पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 719 of 726
Read in context[Page-header: ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३१]
को इस महालाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। वह तो इस एक
ही क्षुद्र शरीर के द्वारा छनकर आने वाले आनन्दकण को चाट चाट
कर उपवासी से रहकर आशा ही आशा में दिन काटा करते हैं।
ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' का तीसरा प्रकार यह भी है कि जब
उसे अपनी सर्वात्मकता का दिव्य अनुभव हो जाता है तब फिर
उसके हृदय-मन्दिर में सदा एक ही गूँज रहने लगती है कि मैं ही
अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ और मैं ही
अन्नाद हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ।
अब ज्ञानी की कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की बात भी सुन
लीजिये—जब तक यह अज्ञानी था तब तक इसे परलोक और इस
लोक के लिये या मुक्ति पाने के लिये बहुत कुछ करना था। परन्तु
अब आत्मज्ञान हो जाने पर तो इसने वह सब कुछ कर डाला।
क्योंकि अब उसे कुछ करने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती
अब तो वह कृतकृत्यता में रुकावट डालने वाली पहली अवस्था को
याद करके यों तृप्त हुआ करता है कि—दुःखी अज्ञानी लोग पुत्रादि
की दुरभिलाषा में फँसकर संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें, मैं
भी कभी ऐसे ही उलझा पड़ा था, परन्तु परमानन्द पूर्ण हो चुकने
वाला मैं, भला कौन सी इच्छा को लेकर संसार में फँसा रहूँ ? पर-
लोक जाने वाले लोग कर्म करते हैं तो करें, कभी मैं भी ऐसे ही किया
करता था। परन्तु सर्वलोकस्वरूप बन चुकने वाला मैं अब यह सब
बखेड़ा क्यों करूँ ? नींद और भिक्षा स्नान और शौच की न मुझे
चाह है और न मैं करता ही हूँ। देखने वाले मुझे करता हुआ सम-
झते हैं तो वे समझा करें। दूसरों के समझने से क्या होता है।
जिन गुंजाओं को दूसरों ने आग मान लिया हो तो क्या वे यथार्थ ही
जलाने लगती हैं ? इसी तरह दूसरों ने जिन संसारधर्मों का आरोप