पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextकूटस्थदीप का संक्षेप ६३
करता है। वह साक्षी कूटस्थ तत्व इस असत्य जगत् का आलम्बन
है, इससे इसे 'सत्य' कहते हैं। सम्पूर्ण जड पदार्थों का प्रका-
शक होने से इस तत्व को 'चिद्रूप' मानते हैं। सदा ही प्रेम
का स्थान होने से इस साक्षीतत्व को 'आनन्दरूप' समझते हैं।
यह कूटस्थ तत्व सभी अर्थों का साधक है, और सभी से सम्बद्ध
है, इससे उसे 'सम्पूर्ण' भी कह देते हैं। यह कूटस्थ तत्व 'जीव'
और 'ईश्वर' आदि की कल्पना से बहुत ऊपर रहता है। यह तो
एक स्वयंप्रकाश केवल तथा कल्याणस्वरूप तत्व है।
यद्यपि माया ने आभास के द्वारा 'जीव' और 'ईश्वर' की रचना
कर डाली है, फिर भी ये दोनों काच के घड़े के समान स्वच्छ ही हैं।
काच का घड़ा जैसे मिट्टी के घड़ों से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार
ये जीवेश्वर भी देहादि की अपेक्षा स्वच्छ होते हैं। देह और मन
दोनों ही अन्न से बनते हैं, फिर भी मन, देह से स्वच्छ होता है।
इसी प्रकार मायिक होने पर भी अन्य मायिक पदार्थों से ये दोनों
स्वच्छ होते हैं। ये दोनों ही चिद्रूप हैं, यह तो इसी से सिद्ध
हो जाता है कि—वे सब के अनुभव में चिद्रूप में ही आते हैं।
उस माया शक्ति ने ही उन दोनों को चिद्रूप से प्रकाशित कर
डाला है। हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—जिसे 'हमारी
माया' कह सकते हैं—सुपने के चेतन जीव और सुपने के ईश्वर
आदि को उत्पन्न कर ही डालती है। फिर महामाया चेतन
जीवेश्वरों को उत्पन्न कर डाले इसमें आश्चर्यचकित क्यों होते
हो ? परन्तु मायिकपने के वहम में इतने अधिक भी न फँस
जाओ कि कहीं कूटस्थ को भी मायिक ही कह बैठो। क्योंकि
कूटस्थ के मायिक होने का तो कोई भी प्रमाण नहीं मिलता।
सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर 'होकर इसी कूटस्थ के वस्तुत्व का डंका