पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
तृप्तिदीप का संक्षेप ५३
रहती तो है, परन्तु दृष्टिकोण बदल जाने से अब क्लेशरहित जीवन-
यात्रा होने लग पड़ती है। अब उसे शरीर के सुख दुःखों के
अनुसार सुखी दुःखी नहीं होना पड़ता है। जगत् की असारता
को समझ चुकने पर इच्छा करने वाले की और अभिलाषा करने
योग्य पदार्थ की विचारहीन भावना पर कुठाराघात हो जाता है।
फिर तो तैलरहित दीपक जैसे बुझ जाता है उसी तरह संसारताप
स्वयं शान्त हो जाता है। अब तो तमाशे में देखते हुए काल्प-
निक पदार्थों की तरह इस संसार के प्रिय से प्रिय समझे जाने
वाले पदार्थों को भी खुशी खुशी छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार
का तत्त्व दर्शन हो चुकने पर भी जब तक इस शरीर के जीवन
का काल रहता है तब तक इच्छा अनिच्छा और परेच्छा प्रारब्धों
से प्रभावित होकर लौकिक भोगों में प्रवृत्त होते ही रहते हैं। इस
प्रकार की प्रारब्धप्रवृत्ति की रोक थाम करना अत्यन्त असंभव
है। युधिष्ठिर और राम जैसे तत्त्वदर्शी लोग भी इस प्रकार के व्यव-
हार को रोक नहीं सके हैं। आत्मदर्शी की तथा दूसरों की
इच्छाओं में यही भेद होता है कि आत्मदर्शी की इच्छा से आगे
को व्यसन की उत्पत्ति नहीं हो पाती। उसे भोगों का भोग तो प्राप्त
हो जाता है परन्तु वह भोगों का व्यसनी (दास) नहीं बन जाता।
जब कि हम संसारी लोग भोग भी भोगते हैं और आगे को उनके
दास भी बन जाते हैं। भोग देकर चरितार्थ हुआ प्रारब्ध कर्म
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का ही मर जाता है परन्तु अज्ञानी लोगों
की इस भ्रान्त धारणा से कि ये भोग तो सच्चे हैं आगे को भी
भोगों का व्यसन लग जाता है। वह ज्ञानी को नहीं लगता। जब
कि यह सारा ही जगत् उसका आत्मा बन चुकता है तब व्यसन
से प्रभावित होने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता। तत्त्वज्ञान
५४ पंचदशी
का जो प्रभाव है वह तो व्यवहार में ही देखा जा सकता है।
व्यवहार रुक जाने पर तत्वज्ञान का प्रभाव देखने को मिल ही नहीं
सकता। यही कारण है कि निर्विकल्प समाधि को तत्वज्ञान की
अवस्था माना ही नहीं जाता। निर्विकल्प समाधि तो उपरति की
ही एक अवस्था है। वह ज्ञान की कोई सी भी अवस्था नहीं है।
हां, यह बात तो है कि जगत् की मायामयता का सम्पूर्ण दर्शन
'तभी हो सकता है जब कि चित्त का निरोध हो चुका हो। मनुष्य-
जीवन की गम्भीर समस्याओं को समझने का अवसर चित्त के
रुकने पर ही आता है। इस भाव को लेकर चित्त के रोकने का
अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु चित्तनिरोध ही हमारा
एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आत्मरूप का अनुभवयुक्त ज्ञान हो जाना
ही राजयोग का मुख्य ध्येय है। आत्मा के स्वरूप का इस प्रकार
का दर्शन मिल जाने पर ही शरीरों के साथ सुखी दुखी न हो
सकने की शान्तिवर्धक अवस्था आती है। हमारे ये तीनों शरीर
स्वभाव से ही दुःखों के निवासभवन हैं। शरीर में वात,पित्त, कफ
की न्यूनाधिकता से करोड़ों बीमारी खड़ी होती रहती हैं। मन में
काम क्रोध आदि की अशान्तिकारक भावनाएँ आती ही रहती
हैं। यों इन शरीरों में स्वभाव से ही दोष भरे पड़े हैं। इन दोषों
से इनका वियोग कर सकना ऐसा ही असंभव है जैसे घड़े को
मिट्टी से अलग करना। परन्तु अविद्या से प्रभावित होकर जब
इन दुःखपूर्ण शरीरों की और आत्मा की परस्पर एकता मान ली जाती
है तब परस्पर में धर्मों का लेन देन हो जाता है। आत्मा की
सत्यता इन शरीरों में मान कर इस सम्पूर्ण मिश्रण को अपना
स्वरूप समझने की भूल की जाती है। शरीर दुःखी हो तो
कुटुम्ब के किसी भी व्यक्ति के दुःखी होने से अपने को ही दुःखी
[header] तृप्तिदीप का संक्षेप ५५ [/header]
मानते हुए कुटुम्बनेता की तरह अपने आपको ही दुःखी माना
जाने लगता है । यह भूल साक्षित्व का ध्यान न आने तक ही
चलती है । सर्पबुद्धि से भयभीत पुरुष पीछे से रज्जु रूप को
पहचान कर जैसे अपनी पहली समझ पर हँसता है,
उसी तरह ज्ञानी को भी अपनी पहली भ्रान्ति पर उपहासपूर्ण
उपेक्षा का भाव आता है । जड और चेतन के मिश्रण
रूपी इसी अपराध को क्षमा कराने के लिये ही मानो साधक,
ज्ञान की अनन्त आवृत्तियाँ किया करता है और जब तक
स्पष्ट रूप से व्यापक चेतन अलग और ये शरीर अलग दिखायी
देने नहीं लगते, तब तक ज्ञान की आवृत्ति करता ही जाता है।
इस अपने पूर्वापराध को क्षमा कराने की इसके सिवाय दूसरी
