पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
हुई है। यह अद्वितीय आनन्द इस जगत् का ऐसा ही उपादान है
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हुई है। यह अद्वितीय आनन्द इस जगत् का ऐसा ही उपादान है
जैसा कि मिट्टी घड़े का उपादान होती है। श्रुति ने अपने मुख से इस
जगत् की उत्पत्ति स्थिति और लय को आनन्द से ही होने वाला
माना है। 'विवर्ती' 'परिणामी' और 'आरम्भक' तीन प्रकार के
उपादान लोक में होते हैं। निरवयव पदार्थ 'परिणामी उपादान'
या 'आरम्भक उपादान' नहीं हो सकता। वह तो 'विवर्ती' उपा-
दान ही हो सकता है । अपनी पहिली अवस्था भी
न छूटे और साथ ही दूसरी भी दीखने लगे तो
इसी को 'विवर्त' कहते हैं। जैसे कि रज्जु अपना रस्सीपन
भी नहीं छोड़ती और सर्पाकार भी धारण कर बैठती है। ऐसा
विवर्त सावयव पदार्थों में ही होता हो सो बात नहीं है। वह तो
निरवयव पदार्थों में भी पाया जाता है। देखते हैं कि—आकाश
निरवयव पदार्थ है उस में तल और नीले पन की कल्पना [उस
के स्वरूप को न जानने वाले] लोग कर ही लेते हैं। इस दृष्टान्त
की विद्यमानता में यह मानने में अब हमें कुछ भी संकोच नहीं
है कि निरवयव आनन्द तत्व में यह जगत् भी विवर्त ही है। इस
जगत् के कल्पक की तलाश हो तो ऐन्द्रजालिक की शक्ति के
समान इस आनन्द की जो अपनी माया शक्ति है उसको ही कल्पना
करने वाली मान लो। शक्ति की कुछ ऐसी विचित्र अवस्था है
कि वह न तो शक्तिमान् से पृथक् ही होती है [क्योंकि वह किसी
को पृथक् दीखती नहीं] और न वह अपृथक् ही पायी जाती है।
क्योंकि यदि वह उससे अभिन्न हो तो बताओ मणिमन्त्रादि के
प्रताप से जब अग्नि से दाह होना रुक जाता है तब वह किसका
प्रतिबन्ध होता है ? यह शक्ति वैसे तो किसी को दीख नहीं
करती, कार्य को देखकर उसका तो अनुमान किया करते हैं।
ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११५
फिर जब कारण होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को
मानना पड़ जाता है। जब आग जल रही हो और दाह न होता हो
तब समझ लो कि किसी उपाय से अग्नि की शक्ति का प्रतिबन्ध
कर दिया गया है। इस शक्ति के विषय में श्वेताश्वतर उपनिषद
के ही शब्दों में कहना पर्याप्त होगा कि—मुनि लोगों को जब
इस जगद्रचना के कारण को जानने की इच्छा हुई और अपनी
ध्यानयोग की प्रयोगशाला में वे बैठे, तब उन्हें इस स्वयंप्रकाश
तत्त्व की शक्ति दिखाई पड़ी—वह शक्ति अपने गुणों अर्थात् अपने
कार्यों किंवा शरीरों में निगूढ़ भाव से निवास कर रही थी, इसीसे
किसी को दीख नहीं पड़ती थी—ध्यान योग के दूर वीक्षण यन्त्र
[दूरबीन] को लगाकर उनकी दृष्टि उस तक पहुँच गयी । जगत्
को बनाने वाली ब्रह्म की उस परा शक्ति को उन्होंने तीन रूप में
पाया। उन्होंने उसको कहीं तो क्रियारूप में पाया, कहीं ज्ञानरूप
में देखा और कहीं इच्छा रूप में उसका दर्शन किया। कभी
कभी दो या तीनों रूपों में उसका साक्षात्कार हुआ। वसिष्ठ मुनि
ने भी कहा है कि वह परब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, नित्य है, पूर्ण
है, अद्वितीय है, परन्तु यदि शक्ति की सहायता उसे न मिलती
तो उसके इन गुणों का उल्लास कैसे होता ? उसे कोई कैसे
जानपाता ? उसकी इस निगूढ महिमा को जना देना ही तो इस
शक्ति का परम उद्देश्य है। जब जब जिस जिस शक्ति के कारण
वह परब्रह्म विकास को प्राप्त हो जाता है तब तब तो वह शक्ति
हम पर भी प्रकट हो जाती है। हे राम, तुम देखलो कि देवता
पशु पक्षी तथा मनुष्यादि के शरीरों में उसी चिच्छक्ति का विकास
हो गया है जिससे ये मिट्टी के पुतले चेतन दीखने लगे हैं। वायु
में उसकी स्पन्द शक्ति, पत्थरों में दार्थ्यशक्ति, जलों में द्रवशक्ति,
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अग्नि में दाहशक्ति, आकाश में शून्यशक्ति का विकास हो गया
है। बहुत कहां तक कहें अण्डे में महासर्प की तरह यह जगत्
आत्मा में छिपा बैठा है। छोटे वटबीज में फल पत्र पुष्प शाखा
विटप और मूल सहित इतना बड़ा वृक्ष जैसे रहता है ऐसे ही यह
समस्त त्रिभुवन अपने ब्रह्मबीज में रहता है। भूमि में बहुत से
बीज पड़े रहते हैं परन्तु वे सब एक साथ जम कर खड़े नहीं हो
जाते। किंतु किसी देश और किसी ऋतु में किसी किसी बीज से
अंकुर निकल पड़ते हैं। हे राम ! वह आत्मा सर्वत्र विद्यमान है,
नित्य प्रकाशमान् है—वह देश या काल या वस्तु की मर्यादा में
बंधने कभी नहीं आता। परन्तु जब वही आत्मतत्व मननशक्ति
को धार लेता है तब बस उस समय उसे 'मन' कहने लगते हैं।
मन के बनते ही 'बन्ध' और 'मोक्ष' की कल्पना जाग कर खड़ी
हो जाती है। उसके बाद पर्वत, 'नगर, नदी, समुद्रादि प्रपंच जिसे
