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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

About this granth

Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.

The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.

This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४३
को ही अपनी आंख बना लिया है [ अनुमान से जो बात सिद्ध
हो जाती है उसे ही ये मानते हैं ]
शून्यमासीदिति ब्रूषे सद्योगं वा सदात्मताम् ।
शून्यस्य न तु तद्युक्तमुभयं व्याहतत्वतः ॥३२॥
हे असद्वादी ! अच्छा तू यह बता कि जब तू 'शून्य था' यह
कहता है तब क्या तू शून्य के साथ सत्ता [ होने ] का योग
मानता है ? या शून्य को सदात्मा ही मान लेता है ? परन्तु
व्याघात होने से शून्य में तो ये दोनों ही बातें युक्त नहीं हैं [ न तो
शून्य के साथ सत्ता का सम्बन्ध ही हो सकता है और न शून्य
कभी सद्रूप ही हो सकता है ]
न युक्तस्तमसा सूर्यो नापि चासौ तमोमयः ।
सच्छून्ययो विरोधिस्वा च्छून्यमासीत् कथं वद ॥३३॥
जैसे अन्धकार से न तो सूर्य युक्त ही हो सकता है और न
वह सूर्य कभी तमोमय ही हो सकता है। इसी प्रकार सत् और
शून्य का विरोध होने से शून्यवादी यह बताये कि 'शून्य-था'
यह असंगत बात संगत कैसे होगी ?
वियदादे र्नामरूपे मायया सुविकल्पिते ।
शून्यस्य नामरूपे च तथा चेज्जीव्यतां चिरम् ॥३४॥
[ यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ] आकाशादि के नाम-
रूप जैसे माया से [ निर्विकल्प ब्रह्म में ] कल्पित कर लिये गये
हैं, इसी प्रकार शून्य के भी नाम और रूप [सद्वस्तु में ही] कल्पित
कर लिये गये हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसा कहने वाला बौद्ध जुग
जुग जिये । क्योंकि वह तो अपने भ्रामक सिद्धान्त से गिर गया
है और उसे तत्त्व का परिज्ञान हो गया है ।]

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वेदान्त मत में जब आकाश आदि सभी जगत् मिथ्या है फिर
'आकाश है' इत्यादि रूप में उसमें सत्ता कहां से आयी ? इस प्रश्न का
उत्तर यह है कि अधिष्ठान का धर्म अध्यस्त पदार्थों में प्रतीत हुआ
करता है, रस्सी की सत्ता सांप में प्रतीत हो जाती है, यदि उसी तरह
की शून्य की भी सत्ता मानते हो तो हमें कुछ कहना नहीं है ।
सतोऽपि नामरूपे द्वे कल्पिते चेत्तदा वद ।
कुत्रेति निरधिष्ठानो न भ्रमः क्वचिदीक्ष्यते ॥३५॥
यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ऐसे तो सत् के भी नाम
और रूप दोनों ही कल्पित हैं, तो वह बताये कि सत् के नाम
रूप किस में कल्पित हैं ? क्योंकि बिना अधिष्ठान का भ्रम
तो कहीं भी नहीं देखा जाता ।
सदासीदिति शब्दार्थभेदे द्वैगुण्यमापतेत् ।
अभेदे पुनरुक्तिः स्यान्मैवं लोके तथेक्षणात् ॥३६॥
'असदेवेदमग्र आसीत्' इस में जैसे शून्यावादी के पक्ष में
व्याघात दोष बताया गया है इसी प्रकार 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्'
इस वाक्य में भी तो यह एक बड़ा दोष है। क्योंकि जब कहा
जाता है कि 'सत् आसीत्=सत् था' तब हम पूछते हैं कि 'सत्
आसीत्' इन दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न भिन्न है या नहीं ? यदि
कहो कि अर्थ भिन्न है तब तो विगुणता आजाती है [अथवा यों
कहो कि अद्वैतवाद फिर कहाँ ठहरता है !] यदि अर्थ को अभिन्न
[एक] ही माना जाय तो पुनरुक्ति दोष आता है । पूर्वपक्षी का
यह सब कथन ठीक नहीं है । क्योंकि ऐसे वाक्यों में कभी भी
पुनरुक्ति दोष नहीं माना जाता । लोक में ऐसे [समानार्थक] शब्दों
का प्रयोग बार बार देखा ही जाता है ।