कोई विधि ही नहीं है। जब तक यह प्रारब्ध देह है तब तक
जीवभाव की गन्ध कभी कभी तो ज्ञानी के व्यवहार में आया ही
करेगी। परन्तु इतनी सी घटना से तत्वज्ञान को विनष्ट हुआ
नहीं समझा जायगा। क्योंकि जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत
नहीं है जो साधकों पर लागू कर दिया गया हो। यह तो जिस
क्रम से चलता है—जैसे धीरे धीरे उन्नति करता है—इसे तो
वैसा का वैसा ही चलने देना पड़ेगा। दसवें के हमारे उपर्युक्त
दृष्टान्त में भी यही बात है कि दसवें की अप्राप्ति के लिये रोना
तो उसका ज्ञान होते ही नष्ट हो जाता है। परन्तु दसवें के शोक
में सिर पीटते पीटते जो घाव पड़ गया है, वह तो महीने दो
महीने में जाकर अच्छा हो पाता है। हां, यह बात तो है कि
दसवें के न मरने के महालाभ से उसे जो हर्ष होता है वह सिर
के घाव की पीड़ा को उपेक्षित करा देता है। इसी प्रकार जड़
चेतन के ग्रन्थिमोक्ष से प्रारब्ध दुःख तो ढक ही जाते हैं—वे
५६ पंचदशी
नगण्य होजाते हैं—वे फिर सुलझाने योग्य समस्या नहीं रह
जाते। शरीर आदि की रचना यदि केवल अज्ञान से हुई होती
तो हां संसारविषयक भ्रमपूर्ण धारणा के हटते ही शरीर का भी
पात होजाता। परन्तु इनकी रचना तो अज्ञान और कर्म दोनों से
मिलकर हुई है। संसारविषयक अज्ञान के नष्ट हो चुकने पर भी कर्मों
का परिचालित वेग जब तक पूरा पूरा शान्त नहीं हो लेगा, तब
यह ज्ञानिशरीर जीवित रहेगा ही और संसार तथा मोक्ष का
मिश्रित अनुभव लेता ही रहेगा। इसके पश्चात् ज्ञानी की तृप्ति में
एक अभूतपूर्व परिवर्तन की अवस्था आयेगी। अब ज्ञानी को कुछ
भी कर्त्तव्य शेष दीख नहीं पड़ेगा। अब वह दूसरे कर्त्तव्याक्रान्त
लोगों को पहाड़ पर चढ़े हुए पुरुष की तरह उपेक्षाभाव से
देखेगा। अब वह अपने मन से ऐसे प्रश्नों की झड़ी लगा देगा
कि जिन का उसके मन पर जीवन्मुक्त होजाने के सिवाय कुछ भी
सन्तोष जनक उत्तर नहीं होगा। मन के इस निरुत्तरपने का
परिणाम यह होगा उसे अपना संसरण का विभाग, अपने लाभा-
लाभ के विचार से तो एकदम बन्द कर देना ही होगा। हां,
जिस शास्त्रीय मार्ग पर चलकर उसने मुक्ति का महालाभ उठाया
है, वह मार्ग दूसरों के लिये भी अक्षुण्ण बना रहे इस लोक
संग्रह के विचार से अपने जीवनरथ को शास्त्रीयपद्धति पर ही
दौड़ाता चला जायगा। परन्तु एक बात भले प्रकार समझ रखने
की है कि ज्ञानी की शास्त्रीयमार्ग पर कर्म करने की अपनी कुछ
भी आवश्यकता नहीं है। उसके ज्ञान की स्थिरता में कर्म का
उपयोग लेशमात्र भी नहीं है। उस के ज्ञान की जो
निरन्तर धार बहेगी वह कर्म करने से नहीं बहेगी।
वह तो एकमात्र ज्ञान के अबाधित होने से ही बहती रह सकेगी।
इसके अतिरिक्त कोई सा भी साधन ज्ञान को निरन्तर स्थिर नहीं
रख सकेगा । इस बाधित संसार का यह विस्तृत पसारा उसके
ज्ञान को मार गिरायेगा ऐसी तो शंका ही निर्मूल है । ये सब
पदार्थ जब अपने पूर्ण यौवन में थे तब उन सब को मार कर
आत्मलाभ करने वाला ज्ञान, क्या भला अब इन मृतों से मार खा
सकेगा ? जिस ज्ञान ने बचपन में सारे पसारे को सकोड़ दिया
था अब अपने यौवन में उनसे कैसे हार मान लेगा ? ज्ञान हो
चुकने के पश्चात् भी दीखते रहने वाले इस संसार रूपी मुरदे से
तो ज्ञानराजा की कीर्त्ति ही बढ़ेगी । इस प्रकार का ज्ञान जिस
ज्ञानी को कभी भी छोड़ कर नहीं जाता, उस ज्ञानी के देहादि
कुछ करें या न करें इन घटनाओं से वह प्रभावित नहीं होता ।
प्रवृत्ति की ओर जिसको आग्रह है वह तो ज्ञानी की पंक्ति में
बैठने का अधिकारी नहीं है । क्योंकि सांसारिक या पारमार्थिक
सुख पाने के लिए यत्न करने का भाव यही है कि अभी तक वह
सुख के स्वरूप को पा नहीं सका है। ऐसे अवसर पर ज्ञानी का
एक ही कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों में रह कर इन्हें कर्त्तव्य का
पाठ स्वयं व्यवहार करके सिखाया करे। तथा जिज्ञासुओं को
कर्मों के दूषण दिखा दिखा कर कर्म करने से छुड़ा छुड़ा कर
उन्हें ज्ञानमार्ग पर डालता जाय । अपने मानापमान की कुछ भी
परवा न करके उन्हें अपने-अपने अधिकार के अनुरूप मार्गों पर
डालता जाय । यह अमानवी अवस्था जब प्राप्त हो चुकेगी तब
की देव दुर्लभ कृतकृत्यता का वर्णन करने के लिए मानवी भाषा को
दिवालिया हो जाना पड़ेगा । आइये उस स्थिति का अनुभव लेने
के लिए हम आज से ही उद्योग प्रारम्भ कर दें ।
8. Kutasthadipa
[८]
कूटस्थदीप का संक्षेप
किसी भित्ति पर सूरज का प्रकाश पड़ रहा हो। उसी भित्ति
