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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२३
नुकूल कैसे भी रहा करो उसकी जीवन्मुक्ति को कोई रोक नहीं
सकेगा। उसी का चिंतन, उसी का कथन, उसी की बातचीत और
उसी में तत्पर हो जाना 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है। ऐसा ब्रह्मा-
भ्यास जब दीर्घकाल तक निरन्तर तथा श्रद्धापूर्वक किया जायगा
तब अनादिकाल से हृदय में घुसी हुई वासनायें नष्ट हो जायँगी ।
मिट्टी की शक्ति घट शराव आदि अनेक मिथ्या पदार्थों को बना
देती है,इसी प्रकार ब्रह्मशक्ति भी अनेक अनृत पदार्थों को बना डालती
है। अथवा इसे यों समझना चाहिये कि जीव की निद्राशक्ति अनेक
दुर्घट सुपनों को घड़ डालती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति सृष्टि
आदि अनेक कार्यों का सर्जन कर लेती है। निद्रा से तो यहां तक हो
जाता है कि—कभीआकाश में उड़ान मारना दीखता है,कभी अपना
सिर कटने की बात दीखती है,कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत जाते
हैं,कभी मरे हुए पुत्रादि देखने मिल जाते हैं। उस सुपने में 'यह ठीक
है और यह ठीक नहीं' यह व्यवस्था नहीं की जा सकती। वहां तो जो
जैसा दीखे, वह वैसा ही ठीक होता है। ध्यान देने की बात है कि—
जब जीव की निद्राशक्ति की ऐसी अद्भुत महिमा है कि वह अपने में
तर्क शास्त्र को चलने नहीं देती है, तब फिर ब्रह्म की मायाशक्ति
की महिमा अचिन्त्य हो तो इसमें अचम्भा क्यों करते हो ? पुरुष
सोया पड़ा होता है उधर निद्राशक्ति अपना काम जारी रखती है—
वह अनेक प्रकार के सुपनों को बना बना कर तैयार करती रहती
है उससे पूछती तक नहीं कि क्या मैं यह सब कर डालूँ ? ठीक
इसी प्रकार ब्रह्मदेव निर्विकार भाव से विराज रहे हैं, यह श्रीमती
माया शक्ति अनेक आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ब्रह्माण्डलोक,
प्राणी और पर्वत समुद्र आदि को घड़ घड़ कर खड़ा करती जाती
है। यों तो ये सभी विकार मायाशक्ति ने उत्पन्न किये हैं,परन्तु प्राणियों