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४५

कर्तव्यं कुरुते, वाक्यं ब्रूते, धार्यस्य धारणम् ।
इत्यादिवासनाविष्टं प्रत्यासीत् सदितीरणम् ॥३७॥
देखो, 'कर्तव्य को करता है' 'वाक्य को बोलता है,' 'धार्य
को धारण करता है' इत्यादि समानार्थक दो दो शब्दों का
प्रयोग करने की वासना जिन [अधिकारियों] के मन में बैठी
हुई है उनसे [उनके ही मुहावरे में] श्रुति ने यह कह दिया है कि
उस समय सत् ही था ।
कालाभावे पुरेत्युक्तिः कालवासनया युतम् ।
शिष्यं प्रत्येव, तेनात्र द्वितीयं नहि शंक्यते ॥३८॥
[आसीत् का मतलब है भूतकाल में विद्यमान होना] जब
कि काल नाम का कोई सत्य पदार्थ नहीं है, फिर 'अग्रेआसीत्=
पहले था' यह कथन काल की वासना से युक्त शिष्य के लिये
किया गया है [द्वैत वासनाओं से दबे हुए श्रोताओं को समझाना
ही तो श्रुति का अभिप्राय है। वे श्रोता जैसी टूटी फूटी अधूरी
भाषा में बोलने के आदी हैं, उसी भाषा में श्रुति ने उनके हित
की बात उनसे कह दी है।] इस मुहावरे के कारण द्वितीय के
होने की शंका नहीं की जा सकती ।
चोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया ।
अद्वैतभाषया चोद्यं नास्ति नापि तदुत्तरम् ॥३९॥
आक्षेप या परिहार द्वैत की बोली में ही तो किया जा
सकता है। [व्यवहार दशा के रहते रहते ही 'चोद्य' या 'परिहार'
आदि करना चाहिये] । अद्वैत [की नीरव भाषा] में तो
न कुछ आक्षेप ही बनता है और न उसका कुछ उत्तर ही
होता है ।

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४६ पञ्चदशी
तदा स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥४०॥
तब स्तिमित और गम्भीर तेज और तम से भिन्न, व्यापक
अकथनीय और अप्रकट सत् नाम का कुछ पदार्थ शेष रह
जाता है।
स्मृति में भी कहा है कि तब स्तिमित [निश्चल] तथा गम्भीर
[अज्ञेय] जिसको मन से भी नहीं जान सकते, जिसको न तेज
ही कह सकते हैं और न तम ही कहते बनता है, किन्तु जो इन
दोनों ही से विलक्षण सर्वत्र व्यापक तत्त्व है; वह अनाख्य
और अनभिव्यक्त तत्त्व है। उसका न तो शब्दों से कथन हो
सकता है और न वह चक्षु आदि इन्द्रियों से व्यक्त ही
होता है। वह सत् अर्थात् शून्य से विलक्षण है। इसी से कहते
हैं कि ऐसा ही कुछ तत्त्व—जिसके विषय में कुछ भी शब्द
कहा नहीं जा सकता—शेष रह जाता है। तात्पर्य यह है कि
सम्पूर्ण द्वैत का निषेध करते करते, निषेध की अवधि के रूप
में जो तत्त्व शेष रह जाता है—जिसका निषेध हो ही नहीं
सकता—जिसका निषेध करने का साहस करते ही निषेध
भी नहीं रहता—उस समय शेष रहे, हुए ऐसे तत्त्व को
जान लो।
ननु भूम्यादिकं माभूत् परमाण्वन्तनाशतः ।
कथं ते वियतोऽसत्त्वं बुद्धिमारोहतीति चेत् ॥४१॥
अब पूर्वपक्षी यह प्रश्न करता है कि—परमाणुपर्यन्त पदार्थों
का नाश हो जाने से भूमि, जल, अग्नि और वायु न रहें, यह
तो हम मान सकते हैं। किन्तु नित्य आकाश का असत्त्व (न