भुवन भी कहते हैं बनकर तैयार हो जाते हैं। असल में तो इस
त्रिभुवन रूपी भवन की नींव कल्पना ही है, परन्तु तौ भी क्या
करें प्राणियों के हृदय में तो यह ऐसी जम गयी है कि कुछ कहते
ही नहीं बनता। छोटे बच्चों के विनोद के लिए कोई कुत्ते बिल्ली
की झूठी कहानी उन्हें सुना दी जाय और वे उसे सच्ची मानकर
आपस में व्यवहार करने लगें—एक दूसरे को सुनाने लगें—वैसी
ही अवस्था इन प्राणियों की हो गयी है। कुत्ते बिल्ली की जो
कहानी बालकों को सुनादी जाती है वे जैसे उसे ही ठीक मान
बैठते हैं, ऐसे ही, विचार करने का' सामर्थ्य जिन में नहीं होता, उन
के मन में इस संसाररचना के सच होने के भ्रामक विचार जमकर
बैठ गए हैं। इस जगत् को बनाने वाली यह शक्ति अपने कार्य और
अपने आश्रय दोनों से ही विलक्षण होती है ! क्योंकि कार्य के धर्म
ब्रह्मानन्दन्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११७
मुटाश आदि और आश्रय के धर्म शब्द आदि इस शक्ति में पाये
नहीं जाते। इसीसे इस शक्ति को अचिन्त्य या अनिर्वचनीय भी कह
दिया जाता है। कार्य [घट आदि] जब तक उत्पन्न नहीं होता तब
तक यह शक्ति मिट्टी आदि में ही छिपी रहती है। कुम्हार आदि
की सहायता से यही शक्ति विकार की सूरत में आ जाती है।
जो लोग तत्व का विश्लेषण करना नहीं जानते वे मोटे और गोल
कार्य [घट] तथा शब्दस्पर्शादि रूपी मिट्टी, दोनों को मिलाकर दोनों
का ही एक नाम [घड़ा] रख लेते हैं। यदि वे विश्लेषण कर सकें
तो उन्हें 'घट' नाम की कोई वस्तु ही वहां न दीख पड़े। कुम्हार
ने जब तक क्रिया नहीं की थी उससे पहले जो भाग था वह तो
'घट' था ही नहीं। कुम्हार ने आकर जब ठोक पीटकर मोटी और
गोल सी एक वस्तु बना कर तैयार की तब कही तो 'घट' हुआ।
उस घड़े को हम मिट्टी से भिन्न नहीं कह सकते। क्योंकि मिट्टी
को हटा कर देखें तो वह घट दीख नहीं सकता। उस घड़े को
हम मिट्टी से अभिन्न भी नहीं कह सकते ? क्योंकि जब तक पिण्ड-
दशा थी तब तक तो वह दीखता ही नहीं था। यों जैसे शक्ति
अनिर्वचनीय पदार्थ है इसी तरह घट भी अनिर्वचनीय पदार्थ ही
है। शक्ति के गुण इस घट में भी पाये जाते हैं, इसी से तो इस
घट को शक्ति से उत्पन्न हुआ मानते हैं। भेद केवल इतना ही है
कि जब तक अव्यक्त अवस्था थी तब तक जिस वस्तु को हम
शक्ति कहते थे, व्यक्त अवस्था आने पर उसी का तो नाम घट पड़
गया है। केवल इसी का नहीं संसार में जिसे जिसे 'माया' कहते हैं,
सभी का यही हाल है—ऐन्द्रजालिक की माया भी प्रयोग करने
से पहले पहले प्रकट अवस्था में नहीं होती—पीछे से तो गन्धर्व-
सेना आदि नानारूपों में निकल कर व्यक्त हो जाती है और लोगों
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को चकित कर देती है। इसी सब अभिप्राय को लेकर श्रुति ने
मायामय होने के कारण विकारों को अनृत कहा है और विकारों
का आधार जो मिट्टी है उसी को सत्य माना है। उसका मतलब
है कि ये जो विकार दीख रहे हैं ये वाणी से बोले जाने वाले नाम
ही तो हैं, इन सब में सत्य पदार्थ तो मिट्टी ही है। 'व्यक्त' 'अव्यक्त'
और इनका 'आधार' ये तीन ही तो पदार्थ संसार में होते हैं। इन
तीनों में पहले दोनों जो 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' हैं वे तो काल-
भेद से पर्याय से होते रहते हैं अर्थात् कभी कार्य होता है और कभी
शक्ति होती है। इनका यह कभी कभी होना ही तो इनके मिथ्यापन
को सिद्ध कर रहा है। किन्तु इन तीनों का जो आधार है वह
वस्तु तो इन दोनों ही अवस्थाओं में रहती है—वह [ मिट्टी ]
कार्यावस्था में भी रहती है और शक्ति काल [कारणावस्था] में भी
रहती है। यों सदा रहने वाली होने के कारण वही सत्य वस्तु
है। जो निस्तत्व होकर भी भासने लगे उसे हम 'व्यक्त' कहते
हैं। उसके उत्पत्ति और नाश दोनों ही होते हैं। वह जब उत्पन्न
होता है तब मनुष्य उनके कुछ नाम रख लेते हैं। क्योंकि वह
व्यक्त पदार्थ जब नष्ट भी हो जाता है तब भी यह नाम तो मनुष्यों
की वाणी पर चढ़ा रह जाता है। इस कारण कहते हैं कि उस नाम
से निरूपणीय [जाना जाने वाला] जो कोई व्यक्त पदार्थ है वह
नामात्मक ही है। यदि वह व्यक्त पदार्थ नामात्मक न होता तो
अब उसका व्यवहार नाम से क्यों कर होता । व्यक्त पदार्थ का वह
रूप भी सत्य नहीं है। क्योंकि वह तो निस्तत्व है,विनाशी है,और
वाणी से बोला हुआ एक शब्द ही शब्द तो है। यदि यह आकार
[रूप] असत्य न होता तो जैसे मिट्टी आदि निस्तत्व नहीं है,
विनाशी नहीं है, या केवल नाममात्र ही नहीं है, ऐसे ही ये भी
ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११९
होते । मिट्टी नाम की जो चीज है वह व्यक्तकाल में या.उससे