पर यदि दर्पण के सूरज का दुहरा प्रकाश पड़ जाय और वह
भित्ति दो प्रकाशों से जगमगा उठे, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य
ने इस देह को भी साधारणतया [अन्य सृष्टि की तरह] प्रकाशित
तो कर ही रक्खा है परन्तु इस देह को ही इस बुद्धिस्थ चिदा-
भास ने दोबारा विशेष रूप से प्रकाशित कर डाला है। यों, देहों
को प्रकाशित करने वाली दो चेतना हैं। इसे समझने के लिए
कल्पना करो कि एक भित्ति पर बहुत से दर्पणों की दीप्तियाँ पड़
रही हैं, उन बहुत सी दीप्तियों के बीच बीच में जहाँ दर्पण की
दीप्ति नहीं पड़ रही हैं वहाँ सूर्य की सामान्य दीप्ति तो दीखती
ही है। इतना ही नहीं जब एक भी दर्पणदीप्ति शेष नहीं रह
जाती तब भी वह सामान्य सूर्यदीप्ति दीखा ही करती है। इसी
प्रकार चिदाभास से युक्त जो बहुत सी बुद्धियाँ हैं उनके बीच
बीच में [जहाँ एक बुद्धि नष्ट होती है और दूसरी उत्पन्न होने
की तैयारी में लगी रहती है तब बीच में] यह कूटस्थ तत्व रहता
है। विवेकी लोग इसी कूटस्थ को पहचानें। सुषुप्ति के समय जब
कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रह जाती, तब इन बुद्धियों के अभाव
को जो कोई तत्व प्रकाशित किया करता है वह यह कूटस्थ
चैतन्य ही तो है।
कूटस्थदीप का संक्षेप ५९
जो बुद्धि घटाकार हो गई है, उसमें जो चिति है, वह तो
केवल घट को ही प्रकाशित कर सकती है। परन्तु घट में जो
ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है ( जिसके आने पर हम कहने
लगते हैं कि हमने घट को जान लिया) वह तो ब्रह्म चैतन्य से
ही प्रकाशित हुआ करता है। भेद केवल इतना ही होता है
कि—बुद्धि के उत्पन्न होने से पहले पहले वह ब्रह्म इस घट को
अज्ञात रूप से प्रकाशित कर रहा था। अब बुद्धि के उत्पन्न हो
जाने के बाद तो वही ब्रह्म इसको ज्ञात रूप से प्रकाशित करने
लगता है। समझते हो ज्ञान क्या है ? भाले की नोक पर जैसे
लोहा लगा रहता है इसी प्रकार बुद्धिवृत्ति के अग्र भाग में जब
चिदाभास लग जाता है तब उसे ही 'ज्ञान' कहते हैं। अज्ञान
का विवरण हम क्या करें। वह तो जाड्य ही है। अर्थात् स्वयं
स्फूर्ति का न होना ही 'अज्ञान' कहाता है। अब जो कोई घड़ा
ज्ञान से व्याप्त हो जाता है तो उसे 'ज्ञात घट' कहते हैं, तथा
जो घड़ा अज्ञान से व्याप्त रह जाता है उसे 'अज्ञात घट' कहा
जाता है। जैसे 'अज्ञात घट' ब्रह्म से भास्य रहता है ठीक इसी
तरह 'ज्ञात घट' भी ब्रह्म से ही भास्य होता है। चिदाभास का
उपयोग तो केवल इतना ही है कि—वह ज्ञातता नाम के धर्म को
उसमें उत्पन्न कर दिया करे। इस धर्म को उत्पन्न करने के पश्चात्
वह चिदाभास क्षीण हो जाता है। जिस बुद्धि में चैतन्य का
आभास न पड़ा.हो, उस बुद्धि में तो ज्ञातता को उत्पन्न करने
का सामर्थ्य ही नहीं होता। घट में जब चिदाभास नाम के फल
का उदय हो जाता है तब बस यही 'ज्ञातता' कहाती है। वह
ब्रह्म चैतन्य तो (१) बुद्धिवृत्ति (२) चिदाभास तथा (३) घटादि
विषय इन तीनों को ही प्रकाशित किया करता है। परन्तु अकेले
६० पंचदशी
घट को प्रकाशित करने वाला तो अकेला चिदाभास ही है । जब
घट में ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है तब उसमें दुहरा चैतन्य
हो जाता है । जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कथन
चिदाभास की कृपा का फल है । जब हम कहते हैं कि 'घट को
जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता है ।
यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास का और ब्रह्मतत्व का भेद
जान लेना चाहिए । देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म का विवेक
यहाँ तक हमने किया है । आइये अब यह भी देख लें कि—देह
के अन्दर के मामलों में ये दोनों कैसे रहते हैं ? तपा हुआ लोहा
जैसे केवल अपने आपको ही प्रकाशित किया करता है, इसी
प्रकार चिदाभास से युक्त जो अहंवृत्ति और कामक्रोधादि वृत्तियाँ
हैं—जिनमें तपे हुए लोहे में अग्नि के समान ही चिदाभास व्याप्त
हुआ रहता है—वे वृत्तियाँ केवल अपनी ही भासक होती हैं ।
इतना सामर्थ्य उनमें नहीं होता कि वे दूसरे की भासक हो सकें।
इन वृत्तियों का यह स्वभाव है कि ये क्रम क्रम से रुक रुक कर
पैदा होती हैं, और सुप्ति मूर्छा या समाधि के समय तो सब की
सब विलीन हो जाती है—तब इनमें से एक भी शेष नहीं रह
जाती । अब यदि अन्दर के कूटस्थ तत्व को समझना हो तो यों