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४७
रहना) तुम्हारी समझ में कैसे आ जाता है ? यह तो हमारी
समझ में नहीं आता ।
अत्यन्तं निर्जगद्व्योम यथा ते बुद्धिमाश्रितम् ।
तथैव सन्निराकाशं कुतो नाश्रयते मतिम् ॥४२॥
सिद्धान्ती दृष्टान्त देकर उत्तर देता है कि-जैसे तेरी बुद्धि
को यह समझ पड़ता है कि कभी यह आकाश सम्पूर्ण जगत्
से रहित हो सकता है [जगत् न रह कर आकाश ही आकाश
रह जाता है] इसी प्रकार तू ज़रा और ऊपर क्यों नहीं चढ़ जाता ?
यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आ जाती कि इस सद्वस्तु
में तो आकाश तत्व भी नहीं है ? निराकाश सत् पदार्थ को तू
क्यों नहीं समझ लेता है। [जैसे बिना जगत् का आकाश हो
सकता है, इसी प्रकार बिना आकाश की सद्वस्तु भी हो सकती है।]
निर्जगद्व्योम दृष्टं चेत् प्रकाशतमसी विना ।
क्व दृष्टं किंच ते पक्षे न प्रत्यक्षं वियत् खलु ॥४३॥
यदि तू कहे कि मैंने बिना जगत् का आकाश देखा है इसी
से मैं आकाश को निर्जगत् मान लेता हूं, तो हम पूछते हैं कि
प्रकाश या अन्धकार के बिना तुम ने अकेले आकाश को कहां
देखा है ? इनके बिना तो आकाश कभी रहता ही नहीं। एक
और भी बात है कि तुम्हारे मत में तो आकाश का प्रत्यक्ष दर्शन
होता ही नहीं है । ऐसा कहते हुए तुम तो अपसिद्धान्ती हो
जाते हो।
सद्वस्तु शुद्धं त्वस्माभि र्निश्चितैरनुभूयते ।
तूष्णीं स्थितौ, न शून्यत्वं शून्यबुद्धेश्च वर्जनात् ॥४४॥

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का भी तो दर्शन आकाश के समान ही नहीं होता है क्योंकि] हम
राजयोगी लोग चुपचाप बैठकर जब निश्चिन्त हो गये होते हैं
तब उस शुद्ध सद्वस्तु का अनुभव किया ही करते हैं। मौन हो
जाने के समय, और किसी की प्रतीति न होने से शून्य ही रह
गया है, ऐसा मानना ठीक नहीं। क्योंकि शून्य को भी तो शून्य
की प्रतीति नहीं हो सकती ? इस कारण वह प्रतीत होने वाला
जो पदार्थ है वह शून्य नहीं हो सकता। वह तो सद्वस्तु ही है।
'निश्चिन्तैः' के स्थान पर “निश्चिन्तैः” पाठ प्रतीत होता है।
इस में ध्यान देने की बात यह है कि सम्पूर्ण दृश्यों को
छोड़ चुकने के बाद गम्भीर विचार करें तो शून्यावस्था की प्रतीति
होने लगती है और इस शून्य अवस्था से प्रायः साधक लोग
घबरा जाते हैं। इस में उन का जी नहीं लगता। परन्तु ऐसे समय
अत्यन्त सावधान हो कर इस शून्य अवस्था का ज्ञान कराने वाले
ज्ञानरूप साक्षी आत्मा तक पहुँचना चाहिये। इस शून्य में ही
नहीं रुक जाना चाहिये। इस शून्य तथा इस शून्य को पहचानने
वाले साक्षी में राजहँस की तरह विवेक कर लेना चाहिये। इस
साक्षी को यदि आप भुला डालेंगे तो अवश्य ही शून्य ही शून्य
दिखाई देगा। जो आत्मा नहीं है वह शून्य तो है ही। परन्तु आप
ध्यान रक्खें कि शून्य को तो शून्य का ज्ञान हो ही नहीं सकता।
इस शून्य का ज्ञान जिस को हो रहा है, वही तो हम राज-
योगियों की प्यारी सद्वस्तु है।
सद्बुद्धिरपि चेन्नास्ति मास्त्वस्य खप्रभत्वतः ।
निर्मनस्कत्वसाक्षित्वात् सन्मात्रं सुगमं नृणाम् ॥४५॥
यदि कहो कि समाधि अवस्था में तो सद्बुद्धि भी नहीं रह