पहले, या उसके बाद, सदा एकरूप ही रहती है, सदा सत्य
और अविनाशी होती है, इससे उसे ही 'सत्य' कहते हैं । सत्य
पदार्थ का बोध जब किसी को हो जाता है तब घटादि अनृत
पदार्थों की निवृत्ति हो ही जाती है—अर्थात् उन्हें सत्य समझना
छूट जाता है। ज्ञान से जैसी निवृत्ति हम आध्यात्मिकलोग चाहते हैं
वह तो यही है कि—उन पदार्थों की सत्यता का विचार मन में से जाता
रहे। वे प्रतीत होने [भी] बन्द हो जांय, ऐसी आशा बोध से हम
कर बैठेंगे तो हमें निराश ही हो जाना पड़ेगा और ज्ञान में अश्रद्धा
करनी पड़ जायगी । जो पुरुष पानी के किनारे नीचे को मुंह किये
खड़ा है उसे जल में उलटा आदमी दीखता तो है परन्तु वह वहां
होता नहीं है। किनारे पर खड़े हुए मनुष्य को ही जैसे सच्चा
समझा जाता है वैसे उसे [पानी के छायामनुष्य को] कोई सच
नहीं समझता । वह समझ लेता है कि जलरूपी उपाधि के कारण
ऐसी भ्रान्त प्रतीति हो रही है। जब तक जलरूपी उपाधि बनी
है तब तक ऐसी मिथ्या प्रतीति होती ही रहेगी । इसी प्रकार सब
का कारण जो आत्मतत्व है उस का ज्ञान जब हो जाता है तब
विवेकी पुरुष इस प्रतीयमान् जगत् को मिथ्या मान लेता है ।
उसके बाद फिर जब उसे यह जगत् भासता है तब वह इसे
इन्द्रियोपाधिक भ्रम समझ कर टालता रहता है। वह जान लेता
है कि जब तक ये इन्द्रियां बनी है तब तक ऐसी प्रतीति होती
ही रहेगी । भले ही होती रहो, वह फिर इसको सत्य मानकर कोई
भी व्यवहार नहीं करता । जितने भी सोपाधिक भ्रम होते हैं उन
सभी का यही हाल होता है। उनमें मिथ्या प्रतीति तो रहती
है परन्तु उस पर से विश्वास उठ जाता है । ऐसा शुद्ध और असंग
प्रकरणगत बात तो यही हुई कि—घट की मिट्टी ने, घट बन जाने
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बोध हो जाने पर ही अद्वैतवादी अपने को कृतकृत्य समझता है ।
प्रकरणगत बात तो यही हुई कि—घट की मिट्टी ने, घट बन जाने
पर भी, अपने मृद्रूप का परित्याग नहीं किया, इस कारण यह घट मिट्टी
का 'विवर्त' है । अब मिट्टी का ज्ञान हो जाने पर घट के सत्य होने
का विचार जाता रहेगा । विवर्त उपादानों में यही होता है कि घट
और कुण्डल के बन जाने पर भी उनका मृद्भाव या सुवर्णभाव बना
ही रहता है । आरुणि ने भी मिट्टी, सोना और लोहे के तीन दृष्टान्त
इसी अभिप्राय से दिये हैं कि बहुत से पदार्थों में कार्यों का अनृत
होना देखकर साधक लोग सभी भूतभौतिकपदार्थों के मिथ्यापन
की वासना अपने जी में दृढ़ता से बैठा लें। इन भूत भौतिक पदार्थों
में जितना अनृत भाग है उसके जानने का तो कुछ भी उपयोग
नहीं होता । क्योंकि तत्व का ज्ञान तो किसी काम आ सकता है,
अनृत का ज्ञान किसी भी उपयोग में नहीं आता । कार्य घटादियों
में जितना सच्चा भाग है उतना कारणस्वरूप ही है, ऐसा जो लोग
जान जाते हैं, उन लोगों को तो इस बात से कुछ विस्मय नहीं होता ।
परन्तु जो अज्ञ हैं—जिन्हें तत्व ज्ञान नहीं हो पाया है—उनको
ऐसी बात सुनकर बड़ा ही विस्मय हुआ करता है । जिन लोगों
को ऐसे संस्कार नहीं होते, वे जब यह सुनते हैं कि एक ऐसी
वस्तु भी है कि जिसे जानकर सभी पदार्थों का ज्ञान होजाता है
तब इनको बड़ा विस्मय होता है । परन्तु उन्हें गम्भीर होकर विचार
करने का निमन्त्रण हम देते हैं—वे समझें कि एक के ज्ञान से सर्व-
बोध की जो बात कही है, उसका यह मतलब नहीं है कि उसके
ज्ञान में व्यक्तिगत रूप से संसार के सभी पदार्थ आ जाते हैं। अद्वैत
ज्ञान की ओर उन्हें आकृष्ट करना ही इस का मुख्य भाव है । मिट्टी
के एक पिण्ड को यदि कोई जान लेता है उसके बाद जब वह
ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द १२१
मिट्टी के बने किसी भी पदार्थ को देखता है तब सभी को जान
लेता है कि यह भी मिट्टी का बना है और यह भी मिट्टी का ।
इसी प्रकार ब्रह्मनाम के सर्वानुगत एक-तत्व का परिज्ञान जब किसी
को हो जाता है, तब उसी से बने हुए इस सकल जगत् का ज्ञान
भी उसे हो ही जाता है । ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है और यह
जगत् नामरूपात्मक है । यहं जगत् पहले अव्याकृत था, इसे व्यक्त
करते समय इसका कुछ 'नाम' और कुछ 'आकार' बना दिया गया
है। अव्याकृत से हमारा अभिप्राय ब्रह्म में रहने वाली इस अचिन्त्य-
शक्ति माया से ही है। अविक्रिय ब्रह्म में रहने वाली वह माया ही
अनेक रूप हो जाती है—सबसे पहले उसका आकाश बनता है,
वह भी 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' अर्थात् 'सत्' 'चित्' और
'आनन्द' स्वरूप ही होता है। उसका अपना खास रूप तो 'अव-
काश' ही है। वही बिचारा मिथ्या है, वे तीनों [ सच्चिदानन्द ]