समझना चाहिए कि—जो निर्विकार रहने वाली वस्तु, इन सब
वृत्तियों की सन्धियों को, और इन सब वृत्तियों के अभावों को,
प्रकाशित किया करती है अथवा जाना करती है, वही निर्विकार
वस्तु 'कूटस्थ' कहलाती है । जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य हो
जाता है, इसी प्रकार अन्दर की वृत्तियों में भी दुगना चैतन्य
इकट्ठा हो जाता है । यही कारण है कि—सन्धियों की अपेक्षा
वृत्तियों में चैतन्य की अधिक विशदता पायी जाती है । वृत्तियों
कूटस्थदीप का संक्षेप ६१
के स्वयं प्रकाश होने के कारण इनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती
और उनमें ज्ञातता भी उत्पन्न नहीं होती। ये वृत्तियाँ जब उत्पन्न
हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही स्वविषयक अज्ञान को भगा
देती है। यों अज्ञान की व्याप्ति भी इन वृत्तियों में नहीं रहती
और अज्ञातता भी नहीं होती ।
जिस दुगने चैतन्य का वर्णन ऊपर किया है, उसमें से जितने
चेतन भाग के जन्म और नाश होते हुए प्रतीत होते हों, उसे
तो अकूटस्थ मान लो तथा जो अविकारी भाग प्रतीत होता हो
उसे 'कूटस्थ' जान लो । देह इन्द्रिय मन बुद्धि आदि से युक्त जो
जीवाभास रूपी भ्रम हो गया है, इस भ्रम का अधिष्ठान जितना
कुछ चेतन है, उसी चेतन को हम 'कूटस्थ' कह रहे हैं। तथा
जिसको वेदान्तों ने सम्पूर्ण जगद्भ्रम का मूलाधिष्ठान बताया है
उसे हम 'ब्रह्म' कहना चाहते हैं। जब एक ही चैतन्य में इस
सम्पूर्ण जगत् का आरोप कर लिया गया है तब इस जीवाभास
के विषय में जो कि उसी का एक भाग है शंका करनी व्यर्थ है।
जगत् और जगत् का एकदेश यह चिदाभास ये दोनों आरोप-
णीय पदार्थ हैं। यदि कोई किसी महायुक्ति से इन दोनों आरोप-
णीय पदार्थों के भेद की विवक्षा करना छोड़ बैठे, तो फिर चिति
एक की एक ही रह जाती है—फिर 'तत्' 'त्वं' पदार्थों में भेद
नहीं रह जाता । अर्थात् चिति में जो भेद है वह तो औपाधिक
किंवा भ्रान्तिजन्य है। सच्ची तो एकता ही है। भ्रम का कारण
तो यह होता है कि—इस आभास ने बुद्धि के कर्तृत्व भोक्तृत्व
आदि धर्मों को तथा आत्मा के स्फूर्ति नाम के धर्म को अपने में
धारण कर लिया है। भ्रमस्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और
आरोप्य दोनों के ही धर्म दीखते हैं और वह कल्पित मानी जाती
६२ पंचदशी
है, इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से यह आभास भी कल्पित
वस्तु ही है ।
बुद्धि क्या है ? आभास कौन है ? इन सब में आत्मा नाम
का पदार्थ कहाँ छिपा बैठा है ? यह जगत् का बवण्डर कैसे बन
कर खड़ा हो गया है ? इन प्रश्नों को जब कोई सन्तोषजनक
रीति से नहीं सुलझा लेता तब उसे मोह में फँसना पड़ जाता
है । इन प्रश्नों का हल न करना ही 'संसार' कहाता है । यही
मोह मुमुक्षु लोगों को हटाना है । यही सब अनर्थों का मूल
निकास है । जिसने तो बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक कर
लिया हो, वही ज्ञानी है, वही सब अनर्थों से मुक्त हो गया है ।
यह बात वेदान्तों ने डंके की चोट कही है ।
जिस संसार और जिस मोक्ष का वर्णन ऊपर किया
है, उनको यदि कोई सच्चे मानों में समझ जाय, यदि किसी को
यह मालूम हो जाय कि ये बन्ध और मोक्ष तो केवल अविवेक
की खसकीली बुनियाद पर चिन कर खड़े कर दिए गये हैं तब
फिर बन्ध किस का ? और मोक्ष किस का ? इत्यादि कुशंकाओं
का समाधान साधक के हृदय में स्वयमेव हो जाता है—वह जान
जाता है इन प्रश्नों को जिसने हल नहीं किया वह बद्ध है ।
जिसने इन प्रश्नों का हल कर दिया वह मुक्त ही है ।
इस कूटस्थ तत्व को संक्षेप में यों समझना चाहिए कि जब
वृत्तियाँ उदय हो जाती हैं, तब यह तत्व वृत्तियों का साक्षी
होकर, जब तक वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं तब तक यह तत्व
वृत्ति के प्रागभाव का साक्षी बन कर, आत्मजिज्ञासा जब किसी
को हो जाय तब यह तत्व उसी का साक्षी रह कर, उससे पहले
'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे अज्ञान के साक्षी के रूप में, यह तत्व रहा
कूटस्थदीप का संक्षेप ६३
करता है। वह साक्षी कूटस्थ तत्व इस असत्य जगत् का आलम्बन
है, इससे इसे 'सत्य' कहते हैं। सम्पूर्ण जड पदार्थों का प्रका-
शक होने से इस तत्व को 'चिद्रूप' मानते हैं। सदा ही प्रेम
का स्थान होने से इस साक्षीतत्व को 'आनन्दरूप' समझते हैं।
यह कूटस्थ तत्व सभी अर्थों का साधक है, और सभी से सम्बद्ध