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४९
जाती है [उस समय तो यह भी खयाल नहीं रहता है कि सत्
नाम की भी कोई वस्तु इस संसार में है] तो इसका समाधान
यह है कि यदि उस समय सद्बुद्धि नहीं रहती है तो भले ही न
रहे। यह सत् तत्व तो एक स्वयंप्रकाश पदार्थ है। उस के विषय
की बुद्धि न रहने पर भी उस का ज्ञान होने की रीति यह है कि]
वह सद्वस्तु तो उस समय [समाधि अवस्था] की निर्मनस्कस्थिति
का साक्षी है। इस कारण सन्मात्र वस्तु का परिज्ञान होना मनुष्यों
को बड़ा ही, सुगम है। निर्मनस्क अवस्था को जो जानता रहता
है वही सद्वस्तु है।
मनोजृम्भणराहित्ये यथा साक्षी निराकुलः ।
मायाजृम्भणतः पूर्वं सत्तथैव निराकुलम् ॥४६॥
मनोव्यापार जब नहीं होते, तब जैसे साक्षी [आत्मा]
निराकुल होता है, इसी प्रकार [सृष्टि की उत्पत्ति से पहले] जब
माया का जृम्भण ही नहीं हो पाया था—यह सद्वस्तु भी निरा-
कुल ही थी यह बात जानी जा सकती है।
निस्तत्त्वा कार्यगम्यास्य शक्तिर्मायाग्निशक्तिवत् ।
न हि शक्तिः क्वचित् कैश्चिद् बुध्यते कार्यतः पुरा ॥४७॥
पृथक् तत्व रहित तथा कार्यों को देखकर ही पहचानने योग्य
जो इस सद्वस्तु की शक्ति किंवा सामर्थ्य है उस को ही 'माया'
कहते हैं। वह माया ऐसी है जैसी अग्नि की शक्ति। क्योंकि कहीं
भी कोई शक्ति को कार्य की उत्पत्ति से प्रथम नहीं जान सकता।
[अब माया का लक्षण बताया जाता है कि जगत् के कारण
सद्वस्तु से पृथक् जो कोई भी तत्व नहीं होती है तथा आकाशादि
कार्यों को देखकर ही जिस का अनुमान कर सकते हैं, आकाशादि