मिथ्या नहीं हैं। इस अवकाश पर जरा विचार का प्रयोग करके
देखिये—यह अवकाश व्यक्त होने से पहले नहीं था, नष्ट हो जाने
के बाद भी यह अवकाश नहीं रहेगा। यह तो बीच में कुछ काल
के लिये पानी के बुलबुले की तरह व्यक्त हो गया है। आदि और
अन्त में न होने के कारण यह तो वर्तमान में भी नहीं है। परन्तु
यह बात बुद्धियोग से ही जानी जा सकती है। ऊपर जिन सच्चिदा-
नन्दों का वर्णन किया है वे घड़े आदि में मिट्टी की तरह सदा सब
कार्यों में ही अनुगत रहते हैं। बताओ, जब तुम अवकाश को भूल
जाते हो तब तुम्हें क्या भासा करता है। उस समय तुम्हें जो तत्व
भासता है, उस तत्व को कुछ न कुछ तो कहना ही होगा। ऐसे
समय उदासीनावस्था होने के कारण उस तत्व को 'सुख' ही कहना
चाहिये। जो अनुकूल भी प्रतीत न हो और प्रतिकूल भी न लगे
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वही तो निजसुख होता है। जब कोई अनुकूल पदार्थ दीखता है
तब हर्ष होता है, प्रतिकूल जान पड़े तब दुःख हो जाता है, जब
तो अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो तब तो 'निजानन्द'
का भान शुरू हो जाता है। यह निजानन्द एक स्थिर चीज है।
हर्ष और शोक तो क्षण क्षण में बदलने वाले पदार्थ हैं। इन दोनों
हर्ष शोकों को तो मानस ही मान लेना ठीक है। क्योंकि मन भी
क्षणिक है। उसके परिवर्तन से ही हर्ष और शोक होते हैं। इतने
विवेचन से आकाश में आनन्द होने की बात मन में बैठ गयी
होगी। सत्ता और भान को तो सभी मानते हैं, इस कारण उसका
वर्णन हम नहीं करेंगे। वायु से लेकर देहपर्यन्त पदार्थों में भी
यह बात समझ लेना। गति और स्पर्श वायु के,दाह और प्रकाश
अग्नि के, द्रवता जल का, और कठिनता भूमि का अपना निजी
आकार है। इन सब के नाम तो अवश्य अनेक या विभिन्न हो रहे
हैं, परन्तु इनमें सच्चिदानन्द तो एक रूप से ही रहते हैं। इनमें
जो अलग अलग नाम और रूप [आकार] हैं वे निस्तत्त्व हैं। क्यों-
कि इनके जन्म और नाश बराबर होते रहते हैं। अपने संस्कारी
मन की सहायता से इन नामरूपों को समुद्र के बुलबुले की तरह
समझा करो। ज्यों ही कोई अधिकारी इस सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदा-
नन्द ब्रह्म को [ चाम की आँखों से नहीं अपितु ] बुद्धियोग से
देख लेगा तब वह धीरे धीरे इन नामरूपों की अवहेलना स्वयमेव
करने लगेगा। ज्यों ज्यों यह अवहेलना बढ़ने लगेगी त्यों त्यों ब्रह्म
के दर्शन होने लगेंगे। और ज्यों ज्यों ब्रह्म के दर्शन होंगे त्यों त्यों
नामरूप छूटने लगेंगे। इस ब्रह्माभ्यास [द्वैतावहेलना और ब्रह्म-
दर्शन] से जब अधिकारी की 'विद्या' स्थिर हो जायगी तब वह इस
जीवन के रहते ही मुक्त हो जायगा। फिर उसका शरीर प्रारब्धा-
ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२३
नुकूल कैसे भी रहा करो उसकी जीवन्मुक्ति को कोई रोक नहीं
सकेगा। उसी का चिंतन, उसी का कथन, उसी की बातचीत और
उसी में तत्पर हो जाना 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है। ऐसा ब्रह्मा-
भ्यास जब दीर्घकाल तक निरन्तर तथा श्रद्धापूर्वक किया जायगा
तब अनादिकाल से हृदय में घुसी हुई वासनायें नष्ट हो जायँगी ।
मिट्टी की शक्ति घट शराव आदि अनेक मिथ्या पदार्थों को बना
देती है,इसी प्रकार ब्रह्मशक्ति भी अनेक अनृत पदार्थों को बना डालती
है। अथवा इसे यों समझना चाहिये कि जीव की निद्राशक्ति अनेक
दुर्घट सुपनों को घड़ डालती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति सृष्टि
आदि अनेक कार्यों का सर्जन कर लेती है। निद्रा से तो यहां तक हो
जाता है कि—कभीआकाश में उड़ान मारना दीखता है,कभी अपना
सिर कटने की बात दीखती है,कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत जाते
हैं,कभी मरे हुए पुत्रादि देखने मिल जाते हैं। उस सुपने में 'यह ठीक
है और यह ठीक नहीं' यह व्यवस्था नहीं की जा सकती। वहां तो जो
जैसा दीखे, वह वैसा ही ठीक होता है। ध्यान देने की बात है कि—
जब जीव की निद्राशक्ति की ऐसी अद्भुत महिमा है कि वह अपने में
तर्क शास्त्र को चलने नहीं देती है, तब फिर ब्रह्म की मायाशक्ति
की महिमा अचिन्त्य हो तो इसमें अचम्भा क्यों करते हो ? पुरुष
सोया पड़ा होता है उधर निद्राशक्ति अपना काम जारी रखती है—
वह अनेक प्रकार के सुपनों को बना बना कर तैयार करती रहती
है उससे पूछती तक नहीं कि क्या मैं यह सब कर डालूँ ? ठीक
इसी प्रकार ब्रह्मदेव निर्विकार भाव से विराज रहे हैं, यह श्रीमती
माया शक्ति अनेक आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ब्रह्माण्डलोक,
प्राणी और पर्वत समुद्र आदि को घड़ घड़ कर खड़ा करती जाती
