पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextध्यानदीप का संक्षेप ६९
प्राय से श्रुति ने हिरण्यनिधि का दृष्टान्त दिया है। भूगर्भ विद्या
को न जानने वाले लोग हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते रहने पर भी
उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रतिदिन ब्रह्म के
पास जाती हैं, परन्तु [ विषयवासना रूपी ] अनृत से ढकी रहने
के कारण, उसको पहचान नहीं सकतीं। किसी यति के लिये तो
बीता हुआ महिषी का स्नेह ही ज्ञान में प्रतिबन्ध हो रहा था और
उसे तत्वज्ञान नहीं हो पाया था। उसके महिषी के स्नेह का अनु-
सरण करके ही जब उसे तत्व का उपदेश किया गया तब प्रति-
बन्ध का क्षय हो जाने पर उसे यथार्थ ज्ञान हुआ।
वर्तमान प्रतिबन्ध चार प्रकार का होता है एक विषयासक्ति
दूसरा बुद्धि की मन्दता तीसरा कुतर्क चौथा अपने विपरीत-
ज्ञान पर अड़ कर बैठ जाना कि 'यही ठीक है।' शमदमादि
श्रवणमननादि उपायों से [ जो भी जिस जिस प्रतिबन्ध को हटाने
में उपयुक्त है ] उस उस प्रतिबन्ध के हट जाने पर अपना ब्रह्म-
भाव हाथ आ जाता है। जन्मान्तर दिलाने वाला जो आगामी
प्रतिबन्ध होता है, जिसको प्रारब्धशेष भी कहते हैं, यह तो
भोग के बिना क्षीण नहीं हो पाता। यही कारण है कि उस
आगामी प्रतिबन्ध की निवृत्ति का समय नियत नहीं किया जा
सकता कि—इतने दिनों में आगामिप्रतिबन्ध नष्ट हो जायगा।
वह प्रतिबन्ध वामदेव का तो एक जन्म में ही क्षीण हो गया था।
भरत को तो इसमें तीन जन्म धारण करने पड़े थे। गीता में तो
यहां तक कहा है कि जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं—[ जो तत्व
साक्षात्कार पर्यन्त विचार नहीं कर पाते। जिन का विचार बीच
में ही छूट जाता है ] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में कभी कभी
बहुत जन्म लग जाते हैं। परन्तु ध्यान रहे कि इस रुकावट के