पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११५
फिर जब कारण होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को
मानना पड़ जाता है। जब आग जल रही हो और दाह न होता हो
तब समझ लो कि किसी उपाय से अग्नि की शक्ति का प्रतिबन्ध
कर दिया गया है। इस शक्ति के विषय में श्वेताश्वतर उपनिषद
के ही शब्दों में कहना पर्याप्त होगा कि—मुनि लोगों को जब
इस जगद्रचना के कारण को जानने की इच्छा हुई और अपनी
ध्यानयोग की प्रयोगशाला में वे बैठे, तब उन्हें इस स्वयंप्रकाश
तत्त्व की शक्ति दिखाई पड़ी—वह शक्ति अपने गुणों अर्थात् अपने
कार्यों किंवा शरीरों में निगूढ़ भाव से निवास कर रही थी, इसीसे
किसी को दीख नहीं पड़ती थी—ध्यान योग के दूर वीक्षण यन्त्र
[दूरबीन] को लगाकर उनकी दृष्टि उस तक पहुँच गयी । जगत्
को बनाने वाली ब्रह्म की उस परा शक्ति को उन्होंने तीन रूप में
पाया। उन्होंने उसको कहीं तो क्रियारूप में पाया, कहीं ज्ञानरूप
में देखा और कहीं इच्छा रूप में उसका दर्शन किया। कभी
कभी दो या तीनों रूपों में उसका साक्षात्कार हुआ। वसिष्ठ मुनि
ने भी कहा है कि वह परब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, नित्य है, पूर्ण
है, अद्वितीय है, परन्तु यदि शक्ति की सहायता उसे न मिलती
तो उसके इन गुणों का उल्लास कैसे होता ? उसे कोई कैसे
जानपाता ? उसकी इस निगूढ महिमा को जना देना ही तो इस
शक्ति का परम उद्देश्य है। जब जब जिस जिस शक्ति के कारण
वह परब्रह्म विकास को प्राप्त हो जाता है तब तब तो वह शक्ति
हम पर भी प्रकट हो जाती है। हे राम, तुम देखलो कि देवता
पशु पक्षी तथा मनुष्यादि के शरीरों में उसी चिच्छक्ति का विकास
हो गया है जिससे ये मिट्टी के पुतले चेतन दीखने लगे हैं। वायु
में उसकी स्पन्द शक्ति, पत्थरों में दार्थ्यशक्ति, जलों में द्रवशक्ति,