है। यों तो ये सभी विकार मायाशक्ति ने उत्पन्न किये हैं,परन्तु प्राणियों
१२४ पञ्चदशी
में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चैतन्य की छाया प्रतिबिम्बित
हो गयी है और वे चेतन हो गये हैं, जिन में चैतन्य का प्रतिबिम्ब
नहीं पड़ संका वे जड रह गये हैं । क्या चेतन और क्या अचेतन
सभी में ब्रह्म का सच्चिदानन्द रूप समान ही होता है । भेद केवल
इतनाही होता है कि उनके नाम और रूप (शकल) अलग अलग हो
गये हैं। ये नाम रूप ब्रह्म में ऐसे हैं जैसे कपड़े पर कोई चित्र बना
दिया गया हो। जब कोई उन नामरूपों की अपेक्षा कर सके तभी
उसे सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म तत्व के दर्शन हों। पानी में अपना देह
अधोमुख दीख रहा हो तो उस देह को छोड़ कर अपने तीरस्थ देह
में ही ममता होती है, इसी प्रकार जगत् के दीखने वाले नामरूपों
का परित्याग कर देने पर सच्चिदानन्द में ही ज्ञानी की ममतां हो
जाती है। मनोराज्य हज़ारों होते रहते हैं तो भी जैसे उनकी सदा ही
उपेक्षा करदी जाती है इसी प्रकार विवेकी लोग हज़ारों प्रकार से दीख
पड़ने वाले नामरूपों की उपेक्षा करते रहते हैं । मनोराज्य जिस
प्रकार क्षण क्षण में बदलता जाता है, इसी प्रकार वह बाह्य व्यवहार
भी क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता है वह लौटकर कभी
भी नहीं आता। देखते हैं कि जवानी में बचपन ढूंढे भी हाथ नहीं
लगता, बुढ़ापे में जवानी की भी यही गति हो जाती है। मरा हुआ
पिता फिर देखने को नहीं मिलता । बीता हुआ दिन लौटकर नहीं
आता । जो लौकिक पदार्थ क्षणध्वंसी है उन में और मनोराज्य में
फ़र्क क्या है वही तो हमारी समझ में नहीं आता । इस लिये, हम तो
यही कहेंगे कि लौकिक पदार्थ भले ही भासा करें.उनके सत्य होने
का वृथा विचार सर्वथा छोड़ दो। जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा
कर दीजायगी तब ब्रह्मचिन्तन का कांटा जाता रहेगा । फिर तो वह
बुद्धि ब्रह्मचिन्तन में ही जुट जायगी। इस पर प्रश्न हो सकता है कि
ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२५
फिर ज्ञानी लोग व्यवहार कैसे करें ? इसका उत्तर यह है कि नाटक
करने वाले नट लोग जैसे बनावटी आस्था से अपना काम कर गुज़-
रते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी लोग भी लौकिक कामों को बनावटी आस्था
से निभा लेजाते हैं । ऊपर पानी बहता रहता है परन्तु नीचे बैठी
हुई बड़ी शिला जैसे शान्त भाव से पड़ी रहती है इसी प्रकार नाम-
रूपी रूपी जल ऊपर बहता भी रहो परन्तु कूटस्थ ब्रह्मरूपी शिला
ज्यों की त्यों बनी रहती है । ज्ञानी लोग संसार के साथ वह नहीं
जाते । दर्पण के अन्दर कोई छेद नहीं होता, जिसमें कोई वस्तु
छिप रही हो परन्तु ऐसा मालूम हुआ करता है मानो दर्पण में अन-
गिनत वस्तु से परिपूर्ण बड़ा लम्बा चौड़ा आकाश ही हो । ठीक
इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चिद्धन
अखण्ड ब्रह्मरूपी दर्पण में प्रतीत हो रहा है । पहले दर्पण दीख लेता
है तब उसके अन्दरकी वस्तु देखी जा सकती है । इसी प्रकार पहले
सच्चिदानन्द वस्तु दीख चुकती है उसके बाद नामरूपात्मक जगत्
का भास होता है । अब होशियार साधकों को चाहिये कि ज्यों ही
उन्हें सच्चिदानन्द वस्तु का भान हो चुके त्यों ही अपनी बुद्धि को
रोक कर खड़े होजांय और वार वार उसी का भान होते रहने दें ।
यदि उनकी मति आगे नामरूप की तरफ को चलने का प्रयत्न करती
हो तो उसे वैसा न करने दें । जानते हो ये साधक अब कहां पहुंच
चुके हैं ? इन्होंने कितना रास्ता तै कर लिया है ? सुनो ! ये लोग
चलते चलते जगत् से हीन सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मधाम में खड़े
हुए हैं । इसी को तो 'अद्वैतानन्द' कहा जाता है । मुमुक्षु लोग इस
'अद्वैतानन्द' में चिरकाल तक विश्राम करें यही हमारी अभिलाषा है।
जगत् के मिथ्या भाव का चिन्तन करने से जो आनन्द जाग
उठता है वही 'अद्वैतानन्द' होता है ।
14. Vidyananda
[ १४ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप
योग से, आत्मा के विवेक से, अथवा द्वैत के मिथ्यापन की
चिन्ता करने से, जब किसी को ब्रह्मानन्द दीखने लगा हो, तब
उस समय के 'ज्ञानानन्द' का वर्णन इस प्रकरण में है। जिस
प्रकार विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है इसी प्रकार यह
विद्यानन्द [ज्ञानानन्द] भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही है। यह
चार प्रकार का होता है, प्रथम दुःखाभाव, फिर कामाप्ति। फिर
कृत-कृत्यता और उसके पश्चात् प्राप्तप्राप्यता। दुःख दो तरह का
होता है—एक इस लोक का दूसरा परलोक का। बृहदारण्यक
