पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 713 of 726
Read in contextब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२५
फिर ज्ञानी लोग व्यवहार कैसे करें ? इसका उत्तर यह है कि नाटक
करने वाले नट लोग जैसे बनावटी आस्था से अपना काम कर गुज़-
रते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी लोग भी लौकिक कामों को बनावटी आस्था
से निभा लेजाते हैं । ऊपर पानी बहता रहता है परन्तु नीचे बैठी
हुई बड़ी शिला जैसे शान्त भाव से पड़ी रहती है इसी प्रकार नाम-
रूपी रूपी जल ऊपर बहता भी रहो परन्तु कूटस्थ ब्रह्मरूपी शिला
ज्यों की त्यों बनी रहती है । ज्ञानी लोग संसार के साथ वह नहीं
जाते । दर्पण के अन्दर कोई छेद नहीं होता, जिसमें कोई वस्तु
छिप रही हो परन्तु ऐसा मालूम हुआ करता है मानो दर्पण में अन-
गिनत वस्तु से परिपूर्ण बड़ा लम्बा चौड़ा आकाश ही हो । ठीक
इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चिद्धन
अखण्ड ब्रह्मरूपी दर्पण में प्रतीत हो रहा है । पहले दर्पण दीख लेता
है तब उसके अन्दरकी वस्तु देखी जा सकती है । इसी प्रकार पहले
सच्चिदानन्द वस्तु दीख चुकती है उसके बाद नामरूपात्मक जगत्
का भास होता है । अब होशियार साधकों को चाहिये कि ज्यों ही
उन्हें सच्चिदानन्द वस्तु का भान हो चुके त्यों ही अपनी बुद्धि को
रोक कर खड़े होजांय और वार वार उसी का भान होते रहने दें ।
यदि उनकी मति आगे नामरूप की तरफ को चलने का प्रयत्न करती
हो तो उसे वैसा न करने दें । जानते हो ये साधक अब कहां पहुंच
चुके हैं ? इन्होंने कितना रास्ता तै कर लिया है ? सुनो ! ये लोग
चलते चलते जगत् से हीन सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मधाम में खड़े
हुए हैं । इसी को तो 'अद्वैतानन्द' कहा जाता है । मुमुक्षु लोग इस
'अद्वैतानन्द' में चिरकाल तक विश्राम करें यही हमारी अभिलाषा है।
जगत् के मिथ्या भाव का चिन्तन करने से जो आनन्द जाग
उठता है वही 'अद्वैतानन्द' होता है ।