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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 720

१३२ पञ्चदशी
इस मरे हुए शरीर को देखकर मुझ में कर लिया है वे सब धर्म मुझ
में नहीं है। जिन्होंने तत्व को सुना नहीं है वह सुनते फिरें, तत्व को
जान चुकने वाला मैं भला क्यों सुनूँ ? जिन्हें संशय हो वे मनन
करें, जिस मुझे संशय ही नहीं रहा वह मैं मनन क्यों करने लगूँ ?
जिसे विपर्यास हो वह निदिध्यासन करे, जब मुझे विपरीत ज्ञान
ही नहीं रहा तब मैं ध्यान ही क्यों और किस बात का करूँ ? मुझे
तो अब कभी यह मालूम ही नहीं होता कि मैं देह हूँ। मैं जो कभी
कभी यह कह देता हूँ कि 'मैं मनुष्य हूँ' सो तो अनादिकाल की
वासनाओं के प्रभाव से कह बैठता हूँ। जब मेरा प्रारब्ध-कर्म नष्ट
हो जायगा तब निश्चय ही यह व्यवहार भी नहीं रहेगा। जब तक
मेरे प्रारब्धकर्म क्षीण न हो जांयगे तब तक हज़ार ध्यान करने पर
भी यह व्यवहार रुक नहीं सकेगा। जो व्यवहार को कम करना
चाहते हों उन्हें यह ध्यान भले ही पसन्द हो, मुझे तो अब यह
व्यवहार बाधक ही प्रतीत नहीं होता। फिर मैं ध्यान क्यों करूँ ?
विक्षेप भी अब मुझे नहीं होता इस कारण समाधि भी नहीं होती।
विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारी मन को ही होते हैं। मैं
आत्मानुभव करने भी क्यों बैठ जाऊँ ? मैं तो नित्यअनुभवरूप ही
हूँ। मुझ से पृथक् और अनुभव क्या होगा ? मुझे अब निश्चय हो
गया है कि जो करना था सो कर डाला और जो पाना था सो पा
चुका। अब लौकिक, शास्त्रीय या और किसी तरह का भी व्यवहार
मेरे प्रारब्धानुकूल चलता रहो, मैं तो अकर्ता और अलेप हो गया.
हूँ। या फिर जिस मार्ग पर चलकर मुझे कृतकृत्यता मिली है वह
मार्ग औरों के लिये भी बना रहो इसलिये लोकसंग्रह का ध्यान रख
कर मैं शास्त्रीय मार्ग पर ही चलता रहूँगा इसमें भी मेरी कोई हानि
नहीं है। लोगों को दिखाने और सिखाने के लिये मेरा शरीर देवार्चन