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५० पञ्चदशी
कार्यों को उत्पन्न करने वाली सद्वस्तु की ऐसी शक्ति किंवा ऐसे
सामर्थ्य को ही तो 'माया' कहते हैं। अग्नि की शक्ति जैसे अग्नि
से पृथक् कोई तत्व नहीं होती है, अग्नि की शक्ति को जैसे उस
के दाहादि कार्यों को देखकर ही जान सकते हैं ऐसी ही यह माया
भी है । कार्यों के उत्पन्न हो जाने से पहले कोई भी कभी शक्ति
को पहचान नहीं सकता है । ]
न सद्वस्तु सतः शक्ति र्न हि वन्हेः स्वशक्तिता ।
सद्विलक्षणतायां तु शक्तेः किं तत्त्व मुच्यताम् ॥४८॥
वह सत् की शक्ति, सद्वस्तु ही हो, यह नहीं हो सकता देखते
हैं कि वह्नि स्वयं अपनी शक्ति नहीं होती। उसको सत् से विल-
क्षण किसी तरह की मानने पर तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ?
[ वह शक्ति यद्यपि कार्यरूपी लिंग से जानी जाती है, परन्तु
वह असल में निस्तत्त्वरूप ही है । यह बात इन दो श्लोकों में सिद्ध
की गई है । वह शक्ति भी कोई दूसरी सद्वस्तु ही हो, तब तो सत् से
भिन्न हो जाने के कारण, उस की शक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि
देखते हैं कि अग्नि ही अग्नि की शक्ति नहीं होती है । यदि उसको
सत् से विलक्षण तत्त्व मानोगे तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ? ]
शून्यत्वमिति चेच्छून्यं मायाकार्यमितीरितम् ।
न शून्यं नापि सद्यादृक् तादृक् तत्वमिहेष्यताम् ॥४९॥
यदि उस शक्ति का रूप शून्य को बताया जाय तो शून्य तो
माया का कार्य ही है । यह बात इसी प्रकरण के चौंतीसवें श्लोक
में कही गयी है । इस कारण यही कहना पड़ता है कि वह माया

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५१
न तो शून्य ही है और न सत् ही है। ऐसा कोई सदसद्विलक्षण
तत्व अगर तुम समझ सकते हो तो वैसा तत्व ही माया को समझ
लो। उस माया का निर्वचन सत् और असत् इन दो शब्दों से
नहीं हो सकता है।
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं किंत्वभूत्तमः।
सद्योगात्तमसः सत्वं न स्वत स्तन्निषेधनात् ॥५०॥
'तम आसीत्तमसा गूढमग्रे' इस श्रुति ने भी इस बात का अनु-
मोदन किया है। वह कहती है कि 'उस समय न तो सत् ही
था' और 'न असत् ही था'। किन्तु बस तम ही तम था। इस
सत् का योग हो जाने से ही तो उस तम में सत्ता आ गयी थी।
उस तम में स्वतः सत्ता नहीं थी। उसके सत् होने का तो इस
श्रुति ने अपने मुख से ही स्पष्ट निषेध कर डाला है।
अत एव द्वितीयत्वं शून्यवन्नहि गण्यते।
न लोके चैत्रतच्छक्त्यो र्जीवितं लिख्यते पृथक् ॥५१॥
इस सब का फलित यही हुआ कि क्योंकि माया की स्वतः
सत्ता [स्वतन्त्र सत्ता] मानी ही नहीं जाती है, इसलिये जैसे शून्य
को दूसरा पदार्थ नहीं माना जाता इसी प्रकार माया को भी
कोई दूसरा पदार्थ नहीं गिना जाता है। लोक में भी देखते हैं
कि चैत्र तथा उसकी शक्ति का पृथक् पृथक् उल्लेख कहीं नहीं
किया जाता। [चैत्र और चैत्र की शक्ति को कोई भी दो पदार्थ
नहीं गिनता है।]
शक्त्याधिक्ये जीवितं चेद् वर्धते तत्र वृद्धिकृत्।
न शक्तिः, किन्तु तत्कार्यं युद्धकृष्यादिकं तथा ॥५२॥
शक्ति की अधिकता होती है तो जीवन की वृद्धि पायी जाती

