पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 644 of 726
Read in context५६ पंचदशी
नगण्य होजाते हैं—वे फिर सुलझाने योग्य समस्या नहीं रह
जाते। शरीर आदि की रचना यदि केवल अज्ञान से हुई होती
तो हां संसारविषयक भ्रमपूर्ण धारणा के हटते ही शरीर का भी
पात होजाता। परन्तु इनकी रचना तो अज्ञान और कर्म दोनों से
मिलकर हुई है। संसारविषयक अज्ञान के नष्ट हो चुकने पर भी कर्मों
का परिचालित वेग जब तक पूरा पूरा शान्त नहीं हो लेगा, तब
यह ज्ञानिशरीर जीवित रहेगा ही और संसार तथा मोक्ष का
मिश्रित अनुभव लेता ही रहेगा। इसके पश्चात् ज्ञानी की तृप्ति में
एक अभूतपूर्व परिवर्तन की अवस्था आयेगी। अब ज्ञानी को कुछ
भी कर्त्तव्य शेष दीख नहीं पड़ेगा। अब वह दूसरे कर्त्तव्याक्रान्त
लोगों को पहाड़ पर चढ़े हुए पुरुष की तरह उपेक्षाभाव से
देखेगा। अब वह अपने मन से ऐसे प्रश्नों की झड़ी लगा देगा
कि जिन का उसके मन पर जीवन्मुक्त होजाने के सिवाय कुछ भी
सन्तोष जनक उत्तर नहीं होगा। मन के इस निरुत्तरपने का
परिणाम यह होगा उसे अपना संसरण का विभाग, अपने लाभा-
लाभ के विचार से तो एकदम बन्द कर देना ही होगा। हां,
जिस शास्त्रीय मार्ग पर चलकर उसने मुक्ति का महालाभ उठाया
है, वह मार्ग दूसरों के लिये भी अक्षुण्ण बना रहे इस लोक
संग्रह के विचार से अपने जीवनरथ को शास्त्रीयपद्धति पर ही
दौड़ाता चला जायगा। परन्तु एक बात भले प्रकार समझ रखने
की है कि ज्ञानी की शास्त्रीयमार्ग पर कर्म करने की अपनी कुछ
भी आवश्यकता नहीं है। उसके ज्ञान की स्थिरता में कर्म का
उपयोग लेशमात्र भी नहीं है। उस के ज्ञान की जो
निरन्तर धार बहेगी वह कर्म करने से नहीं बहेगी।
वह तो एकमात्र ज्ञान के अबाधित होने से ही बहती रह सकेगी।