पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context११८ पञ्चदशी
को चकित कर देती है। इसी सब अभिप्राय को लेकर श्रुति ने
मायामय होने के कारण विकारों को अनृत कहा है और विकारों
का आधार जो मिट्टी है उसी को सत्य माना है। उसका मतलब
है कि ये जो विकार दीख रहे हैं ये वाणी से बोले जाने वाले नाम
ही तो हैं, इन सब में सत्य पदार्थ तो मिट्टी ही है। 'व्यक्त' 'अव्यक्त'
और इनका 'आधार' ये तीन ही तो पदार्थ संसार में होते हैं। इन
तीनों में पहले दोनों जो 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' हैं वे तो काल-
भेद से पर्याय से होते रहते हैं अर्थात् कभी कार्य होता है और कभी
शक्ति होती है। इनका यह कभी कभी होना ही तो इनके मिथ्यापन
को सिद्ध कर रहा है। किन्तु इन तीनों का जो आधार है वह
वस्तु तो इन दोनों ही अवस्थाओं में रहती है—वह [ मिट्टी ]
कार्यावस्था में भी रहती है और शक्ति काल [कारणावस्था] में भी
रहती है। यों सदा रहने वाली होने के कारण वही सत्य वस्तु
है। जो निस्तत्व होकर भी भासने लगे उसे हम 'व्यक्त' कहते
हैं। उसके उत्पत्ति और नाश दोनों ही होते हैं। वह जब उत्पन्न
होता है तब मनुष्य उनके कुछ नाम रख लेते हैं। क्योंकि वह
व्यक्त पदार्थ जब नष्ट भी हो जाता है तब भी यह नाम तो मनुष्यों
की वाणी पर चढ़ा रह जाता है। इस कारण कहते हैं कि उस नाम
से निरूपणीय [जाना जाने वाला] जो कोई व्यक्त पदार्थ है वह
नामात्मक ही है। यदि वह व्यक्त पदार्थ नामात्मक न होता तो
अब उसका व्यवहार नाम से क्यों कर होता । व्यक्त पदार्थ का वह
रूप भी सत्य नहीं है। क्योंकि वह तो निस्तत्व है,विनाशी है,और
वाणी से बोला हुआ एक शब्द ही शब्द तो है। यदि यह आकार
[रूप] असत्य न होता तो जैसे मिट्टी आदि निस्तत्व नहीं है,
विनाशी नहीं है, या केवल नाममात्र ही नहीं है, ऐसे ही ये भी