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५२ पंचदशी
है। इस दृष्टान्त से शक्ति का जीवित [सत्ता] पृथक् मान लेना
ठीक नहीं है। क्योंकि शक्ति से किसी के जीवित की वृद्धि नहीं
होती है। किन्तु शक्ति के कार्य जो कुश्ती तथा खेती आदि हैं
उन से जीवन की वृद्धि हो जाती है। [इसी प्रकार प्रकृत में भी
समझ लेना चाहिये कि उस ब्रह्म में उसकी शक्ति के कारण
से द्वितीयपन (द्वैतभाव) नहीं आ जाता है।]
सर्वथा शक्तिमात्रस्य न पृथग्गणना क्वचित् ।
शक्तिकार्यं तु नैवास्ति द्वितीयं शङ्क्येत कथम् ॥५३॥
केवल शक्ति की तो पृथक् गणना [गिनती] कहीं होती ही नहीं।
यदि यह कहो कि शक्ति के कार्यों से ही उस ब्रह्म में सद्वितीयता
[द्वैतभाव] आ जायगी तो उसका उत्तर यह है कि उस समय
[सृष्टि की उत्पत्ति से प्रथम] तो शक्ति का कार्य भी कुछ नहीं था।
'फिर [उस समय] द्वितीय [दूसरे] के होने की शंका क्यों करते हो ?
प्रलय काल में ब्रह्म और उसकी शक्ति दोनों होते तो हैं,
परन्तु किसी की भी शक्ति की गिनती उससे पृथक् नहीं की
जाती है। सृष्टि बनने के बाद शक्ति के नाना कार्य हो तो जाते
हैं, परन्तु सृष्टि बनने के पीछे के कार्यों से, सृष्टि बनने से
प्रथम काल में, द्वितीयपन कैसे आ सकेगा ?
न कृत्स्नब्रह्मवृत्तिः सा शक्तिः किन्त्वेकदेशभाक् ।
घटशक्तिर्यथा भूमौ स्निग्धमृद्येव वर्तते ॥५४॥
ब्रह्म की वह शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्म में नहीं रहती है। किन्तु
उस ब्रह्म के एक देश में ही रहती है। जिस प्रकार घड़ा मिट्टी
से बनता है, परन्तु घट को उत्पन्न करने की शक्ति केवल चिकनी
मिट्टी में ही रहती है।

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५३
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्ति स्वयंप्रभः ।
इत्येकदेशवृत्तित्वं मायाया वदति श्रुतिः ॥५५॥
'पादोस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' [यजुर्वेद ३१] ये सम्पूर्ण
भूत इसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इसका तीन चौथाई भाग
तो अभी भी अमर और स्वयं प्रकाश ही है। यह श्रुति कह रही
है कि ब्रह्म की माया ब्रह्म के किसी एक देश में रहती है, सम्पूर्ण
में नहीं रहती।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।
इति कृष्णोऽर्जुनायाह जगतस्त्वेकदेशताम् ॥५६॥
'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्' [गीता १०-४२] मैं
इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण किये हुए हूँ
यों कृष्ण भगवान ने भी अर्जुन के प्रति जगत् की एकदेशता .
का ही वर्णन किया है।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ।
विकारावर्ति चान्त्रास्ति श्रुतिसूत्रकृतोर्वचः ॥५७॥
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा' [श्वे० ३-१४] यह मन्त्र तथा विकारावर्ति
यह वेदान्तसूत्र ब्रह्म के निर्माय स्वरूपको बता रहे हैं।
ब्रह्म का निर्माय स्वरूप भी है, इसमें प्रमाण की दर्कार हो तो
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्' उसने समस्त लोक
लोकान्तरों को चारों तरफ से लपेट लिया है, फिर भी वह उसके बाहर
दशाङ्गुल रह ही गया है' इस श्रुति ने तथा 'विकारावर्ति च तथा हि
स्थितिमाह' (ब्रह्मसूत्र ४-४-१९) विकारों में न रहनेवाला नित्य
मुक्त भी परमेश्वररूप है। केवल विकारों में रहनेवाला ही
परमेश्वररूप नहीं है। क्योंकि वेद ने स्वयं अपने श्रीमुख से