है, इससे उसे 'सम्पूर्ण' भी कह देते हैं। यह कूटस्थ तत्व 'जीव'
और 'ईश्वर' आदि की कल्पना से बहुत ऊपर रहता है। यह तो
एक स्वयंप्रकाश केवल तथा कल्याणस्वरूप तत्व है।
यद्यपि माया ने आभास के द्वारा 'जीव' और 'ईश्वर' की रचना
कर डाली है, फिर भी ये दोनों काच के घड़े के समान स्वच्छ ही हैं।
काच का घड़ा जैसे मिट्टी के घड़ों से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार
ये जीवेश्वर भी देहादि की अपेक्षा स्वच्छ होते हैं। देह और मन
दोनों ही अन्न से बनते हैं, फिर भी मन, देह से स्वच्छ होता है।
इसी प्रकार मायिक होने पर भी अन्य मायिक पदार्थों से ये दोनों
स्वच्छ होते हैं। ये दोनों ही चिद्रूप हैं, यह तो इसी से सिद्ध
हो जाता है कि—वे सब के अनुभव में चिद्रूप में ही आते हैं।
उस माया शक्ति ने ही उन दोनों को चिद्रूप से प्रकाशित कर
डाला है। हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—जिसे 'हमारी
माया' कह सकते हैं—सुपने के चेतन जीव और सुपने के ईश्वर
आदि को उत्पन्न कर ही डालती है। फिर महामाया चेतन
जीवेश्वरों को उत्पन्न कर डाले इसमें आश्चर्यचकित क्यों होते
हो ? परन्तु मायिकपने के वहम में इतने अधिक भी न फँस
जाओ कि कहीं कूटस्थ को भी मायिक ही कह बैठो। क्योंकि
कूटस्थ के मायिक होने का तो कोई भी प्रमाण नहीं मिलता।
सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर 'होकर इसी कूटस्थ के वस्तुत्व का डंका
६४ पंचदशी
बजा रहे हैं। वे इस कूटस्थ के विरोधी किसी भी वस्तु को सहन
नहीं करते हैं। हम औपनिषद लोग तो वेदान्तों के रहस्य को
खोलने का उद्योग भर करते हैं। तर्क के आधार से कुछ कहने
का तो हमारा संकल्प ही नहीं है। यदि हम तर्क के सहारे से
कुछ कहते तो तार्किक लोगों को हम पर आक्षेप करने का अव-
काश भी मिल जाता। मुमुक्षु को चाहिए कि इस दुरवगाह आत्म-
तत्व को जानने के लिए केवल श्रुति का ही सहारा पकड़ लें।
श्रुति का अभिप्राय तो स्पष्ट ही यह है कि—इन जीव और ईश्वर
को माया ही उत्पन्न कर देती है। ईक्षण से लेकर प्रवेश पर्यन्त
जितनी भी सृष्टि है, सो सभी ईश्वर की बनाई हुई है तथा जाग्रत्
से लेकर मोक्ष पर्यन्त का सभी जगत्, जीव का बनाया हुआ है।
अब कूटस्थ के विषय में भी सुन लीजिये—वह तो सदा ही
कूटस्थ रहता है। जन्म, जरा, रोग, अनेक प्रकार की मानसी
व्यथायें और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले
आ रहे हैं। इन सब के होने पर भी इस तत्व में आज तक कुछ
भी अतिशय नहीं हो पाया है। इसीलिए मन में यह निश्चय कर
लीजिए कि—मरण और जन्म कुछ भी नहीं है। बद्ध और साधक
कोई भी नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को भी नहीं कहना
चाहिए। वह कूटस्थ तत्त्व मट्टी के पुतलों में वृथा ही लुक छिप
कर जन्म-मरण का भ्रमपूर्ण अभिनय कर रहा है। मन और
वाणी के अगम्य इस तत्व को, जब वह श्रुति किसी साधक को
बता देना चाहती है, तब साधक की योग्यता के अनुसार या
तो 'जीव' या 'ईश्वर' या फिर 'जगत्' का सहारा लेकर इस
अवाङ्मनोगोचर तत्व का बोध ज्यों त्यों करके उसे करा देती
है। इसी उद्देश्य को लेकर 'जीव' 'ईश्वर' और 'जगत्' के स्वरूप
का प्रतिपादन जहाँ तहाँ किया गया है। उसका परम तात्पर्य
कूटस्थदीप का संक्षेप ६५
का प्रतिपादन जहाँ तहाँ किया गया है। उसका परम तात्पर्य
तो जिस किसी भी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध करा देना
ही है। बोध कराने की प्रक्रियायें भले ही अलग अलग हों परन्तु
तत्व तो एक ही होता है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना
है उन सब के चित्त एक समान नहीं होते—उनके चित्तों में
बड़ी विषमतायें पायी जाती हैं। उनके चित्तों की विषमता के
कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न भिन्न हो जाती है। यह
तो मानी हुई बात है कि—श्रुति का तात्पर्य तो एक ही हो
सकता है। फिर भी जो लोग उनका विरुद्ध अर्थ करके आपस
में झगड़ते हैं, उसका कारण यह है कि ये लोग श्रुति के पूर्वापर
का विचार न करके, उसके तात्पर्य को न समझ कर, भ्रम में
पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को समझ
कर आनन्दसमुद्र में विहार करने लगते हैं। विवेकी लोगों का
तो यह निश्चय होता है कि—यह मायारूपी मेघ जगत् रूपी
जल को जब कभी इसके जी में आये, बरसाता फिरो। इसके
बरसाने और उसके बरसने से, चिदाकाश की कुछ भी हानि या
लाभ नहीं होता।
