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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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कूटस्थदीप का संक्षेप
किसी भित्ति पर सूरज का प्रकाश पड़ रहा हो। उसी भित्ति
पर यदि दर्पण के सूरज का दुहरा प्रकाश पड़ जाय और वह
भित्ति दो प्रकाशों से जगमगा उठे, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य
ने इस देह को भी साधारणतया [अन्य सृष्टि की तरह] प्रकाशित
तो कर ही रक्खा है परन्तु इस देह को ही इस बुद्धिस्थ चिदा-
भास ने दोबारा विशेष रूप से प्रकाशित कर डाला है। यों, देहों
को प्रकाशित करने वाली दो चेतना हैं। इसे समझने के लिए
कल्पना करो कि एक भित्ति पर बहुत से दर्पणों की दीप्तियाँ पड़
रही हैं, उन बहुत सी दीप्तियों के बीच बीच में जहाँ दर्पण की
दीप्ति नहीं पड़ रही हैं वहाँ सूर्य की सामान्य दीप्ति तो दीखती
ही है। इतना ही नहीं जब एक भी दर्पणदीप्ति शेष नहीं रह
जाती तब भी वह सामान्य सूर्यदीप्ति दीखा ही करती है। इसी
प्रकार चिदाभास से युक्त जो बहुत सी बुद्धियाँ हैं उनके बीच
बीच में [जहाँ एक बुद्धि नष्ट होती है और दूसरी उत्पन्न होने
की तैयारी में लगी रहती है तब बीच में] यह कूटस्थ तत्व रहता
है। विवेकी लोग इसी कूटस्थ को पहचानें। सुषुप्ति के समय जब
कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रह जाती, तब इन बुद्धियों के अभाव
को जो कोई तत्व प्रकाशित किया करता है वह यह कूटस्थ
चैतन्य ही तो है।