्थर में कठोरता, और
माया में दुर्घटपना स्वभाव से ही सिद्ध हो रहा है। [उसमें
यह दुर्घटता कहीं अन्यत्र से नहीं आयी है।]
न वेत्ति लोको यावत् तां साक्षात् तावच्चमत्कृतिम् ।
धत्ते मनसि, पश्चात्तु मायैषेत्युपशाम्यति ॥१३६॥
यह लोक जब तक उस माया का साक्षात्कार नहीं कर
लेता, तभी तक मन में आश्चर्य किया करता है। साक्षात्
कर लेने के पीछे तो 'यह माया है' ऐसा समझ कर शान्त हो
जाता है।
१६८ पञ्चदशी
प्रसरन्ति हि चोद्यानि जगद्वस्तुत्ववादिषु ।
न चोदनीयं मायायां तस्याश्चोद्यैकरूपतः ॥१३७॥
ये समस्त आक्षेप तो जगत् को सत्य मानने वाले नैयायिक
आदियों पर ही हो सकते हैं । मायावाद में ये आक्षेप नहीं
चलते । क्योंकि यह माया तो स्वयं ही आक्षेपस्वरूप है [ इस
माया का तो दुर्घटपना ही रूप माना जाता है । यदि यह किसी
तरह से घटमान हो जाय, यदि समझ में आजाय तो फिर यह
माया ही क्या रही ? जो बात बुद्धि को समझ न पड़े, जिस
में सब दोष आते हों वही माया है । ]
चोद्येऽपि यदि चोद्यं स्याच्चोद्ये चोद्यते मया ।
परिहार्यं ततश्चोद्यं न पुनः प्रतिचोद्यताम् ॥१३८॥
आक्षेप योग्य बात पर भी [ जिसका कोई उत्तर कभी
दिया ही नहीं जा सकता] यदि आक्षेप करते ही जाओगे तो
फिर विवश हो कर तुम्हारे उन सिद्धान्तों पर आक्षेप करने लगूँगा
[जिनका तुम पर कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं है, जिनको
तुम अनादि आदि बताकर अपना पीछा छुड़ाया करते हो । फिर
इसका परिणाम क्या होगा ] इस कारण किसी तरह इस चोद्य-
माया का परिहार करना चाहिये । इस माया पर आक्षेप करते
जाना ठीक नहीं है [भला जब तुम्हारे वस्त्र पर धब्बा पड़ गया
हो तब क्या ? क्यों ? कैसे ? और कब ? करना भला या कि
उसे छुड़ाने के उपाय सोचना भला ? ]
जिस कमी को मैं स्वयं मान रहा हूँ, जो कमी मुझ माया-
वादी का भूषण है, उसी पर अड़ कर बैठ जाने से मुझे तुम्हारे
सिद्धान्त के मर्मस्थल दिखा कर अपना पीछा छुड़ाना पड़ेगा ।