यदि कोई इस प्रकरण में कही हुई प्रक्रिया का सदा ही
विचार रक्खे तो वह अवश्य ही कूटस्थता का महालाभ करके
छोड़े।
9. Dhyanadipa
[ ६ ]
ध्यानदीप का संक्षेप
यदि किसी प्रतिबन्ध के कारण किसी को ब्रह्मज्ञान न हों
सकता हो और वह इस मार्ग पर श्रद्धा रखता हो तो वह ब्रह्म-
तत्व की उपासना ही किया करे । उससे भी उसे मुक्ति मिल ही
जायगी । एक पुरुष मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने
दौड़ता है, दूसरा पुरुष दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे
उठाने चलता है, इन दोनों को ही यद्यपि मिथ्या ज्ञान तो समान
ही हो रहा है, तौ भी प्रयोजनसिद्धि में विशेषता पायी ही जाती
है—पहले को तो मणि मिल जाती है, दूसरा उससे वंचित ही रह
जाता है। दीपक की प्रभा को मणि समझना 'विसंवादि भ्रम'
(विफलभ्रम) कहाता है, मणि की प्रभा को मणि समझना 'संवादि
भ्रम' (सफलभ्रम) माना जाता है। भाप को धुँआ समझा और
उससे अग्नि का अनुमान किया और वहाँ जाकर अग्नि को पा भी
लिया, यह भी संवादिभ्रम ही है। प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्र में
ऐसे अनन्त संवादिभ्रम पाये जा सकते हैं। इसी भ्रम के कारण
से मिट्टी लकड़ी और पत्थर तक देवता हो जाते हैं। किसी वस्तु
को उलटा समझ कर भी जब अभिलषित फल अचानक मिल
जाय तभी वह 'संवादिभ्रम' कहा जाता है। जैसे संवादिभ्रम भ्रम
होने पर भी ठीक फल दे देता है इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपा-
सना भ्रम होने पर भी मुक्ति रूपी फल को दे ही देती है।
ध्यानदीप का संक्षेप ६७
वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एक रसात्मक तत्व को परोक्ष रूप
से जान कर उपासक लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ब्रह्मतत्व ही हूँ' इस
प्रकार उपासना करने लगते हैं। यहाँ पर परोक्ष ज्ञान का अभि-
प्राय यही है कि—अभी उसे प्रत्यग्व्यक्ति दीखने नहीं लगी है,
केवल शास्त्र के कहने से 'ब्रह्म है' ऐसा एक सामान्य ज्ञान उसे
हो गया है। केवल परोक्षता रूपी इस कमी से ही उसे 'अतत्व-
ज्ञान' कह देना ठीक नहीं है। क्योंकि उसका ऐसा स्वरूप भी
तो अध्यात्मशास्त्र ने ही बताया है। इस कारण जब शास्त्रीय
रीति से उस सच्चिदानन्द तत्व का निश्चय होता है तब परोक्ष होने
पर भी वह ज्ञान तत्वज्ञान ही रहता है, भ्रम नहीं हो जाता।
शास्त्रों ने तो यद्यपि महावाक्यों के द्वारा ब्रह्म को प्रत्यक् ही बताया
है और वह है भी ऐसा ही, परन्तु जो लोग विचार नहीं करते,
उनकी समझ में यह बात आनी बड़ी ही कठिन है कि वह ब्रह्म-
तत्व हमारा आपा ही है। देहादि को आत्मा मानने का भ्रम जब
तक जाग रहा है, तब तक कोई भी पुरुष, मन्दबुद्धि होने के
कारण, ब्रह्मतत्व को आत्मा जान ही नहीं सकता। जो श्रद्धालु
है, जो शास्त्रदर्शी है, उसको ब्रह्म का 'परोक्ष ज्ञान' हो जाना तो
बहुत ही सुकर है। अद्वैत के इस ऐसे परोक्ष ज्ञान को द्वैत का
प्रत्यक्ष ज्ञान नष्ट नहीं कर सकता है। लोक में देखा जाता है
कि—प्रत्यक्ष शिलाबुद्धि परोक्ष ईश्वरभाव को हटाती ही नहीं
है। बताओ ? कि—प्रतिमा आदि के विष्णु होने में किस श्रद्धालु
को संदेह होता है। अश्रद्धालु लोग इस बात पर भले ही विश्वास
न करें, उनका उदाहरण देना यहाँ ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक
बातों में केवल श्रद्धालु लोगों को ही अधिकार है। परोक्ष ज्ञान
तो एक बार के आप्तोपदेश से ही उत्पन्न हो जाता है। आप्त
६८ पंचदशी
के मुख से सुन कर जैसे कर्मानुष्ठान किया जा सकता है उस
तरह आप्त की बात सुनते ही किसी को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं
हो जाता है उसके लिए तो उसे फिर फिर विचार करना पड़ता
है। परोक्ष ज्ञान को रोकने वाली तो अश्रद्धा है, और कुछ नहीं।
तथा अपरोक्ष ज्ञान का प्रतिबन्ध केवल अविचार ही किया करता
है। विचार करने पर भी यदि किसी को ब्रह्मात्मता का परिज्ञान
न हो सके, तो उसे बार बार विचार करते ही जाना चाहिये। उसे
समझ लेना चाहिये कि अभी विचार में कोई कमी रह गयी होगी।
क्योंकि अपरोक्षज्ञान के होते ही विचार अपने आप रुक जायगा।
विचार की समाप्ति ही अपरोक्षज्ञान का अचूक चिह्न माना गया
है। यदि मरण पर्यन्त विचार कर डालने पर भी किसी को आत्म-
लाभ न हो तो उसे उसके प्रतिबन्धों का क्षय हो जाने पर जन्मान्तर
में आत्मलाभ हो ही जायगा। व्यासमुनि ने भी कहा है कि—
