पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 707 of 726
Read in contextब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११९
होते । मिट्टी नाम की जो चीज है वह व्यक्तकाल में या.उससे
पहले, या उसके बाद, सदा एकरूप ही रहती है, सदा सत्य
और अविनाशी होती है, इससे उसे ही 'सत्य' कहते हैं । सत्य
पदार्थ का बोध जब किसी को हो जाता है तब घटादि अनृत
पदार्थों की निवृत्ति हो ही जाती है—अर्थात् उन्हें सत्य समझना
छूट जाता है। ज्ञान से जैसी निवृत्ति हम आध्यात्मिकलोग चाहते हैं
वह तो यही है कि—उन पदार्थों की सत्यता का विचार मन में से जाता
रहे। वे प्रतीत होने [भी] बन्द हो जांय, ऐसी आशा बोध से हम
कर बैठेंगे तो हमें निराश ही हो जाना पड़ेगा और ज्ञान में अश्रद्धा
करनी पड़ जायगी । जो पुरुष पानी के किनारे नीचे को मुंह किये
खड़ा है उसे जल में उलटा आदमी दीखता तो है परन्तु वह वहां
होता नहीं है। किनारे पर खड़े हुए मनुष्य को ही जैसे सच्चा
समझा जाता है वैसे उसे [पानी के छायामनुष्य को] कोई सच
नहीं समझता । वह समझ लेता है कि जलरूपी उपाधि के कारण
ऐसी भ्रान्त प्रतीति हो रही है। जब तक जलरूपी उपाधि बनी
है तब तक ऐसी मिथ्या प्रतीति होती ही रहेगी । इसी प्रकार सब
का कारण जो आत्मतत्व है उस का ज्ञान जब हो जाता है तब
विवेकी पुरुष इस प्रतीयमान् जगत् को मिथ्या मान लेता है ।
उसके बाद फिर जब उसे यह जगत् भासता है तब वह इसे
इन्द्रियोपाधिक भ्रम समझ कर टालता रहता है। वह जान लेता
है कि जब तक ये इन्द्रियां बनी है तब तक ऐसी प्रतीति होती
ही रहेगी । भले ही होती रहो, वह फिर इसको सत्य मानकर कोई
भी व्यवहार नहीं करता । जितने भी सोपाधिक भ्रम होते हैं उन
सभी का यही हाल होता है। उनमें मिथ्या प्रतीति तो रहती
है परन्तु उस पर से विश्वास उठ जाता है । ऐसा शुद्ध और असंग