में कहा है कि ज्ञानानन्दी को ऐहिक दुःख नहीं रहते। ऐहिक
दुख तो कामना ही है। परन्तु जब किसी को आत्मज्ञान हो जाय
तब फिर वह किस चीज की चाहना से और किसके लिये शरीर
के दुःखों से दुःखी होता फिरे ! पहले प्रकरणों में बता आये हैं
कि जीवात्मा और परमात्मा ये दो भेद आत्मा के हैं। यह आत्मा
तीनों देहों के साथ जब तादात्म्य कर बैठता है तब यह जीव बन
जाता है और तब ही इसमें 'भोक्तापन' आ जाता है। उधर
परात्मा का भी हाल सुन लीजिये—वह सच्चिदानन्द होकर भी
जब नामरूप के साथ तादात्म्य करने की खिलवाड़ कर बैठता है
तब 'भोग्य' हो जाता है। अब यदि 'भोक्ता' और 'भोग्यपन' के
बखेड़े को हटाना चाहो तो उन तीनों शरीरों और उन नामरूपों
से उस आत्मतत्व का विवेक कर डालो। भोक्ता और भोग्यपन को
हटाकर शुद्ध के दर्शन करलो। यही तो होता है कि 'भोक्ता' के
ब्रह्मानन्दन्तर्गतं विद्यानन्द का संक्षेप · १२७ ·
लिये किसी 'भोग्य' पदार्थ को चाहता है तो [ शरीर के साथ ]
दुःखी होने लगता है। क्योंकि ये तीनों शरीर तो ज्वरों [संतापों]
के निवासमन्दिर ही हैं। आत्मतत्व को कभी कोई ज्वर नहीं
होता। देखलो—वात, पित्त,कफ नामक धातुओं में जब विषमता
आ जाती है तब इस स्थूल शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
काम क्रोधादि विकार जब उदय हो जाते हैं तब ये ही सूक्ष्म शरीर
में रहने वाले ज्वर कहे जाते हैं। परन्तु इन दोनों प्रकार के ज्वरों
की जड़ तो कारण शरीर [अज्ञान] में ही रहती है। पिछले अद्वै-
तानन्द प्रकरण में कही रीति के अनुसार जब परात्मतत्व को पह-
चान लिया जायगा, तब ज्ञानी को सच्चा 'भोग्य' दीखेगा ही नहीं।
फिर बताओ वह परात्मतत्व को जानने वाला ज्ञानी कौन से 'भोग्य'
को चाह सकेगा ? आत्मानन्द प्रकरण में कही रीति से जीवात्मा के
असंग कूटस्थ स्वरूप का निश्चय, जब हो जायगा तब 'भोक्ता' ही
कोई न रहेगा । अब आप सावधान होकर विचार कीजिये कि
'भोग्य' और 'भोक्ता' दोनों ही विवेक की आंच के सामने मोम के
पुतले की तरह पिघल गये हैं। शेष बचे हुए इस बिचारे जड देह
को तो कोई ज्वर होना ही क्यों है।
यहां तक ऐहिक दुःखों का विचार किया गया। अब आमु-
ष्मिक दुःखों की पड़ताल भी कर लीजिये—पाप और पुण्यों की
चिन्ता ही आमुष्मिक [पारलौकिक] दुःख होता है। पहले अध्याय
में कह ही चुके हैं कि—ज्ञानी को पुण्य पाप की चिन्ता नहीं सताती
जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं चिपटता इसी प्रकार ज्ञान हो
जाने के कारण, ज्ञानी में आगामी कर्मों का सम्बन्ध नहीं हो पाता।
सरकण्डे की रूई जिस प्रकार क्षण भर में जल जाती है इसी प्रकार
ज्ञानी के संचित कर्म ज्ञानाग्नि से सहसा जल जाते हैं। गीता में भी
१२८ पञ्चदशी
कहा है कि—हे अर्जुन जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि ईंधन को जला
देती है इस प्रकार [विधि पूर्वक सुलगाई हुई] यह ज्ञानाग्नि सब कर्मों
को राख कर देती है। जिस ज्ञानी को अहंकारयुक्त भाव नहीं रहता,
जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं रहती, वह यदि इन सब
लोकों को भी मार दे तौ भी उसे मारने वाला मत समझो । इतने
गुरुतर अपराध से भी वह किसी बन्धन में नहीं आयेगा । इतने से
ज्ञानी को आमुष्मिक दुःख या परलोक की चिन्ता नहीं रहती वह
आप समझ गये होंगे ।
अब क्रमानुसार सर्वकामाप्ति का विचार करेंगे—जैसे ज्ञानी को
दुःखाभाव हो जाता है इसी प्रकार उसे सर्वकामाप्ति भी हो ही जाती
है । ऐतरेय श्रुति ने प्रायः इन्हीं शब्दों में कहा है कि—यह ज्ञानी
सब कामों को पाकर अमर हो चुका है। छान्दोग्य में कहा है कि—
खाता, खेलता, स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता तथा भोगों
को भोगता हुआ भी ज्ञानी शरीर को भूला रहता है । वह आत्म-
सागर में इतना रमा रहता है कि फल वाले पेड़ों को जैसे फल देने
का या नदी को बहने का ज्ञान नहीं होता इसी प्रकार उसे शरीर
की चेष्टाओं तक का भी ज्ञान नहीं रह जाता । उस समय उसका
प्राण ही उसके प्रारब्ध कर्मों के अनुसार उस शरीर को जीवित
रखता है। तैत्तिरीय में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण
कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानियों की तरह
इसे कर्मों से जन्म लेना नहीं पड़ता। अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार
भोगों को भोगा करते हैं, ज्ञानी को उस तरह भोग नहीं मिलते,
वह तो संसार के सब भोगों को एक साथ, बिना ही किसी क्रम
के, भोगा करता है। पूर्ण युवा हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो,
