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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 182 of 726

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Page 182

१६४ पंचदशी
सम्पूर्ण विचारकों का एकमात्र निश्चय श्रुति के शब्दों में
इस प्रकार है कि—माया को ही प्रकृति [ अर्थात् इस जगत्
का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि
वाले उस अन्तर्यामी को महेश्वर [ किंवा माया का अधिष्ठाता
अथवा इस जगत् का निमित्त कारण ] मान लेना चाहिये ।
इस मायी महेश्वर के अंशरूप जीवों से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त
हो रहा है ।
इति श्रुत्यनुसारेण न्याय्यो निर्णय ईश्वरे ।
तथा सत्यविरोधः स्यात् स्थावरान्तेशवादिनाम् ॥१२४॥
इस श्रुति के अनुसार तो ईश्वर के विषय में ऊपर कहे
हुए सभी निर्णय न्याय्य [ ठीक ] हो जाते हैं । ऐसी सूरत में
जो लोग स्थावरों तक को ईश्वर मानते हैं उन का भी
कोई विरोध नहीं रह जाता है ।
माया चेयं तमोरूपा तापनीये तदीरणात् ।
अनुभूतिं तत्र मानं प्रतिजज्ञे श्रुतिः स्वयम् ॥१२५॥
यह माया तमोरूपा है । तापनीय उपनिषत् में इसको
तमोरूप बताया गया है । श्रुति ने माया को तमोरूप सिद्ध
करने के लिये अनुभव को भी प्रमाण माना है ।
जडं मोहात्मकं तच्चेत्यनुभावयति श्रुतिः ।
आबालगोपं स्पष्टत्वादानन्त्यं तस्य साब्रवीत् ॥१२६॥
श्रुति ने उस अनुभव को यों दिखाया है कि वह [ माया ]
जड है और मोहरूप है । इस जड और मोहरूप माया को
बच्चे और ग्वाले तक सभी जानते हैं । इसी कारण श्रुति ने
इस माया को अनन्त भी कहा है ।