इस जन्म या परजन्म में भी विद्या हो जाती है। कठ श्रुति में भी
कहा है कि बहुत से लोगों को तो सुनकर भी इस आत्म तत्व का
ज्ञान (इस जन्म में) नहीं हो पाता। वामदेव को तो गर्भ में
आत्मतत्व का ज्ञान हुआ था। लोक में भी देखते हैं कि—बहुत
बार याद करने पर भी जो बात याद नहीं होती वही बात अगले
दिन बिना याद किये याद आ जाती है। खेती और गर्भ जैसे उसी
दिन तैयार नहीं हो जाते इसी प्रकार आत्मविचार उसी दिन
अन्तिम श्रेणी पर नहीं पहुँच जाता। किन्तु धीरे धीरे पका करता
है। बार बार विचार करने पर भी जब तत्व ज्ञान न हो तो समझ
लेना चाहिये कि भूत, भावी या वर्तमान कोई सा प्रतिबन्ध होगा,
जो कि ज्ञान को होने नहीं देता। इन तीनों में से कोई सा प्रति-
बन्ध हो तो वेदपारंगत लोग भी मुक्त नहीं होते हैं। इसी अभि-
ध्यानदीप का संक्षेप ६९
प्राय से श्रुति ने हिरण्यनिधि का दृष्टान्त दिया है। भूगर्भ विद्या
को न जानने वाले लोग हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते रहने पर भी
उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रतिदिन ब्रह्म के
पास जाती हैं, परन्तु [ विषयवासना रूपी ] अनृत से ढकी रहने
के कारण, उसको पहचान नहीं सकतीं। किसी यति के लिये तो
बीता हुआ महिषी का स्नेह ही ज्ञान में प्रतिबन्ध हो रहा था और
उसे तत्वज्ञान नहीं हो पाया था। उसके महिषी के स्नेह का अनु-
सरण करके ही जब उसे तत्व का उपदेश किया गया तब प्रति-
बन्ध का क्षय हो जाने पर उसे यथार्थ ज्ञान हुआ।
वर्तमान प्रतिबन्ध चार प्रकार का होता है एक विषयासक्ति
दूसरा बुद्धि की मन्दता तीसरा कुतर्क चौथा अपने विपरीत-
ज्ञान पर अड़ कर बैठ जाना कि 'यही ठीक है।' शमदमादि
श्रवणमननादि उपायों से [ जो भी जिस जिस प्रतिबन्ध को हटाने
में उपयुक्त है ] उस उस प्रतिबन्ध के हट जाने पर अपना ब्रह्म-
भाव हाथ आ जाता है। जन्मान्तर दिलाने वाला जो आगामी
प्रतिबन्ध होता है, जिसको प्रारब्धशेष भी कहते हैं, यह तो
भोग के बिना क्षीण नहीं हो पाता। यही कारण है कि उस
आगामी प्रतिबन्ध की निवृत्ति का समय नियत नहीं किया जा
सकता कि—इतने दिनों में आगामिप्रतिबन्ध नष्ट हो जायगा।
वह प्रतिबन्ध वामदेव का तो एक जन्म में ही क्षीण हो गया था।
भरत को तो इसमें तीन जन्म धारण करने पड़े थे। गीता में तो
यहां तक कहा है कि जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं—[ जो तत्व
साक्षात्कार पर्यन्त विचार नहीं कर पाते। जिन का विचार बीच
में ही छूट जाता है ] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में कभी कभी
बहुत जन्म लग जाते हैं। परन्तु ध्यान रहे कि इस रुकावट के
कारण उनका विचार निरर्थक नहीं हो जाता है । ज्यों ही उनका
प्रतिबन्ध हटता है त्यों ही उन्हें आत्मज्ञान हो जाता है । गीता में
यह भी कहा है कि—योगभ्रष्ट लोगों को आत्मविचार के प्रभाव
से पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोक मिलते हैं । फिर
भी यदि कोई अभिलाषा रह गयी हो तो वे पवित्र श्रीमानों के कुल
में जन्म लेते हैं [ और वहां अपनी अभिलाषा को पूरा कर लेते
हैं । ] यदि वे आत्म तत्व के विचार के प्रभाव से निःस्पृह हो गये
हों तो लौटकर योगियों के कुल में ही जन्म लेते हैं । किन्तु ऐसा
जन्म बड़ा ही दुर्लभ होता है। यह थोड़े पुण्यों से किसी को नहीं
मिलता । क्योंकि ऐसा योगभ्रष्ट इस कुल में आते ही उसी पहले
वाले बुद्धिसंयोग को पा जाता है । वैसा 'बुद्धियोग' उसे योगी मां-
बापों से दायभाग के रूप में मिल जाता है । फिर तो वह पहले
से भी दूने उत्साह से प्रयत्न करने लग पड़ता है । उसका पूर्वा-
भ्यास उसे बलात् अपनी ओर खेंच ले जाता है । यों सिद्ध
होने में अनेक जन्म लग जाते हैं । यदि तो किसी को ब्रह्मलोक
को पाने की इच्छा हो और वह उसे वहीं दाबकर—तत्त्वज्ञान से
उसको न उखाड़ कर—आत्मविचार करने लगे तो वह भी साक्षा-
त्कार नहीं कर पाता । वह फिर कल्पान्त के समय इस जगत् के
समष्टि अभिमानी के साथ मुक्त होता है,ऐसा शास्त्र का अभिप्राय है।
कई तो ऐसे होते हैं कि उनके सांसारिक धन्धे उन्हें अपने आपे के
विचार का अवसर ही नहीं आने देते। इस शरीर की दासता और
मन की चाकरी में यदि उनके आठों पहर बीत जायँ तो वे घब-
राते नहीं। परन्तु जिसकी कृपा से यह मट्टी का पुतला चलता
फिरता है, उस अन्दर छिपे हुए प्राणाधीश की मीमांसा के लिये
उन्हें एक क्षण का भी अवकाश नहीं मिलता । इतनी ही क्यों !