नीरोग हो, दृढ़चित्त हो, बड़ी सेनावाला हो, धन्यधान्य पूर्ण पृथिवी
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १२९
पर शासन कर रहा हो, मनुष्यों को मिल सकने वाले सभी भोग
प्राप्त हों, ऐसे तृप्त राजा को जो आनन्द मिलता है, उस आनन्द
को एक ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी होने के नाते से ही पा लेता है।
मर्त्य लोगों के भोगों की इच्छा इन दोनों को ही नहीं है, इस कारण
दोनों को ही तृप्ति एकसी रहती है। हां, इतना भेद भी है कि राजा
तो भोगों को पाकर निष्काम हो सका है। परन्तु दूसरे की निष्कामता
तो अद्भुत ही ढंग की है। वह तो अपने विवेक के प्रताप से निष्काम
हो गया है। क्योंकि वह श्रोत्रिय है, इस कारण वेद शास्त्रों में जो
भोगों के दोष लिखे हैं उनका उसे पूरा पूरा ध्यान रहता है। देह
के दोष, चित्त के दोष, तथा भोग्य पदार्थों के दोष, उसे सदा
याद रहते हैं। कुत्ते ने जिस खीर को वमन कर दिया हो उसको
जैसे कोई खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष दुष्ट भोगों
की कामना नहीं करता। यद्यपि श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान
भाव से निष्काम हो गये हैं, परन्तु राजा उन साधनों का संचय
करने में काफी तकलीफ़ उठा चुका है और अब भोगों के भावी
नाश को याद करके भी डर रहा है। श्रोत्रिय को ऐसा कोई कष्ट
उठाना नहीं पड़ता। यही कारण है कि श्रोत्रिय का आनन्द उस
के आनन्द से अधिक है। एक यह भी बात है कि विवेकी को
अब किसी ऊँचे पद की अभिलाषा नहीं रही है। राजा को तो
यह भी आशा लगी हुई है कि यदि कोई इससे ऊँचा पद [गन्धर्व
आदि का] हो तो वह भी मुझे मिल जाय तो अच्छा हो। सार्वभौम
राजा से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी उत्तरोत्तर पद की कामना किया
करते हैं। परन्तु यह जो आत्मानन्द है यह मन वाणी से अगम्य
है ! यही कारण है कि वह इन सबसे ऊँचा है। ये सब पदवी-
धारी लोग जिस किसी सुख को चाहते या चाह सकते हैं, श्रोत्रिय
१३० पञ्चदशी
[ज्ञानी] को उन किसी भी सुखों की इच्छा तक नहीं होती—वह
उन सब सुखों की ओर से पहले ही निःस्पृह हो गया होता है।
सो उन सबको अलग अलग जितना सुख होता है उतना अकेले
श्रोत्रिय को हो जाता है। वे सब उन उन कामनाओं को पूरा करके
भी तो जब कुछ काल के लिये अपने आपको निःस्पृह कर लेते हैं
तभी वे आनन्दी हो सकते हैं। उनकी यह निःस्पृहता उन उन काम-
नाओं के अधीन होती है। उन उन कामनाओं के पूरा किये विना
उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को तो
कुछ कामना ही नहीं होती। वह तो सदा ही निःस्पृह बना रहता
है। यों वह सदा ही आनन्द को लूटा करता है। इसी कारण विवेकी
का दर्जा सबसे ऊँचा है। मनु ने भी कहा है कि जो तो इन सब
कामों को प्राप्त करले और जो केवल इन्हें छोड़ ही भर दे, सब कामों
के पाने से सबका परित्याग करने में बहुत बड़ा महत्व है। बस यही
ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' है।
ज्ञानी की सर्वकामाप्ति की एक यह भी रीति है—कि जैसे वह
अपने देह में आनन्दाकार बुद्धि का साक्षी होता है, इसी प्रकार
सम्पूर्ण प्राणियों के देहों में जो जो भोग भोगे जा रहे हैं और उनसे
उनको जो जो आनन्द आ रहे हैं, उन सबका साक्षी बनना उसे आ
जाता है। अथवा यों कहो कि उन सब भोगों का साक्षी बनकर उन
सब भोगों को अकेला ही भोगने लगता है। इस रीति से भी ज्ञानी को
'सर्वकामाप्ति' हो जाती है।
वैसे तो अज्ञानी भी सबका साक्षी होता है परन्तु इस निगूढ
तत्व का ज्ञान न होने से उसे वैसी तृप्ति नहीं हो पाती। श्रुति ने तो
यह बात स्पष्ट ही कही है कि—जो इस महातत्त्व को पहचान जाता
है वही सब कामों को भोग सकता है। इस तत्व को न जानने वालों
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को इस महालाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। वह तो इस एक
ही क्षुद्र शरीर के द्वारा छनकर आने वाले आनन्दकण को चाट चाट
कर उपवासी से रहकर आशा ही आशा में दिन काटा करते हैं।
ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' का तीसरा प्रकार यह भी है कि जब
उसे अपनी सर्वात्मकता का दिव्य अनुभव हो जाता है तब फिर
उसके हृदय-मन्दिर में सदा एक ही गूँज रहने लगती है कि मैं ही
अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ और मैं ही
अन्नाद हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ।
अब ज्ञानी की कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की बात भी सुन
लीजिये—जब तक यह अज्ञानी था तब तक इसे परलोक और इस
लोक के लिये या मुक्ति पाने के लिये बहुत कुछ करना था। परन्तु
