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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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ध्यानदीप का संक्षेप
यदि किसी प्रतिबन्ध के कारण किसी को ब्रह्मज्ञान न हों
सकता हो और वह इस मार्ग पर श्रद्धा रखता हो तो वह ब्रह्म-
तत्व की उपासना ही किया करे । उससे भी उसे मुक्ति मिल ही
जायगी । एक पुरुष मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने
दौड़ता है, दूसरा पुरुष दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे
उठाने चलता है, इन दोनों को ही यद्यपि मिथ्या ज्ञान तो समान
ही हो रहा है, तौ भी प्रयोजनसिद्धि में विशेषता पायी ही जाती
है—पहले को तो मणि मिल जाती है, दूसरा उससे वंचित ही रह
जाता है। दीपक की प्रभा को मणि समझना 'विसंवादि भ्रम'
(विफलभ्रम) कहाता है, मणि की प्रभा को मणि समझना 'संवादि
भ्रम' (सफलभ्रम) माना जाता है। भाप को धुँआ समझा और
उससे अग्नि का अनुमान किया और वहाँ जाकर अग्नि को पा भी
लिया, यह भी संवादिभ्रम ही है। प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्र में
ऐसे अनन्त संवादिभ्रम पाये जा सकते हैं। इसी भ्रम के कारण
से मिट्टी लकड़ी और पत्थर तक देवता हो जाते हैं। किसी वस्तु
को उलटा समझ कर भी जब अभिलषित फल अचानक मिल
जाय तभी वह 'संवादिभ्रम' कहा जाता है। जैसे संवादिभ्रम भ्रम
होने पर भी ठीक फल दे देता है इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपा-
सना भ्रम होने पर भी मुक्ति रूपी फल को दे ही देती है।