ध्यानदीप का संक्षेप ७१
जो लोग इस आत्मतत्व का विचार करते हैं उन्हें वे निकम्मा
और मूढ़ समझते हैं। वे उनके सहवास को भी यथाशक्ति टाला
करते हैं। ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर ही तो कठ में कहा
है कि बहुत से पापियों को तो वह परात्मतत्व सुनने को भी नसीब
नहीं होता।
जिस श्रद्धालु की बुद्धि अतिमन्द हो, जिसे अध्यात्मदर्शी गुरु
हाथ न लगे, या अनुकूल देश कालादि न मिल सके, वह इतना
ही करे कि दिन रात ब्रह्मोपासना (प्रणवाभ्यास) ही करता रहे।
निर्गुण ब्रह्म की उपासना की रीति यह है कि उसके ज्ञान को
बार बार दोहराता रहे। शैव्य प्रश्न के उत्तर में तापनीय उपनिषत्
में निर्गुणोपासना का कथन किया है। प्रश्न उपनिषत् में त्रिमात्र
ओंकार की उपासना का वर्णन आया है। कठ और माण्डूक्य में
भी इसी निर्गुणोपासना का समुल्लेख पाया जाता है। निर्गुण उपा-
सना को कैसे करें ? यह यदि जानना हो तो आद्य शंकराचार्यजी
के पंचीकरण नाम के पुस्तक को देखना चाहिये। एक बात इसमें
ध्यान रखने योग्य है कि सारी शाखाओं में निर्गुण ब्रह्म के जितने
गुण आये हैं, उन सब का उपसंहार इस उपासना में कर लेना
चाहिये। उसमें 'आनन्द' 'सत्' 'चित्' 'पूर्ण' आदि जितने विधेय
गुण हैं या अस्थूल अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ आदि जितने भी निषेध्य
गुण हैं उन सभी का उपसंहार इसमें साधक को कर लेना चाहिये।
ऐसा न हो कि किसी एक प्रकरण में जिन गुणों का वर्णन आया
है केवल उन्हीं गुणों के आधार पर इस उपासना को करने लगें।
उपासना करते हुए यह कभी न भूलें कि आनन्द आदि विधेय
और अस्थूलादि निषेध्य गुणों से एकमात्र अखण्ड आत्मतत्व ही
लक्षित होता है। इन सबसे जो तत्व लक्षित होता है 'वही तत्व
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मैं हूँ' ऐसा ध्यान साधक को यथाशक्ति आठों पहर रहना चाहिये ।
अब बोध और उपासना का भेद भी सुन लीजिये—बोध तो
वस्तु के अधीन होता है। इसके विपरीत उपासना उपासक के
हाथ की बात होती है। बोध की उत्पत्ति विचार से होती है—
साधक न भी चाहे तो भी वस्तु के सामने आने पर बोध होता
ही है। उसे वह रोक नहीं सकता। वह बोध रूपी दिवाकर जब
उदय होता है तब इस सब संसार की सत्यता को भस्मसात्
करके छोड़ता है। जब इतना हो चुकता है तब साधक कृतकृत्य
हो जाता है। उसके बाद उसे नित्य तृप्ति रहने लगती है। अब
वह जीवन्मुक्त हो जाता है। अब तो वह प्रारब्धक्षय की बाट
जोहने लगता है कि 'यह कब समाप्त होगा' ।
ऐसा परमपद यदि किसी को पाना हो तो वह गुरु के उप-
देश पर विश्वास करे। उस पर किसी प्रकार का भी संशय न करे
और अपने उपास्य का निरन्तर ऐसा विचार करे कि—इस
चिन्तन के बीच में, अन्य किसी भी विषय का विचार तक न आने
दे। चिन्ता करते करते अन्त में ऐसी अवस्था आ जायगी कि साधक
को स्वयं ही यह भान होने लगेगा कि ओहो ! यह चिन्त्यस्वरूप
तो मैं ही हूँ। यहां पहुंचते ही साधक का चिन्तन भी छूट जायगा।
फिर यह प्रयत्न करना चाहिये कि किसी तरह मरणपर्यन्त
यही धारणा बराबर बनी रहे। क्योंकि उपासना पुरुष के अधीन
होती है। कोई चाहे उसे करे, चाहे न करे, या जैसे जी में आये
कुछ का कुछ किया करे। इस कारण उपासकों से यह बात
विशेषरूप से कह देना चाहते हैं कि वे इस उपासना को
सदा ही किया करें। सुपने में भी वेदपाठ करने वाले वेदपाठी
का या सुपने में जप करने वाले जपिता, का जो हाल हो जाता