अब आत्मज्ञान हो जाने पर तो इसने वह सब कुछ कर डाला।
क्योंकि अब उसे कुछ करने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती
अब तो वह कृतकृत्यता में रुकावट डालने वाली पहली अवस्था को
याद करके यों तृप्त हुआ करता है कि—दुःखी अज्ञानी लोग पुत्रादि
की दुरभिलाषा में फँसकर संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें, मैं
भी कभी ऐसे ही उलझा पड़ा था, परन्तु परमानन्द पूर्ण हो चुकने
वाला मैं, भला कौन सी इच्छा को लेकर संसार में फँसा रहूँ ? पर-
लोक जाने वाले लोग कर्म करते हैं तो करें, कभी मैं भी ऐसे ही किया
करता था। परन्तु सर्वलोकस्वरूप बन चुकने वाला मैं अब यह सब
बखेड़ा क्यों करूँ ? नींद और भिक्षा स्नान और शौच की न मुझे
चाह है और न मैं करता ही हूँ। देखने वाले मुझे करता हुआ सम-
झते हैं तो वे समझा करें। दूसरों के समझने से क्या होता है।
जिन गुंजाओं को दूसरों ने आग मान लिया हो तो क्या वे यथार्थ ही
जलाने लगती हैं ? इसी तरह दूसरों ने जिन संसारधर्मों का आरोप
१३२ पञ्चदशी
इस मरे हुए शरीर को देखकर मुझ में कर लिया है वे सब धर्म मुझ
में नहीं है। जिन्होंने तत्व को सुना नहीं है वह सुनते फिरें, तत्व को
जान चुकने वाला मैं भला क्यों सुनूँ ? जिन्हें संशय हो वे मनन
करें, जिस मुझे संशय ही नहीं रहा वह मैं मनन क्यों करने लगूँ ?
जिसे विपर्यास हो वह निदिध्यासन करे, जब मुझे विपरीत ज्ञान
ही नहीं रहा तब मैं ध्यान ही क्यों और किस बात का करूँ ? मुझे
तो अब कभी यह मालूम ही नहीं होता कि मैं देह हूँ। मैं जो कभी
कभी यह कह देता हूँ कि 'मैं मनुष्य हूँ' सो तो अनादिकाल की
वासनाओं के प्रभाव से कह बैठता हूँ। जब मेरा प्रारब्ध-कर्म नष्ट
हो जायगा तब निश्चय ही यह व्यवहार भी नहीं रहेगा। जब तक
मेरे प्रारब्धकर्म क्षीण न हो जांयगे तब तक हज़ार ध्यान करने पर
भी यह व्यवहार रुक नहीं सकेगा। जो व्यवहार को कम करना
चाहते हों उन्हें यह ध्यान भले ही पसन्द हो, मुझे तो अब यह
व्यवहार बाधक ही प्रतीत नहीं होता। फिर मैं ध्यान क्यों करूँ ?
विक्षेप भी अब मुझे नहीं होता इस कारण समाधि भी नहीं होती।
विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारी मन को ही होते हैं। मैं
आत्मानुभव करने भी क्यों बैठ जाऊँ ? मैं तो नित्यअनुभवरूप ही
हूँ। मुझ से पृथक् और अनुभव क्या होगा ? मुझे अब निश्चय हो
गया है कि जो करना था सो कर डाला और जो पाना था सो पा
चुका। अब लौकिक, शास्त्रीय या और किसी तरह का भी व्यवहार
मेरे प्रारब्धानुकूल चलता रहो, मैं तो अकर्ता और अलेप हो गया.
हूँ। या फिर जिस मार्ग पर चलकर मुझे कृतकृत्यता मिली है वह
मार्ग औरों के लिये भी बना रहो इसलिये लोकसंग्रह का ध्यान रख
कर मैं शास्त्रीय मार्ग पर ही चलता रहूँगा इसमें भी मेरी कोई हानि
नहीं है। लोगों को दिखाने और सिखाने के लिये मेरा शरीर देवार्चन
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३३
स्नान शौच तथा भिक्षायात्रा जप या वेदान्त का पाठ किया करो,
यह मेरी बुद्धि विष्णु का ध्यान करो या ब्रह्मानन्द में गोता लगाकर
बैठ जाओ, मैं तो साक्षी हूँ मैं कुछ करता या करवाता नहीं हूँ। कृत-
कृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की खुशी जब उसके अन्दर नहीं समाती
है तब मन में यह विचार किया करता है कि मैं धन्य हूँ क्योंकि मैं
अपने नित्य आत्मतत्व को ठीक ठीक समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ
क्योंकि मुझे आज स्पष्ट ही ब्रह्मानन्द समुद्र दीख पड़ रहा है। मैं
धन्य हूँ क्योंकि मुझे आज कोई भी सांसारिक दुःख दीखता नहीं
है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरा अज्ञान दिगन्त को पलायन कर
गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह आज सभी सिद्ध
हो गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरे समान धन्य कौन निक-
लेगा ? मैं धन्य हूँ मैं धन्य हूँ मैं वार वार धन्य हूँ। ओहो ! आज
मेरे पुण्यों के ढेर एक साथ ही फल पड़े हैं। पुण्यों की इस महती
सम्पत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा हुआ झोटे
ले रहा हूँ। मुझे ज्ञान कराने वाले शास्त्र, मुझे मार्ग दिखाने वाले गुरु,
मेरा वह ज्ञान और मेरा वह आनन्द जिनके कारण आज यह धन्य
अवस्था मुझे हाथ आयी है, सभी धन्य हैं। वे सबके सब आज मुझे
मेरा पद देकर समुत्तीर्ण हो गये। उनकी महिमा गाने के लिये
मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ? ऊपर कहा हुआ ऐसा विद्यानन्द
(ज्ञानानन्द) जब तक न उमड़ पड़े तब तक ब्रह्माभ्यास करते ही
जाना चाहिये।