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५४ पञ्चदशी
इस परमेश्वर की दो रूप की स्थिति का वर्णन किया है कि,
'तावानस्यमहिमाऽतो ज्यायांस्पूच पूरुप:पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं
दिवि' यह सब उस ब्रह्म की विभूति का विस्तार ही है। वह स्वयं
तो इस नामरूपधारी जगत् से बहुत ही बड़ा है। उस ब्रह्म
पुरुष में किसी प्रकार का विकार नहीं है। तेज, जल, पृथिवी
आदि सब के सब उसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इस अमृत
पुरुप का तीन चौथाई भाग तो अभी भी अपने प्रकाशशील
स्वतःप्रभ आत्मरूप में स्थित है।
निरंशेप्यंशमारोप्य कृत्स्नेऽशे वेति पृच्छतः ।
तद्भाषयोत्तरं ब्रूते श्रुतिः श्रोतृ हितैषिणी ॥५८॥
है तो वह असल में निरंश ही। परन्तु पहले उसमें अंश का
आरोप कर लिया गया है और फिर यह पूछा गया है कि शक्ति
कृत्स्न [सम्पूर्ण] में रहती है या अंश में रहती है ? श्रोताओं
का हित चाहने वाली श्रुति ने, उनकी ही भाषा में उसका उत्तर
दे डाला है [इस कारण श्रुति की भाषा में और ब्रह्म के निरंशपने
में कोई भी विरोध नहीं है ]।
सत्तत्वमाश्रिता शक्तिः कल्पयेत् सति विक्रियाः ।
वर्णा भित्तिगता भित्तौ चित्रं नानाविधं यथा ॥५९॥
उस सत् तत्व में रहने वाली वह शक्ति, उस सत् में ही
विक्रिया अर्थात् कार्यविशेषों को उत्पन्न किया करती है। जैसे
कि भीत पर पोते हुए लाल पीले आदि नानाविध रंग नाना-
विध चित्र को भित्ति पर ही उत्पन्न किया करते हैं । '
आद्यो विकार आकाशः सोवकाशस्वरूपवान् ।
आकाशोऽस्तीति सत्तत्वमाकाशेऽप्यनुगच्छति ॥६०॥

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५५
उस शक्ति का सब से पहला विकार ['कार्य] तो आकाश
ही होता है। वह अवकाश स्वरूप है। [यह आकाश उस सत्
ब्रह्म का कार्य है। इस बात को तो हम इस हेतु से जानते हैं
कि] यह सत् तत्व आकाश में भी अनुगत हो रहा है। तभी
तो कहा जाता है कि 'आकाशोऽस्ति' अर्थात् आकाश है [यदि
आकाश सत् से बना न होता तो 'आकाशोऽस्ति' में आकाश के
साथ सत्ता का योग कैसे हो जाता ]
एकस्वभावं सत्तत्वमाकाशो द्विस्वभावकः ।
नावकाशः सति व्योम्नि स चैषोऽपि द्वयं स्थितम् ॥६१॥
सत् तत्व तो एक स्वभाव वाला है। आकाश दो स्वभाव
वाला हो गया है। [इसी को विस्तार से यों समझो कि] सद्वस्तु
में अवकाश [छेद] कहीं भी नहीं है [वह सर्वत्र ठसाठस भरी
हुई है]। उसका तो सत् ही एक स्वभाव है। परन्तु आकाश
में तो यह सत्स्वभाव तथा यह अवकाश स्वभाव दोनों ही
रहते हैं।
यद्वा प्रतिध्वनिर्व्योम्नो गुणो नासौ सतीक्ष्यते ।
व्योम्नि द्वौ सद्ध्वनी तेन सदेकं, द्विगुणं वियत् ॥६२॥
अथवा इसी विषय को यों समझना चाहिये कि—प्रतिध्वनि
आकाश का गुण है। यह प्रतिध्वनि [शब्द] सद्वस्तु में नहीं
पायी जाती। परन्तु आकाश में तो सत् तथा शब्द दोनों ही
पाये जाते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि सत् तो एक स्वभाव
वाला है तथा आकाश दो स्वभाव का है।
या शक्तिः कल्पयेद् व्योम सा सद्द्योम्नोरभिन्नताम्।
आपाद्य धर्मधर्मित्वं व्यत्ययेनावकल्पयेत् ॥६३॥

