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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 648

६० पंचदशी


घट को प्रकाशित करने वाला तो अकेला चिदाभास ही है । जब
घट में ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है तब उसमें दुहरा चैतन्य
हो जाता है । जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कथन
चिदाभास की कृपा का फल है । जब हम कहते हैं कि 'घट को
जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता है ।
यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास का और ब्रह्मतत्व का भेद
जान लेना चाहिए । देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म का विवेक
यहाँ तक हमने किया है । आइये अब यह भी देख लें कि—देह
के अन्दर के मामलों में ये दोनों कैसे रहते हैं ? तपा हुआ लोहा
जैसे केवल अपने आपको ही प्रकाशित किया करता है, इसी
प्रकार चिदाभास से युक्त जो अहंवृत्ति और कामक्रोधादि वृत्तियाँ
हैं—जिनमें तपे हुए लोहे में अग्नि के समान ही चिदाभास व्याप्त
हुआ रहता है—वे वृत्तियाँ केवल अपनी ही भासक होती हैं ।
इतना सामर्थ्य उनमें नहीं होता कि वे दूसरे की भासक हो सकें।
इन वृत्तियों का यह स्वभाव है कि ये क्रम क्रम से रुक रुक कर
पैदा होती हैं, और सुप्ति मूर्छा या समाधि के समय तो सब की
सब विलीन हो जाती है—तब इनमें से एक भी शेष नहीं रह
जाती । अब यदि अन्दर के कूटस्थ तत्व को समझना हो तो यों
समझना चाहिए कि—जो निर्विकार रहने वाली वस्तु, इन सब
वृत्तियों की सन्धियों को, और इन सब वृत्तियों के अभावों को,
प्रकाशित किया करती है अथवा जाना करती है, वही निर्विकार
वस्तु 'कूटस्थ' कहलाती है । जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य हो
जाता है, इसी प्रकार अन्दर की वृत्तियों में भी दुगना चैतन्य
इकट्ठा हो जाता है । यही कारण है कि—सन्धियों की अपेक्षा
वृत्तियों में चैतन्य की अधिक विशदता पायी जाती है । वृत्तियों