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५६ पञ्चदशी
माया नाम की जो शक्ति, सद्वस्तु में आकाश की कल्पना
कर लेती है, वही शक्ति यह भी करती है कि पहले सत् तथा
आकाश के अभेद की कल्पना करके फिर उनके धर्मधर्मिभाव
को भी उलट-पुलट कर देती है। [यही कारण है कि 'सत् का
आकाश' ऐसी प्रतीति के स्थान पर 'आकाश की सत्ता' ऐसी
उलटी प्रतीति लोगों को होने लगी है]।
सतो व्योमत्वमापन्नं व्योम्नः सत्तां तु लौकिकाः ।
तार्किकाश्चावगच्छन्ति मायाया उचितं हि तत् ॥६४॥
सत् का ही आकाशभाव होगया है। परन्तु लौकिक और
तार्किक लोग उसको 'आकाश की सत्ता' ऐसा उलटा समझ बैठे
हैं। यह विपरीत भाव कर देना माया के लिये कोई बड़ी बात
नहीं है।
वस्तु तत्व का विचार करने पर ज्ञात होता है, कि जैसे
मिट्टी घटरूपी होगई है इसी प्रकार सत् ही आकाशभाव को
प्राप्त हो गया है। परन्तु लौकिक प्राणी तथा तर्कशास्त्री लोग
उसके कितना विरुद्ध समझ बैठे हैं कि वे सत्ता को आकाश का
धर्म ही मानने लगे हैं। ऐसा विपरीत दर्शन करा देना माया
के लिये उचित ही है। माया से और आशा ही क्या की जा
सकती थी ?
यद् यथा वर्तते तस्य तथात्वं भाति मानतः ।
अन्यथात्वं भ्रमेणेति न्यायोऽयं सार्वलौकिकः ॥६५॥
जो [रस्सी आदि] जैसा [रस्सी आदि रूप में] है उसका
वैसापन तो प्रमाण से प्रकट हुआ करता है। परन्तु उस [रस्सी]
का अन्यथाभाव [सर्परूपता] भ्रान्ति से प्रतीत हुआ करता है।

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५७
यह एक सर्वलोकप्रसिद्ध न्याय है। [इसी से समझ लनो कि
माया से विपरीत प्रतीति हो जाती है।]
एवं श्रुतिविचारात् प्राग्यथा यद्वस्तु भासते।
विचारेण विपर्येति ततस्तच्चिन्त्यतां वियत् ॥६६॥
इस प्रकार यह निश्चय होगया कि श्रुति का विचार करने
से पहले पहले जो वस्तु जैसी प्रतीत होती है, वह विचार करने
पर वैसी नहीं रह जाती। इसी से उस आकाश का चिन्तन
करो कि वह असल में क्या है।
उस विपरीतभान की निवृत्ति का उपाय अब बताया जाता
है—इस प्रकार श्रुति के अर्थों का विचार न करने तक जो
वस्तु [जो सद्रूप ब्रह्म] भ्रान्ति के प्रताप से जैसी [आकाशादि
के रूप में] हो गई है, वही वस्तु श्रुति के अर्थ का पर्यालोचन
करने पर विपरीत हो जाती है—किंवा आकाशादि भाव को
छोड़ कर फिर वही सद्रूप ब्रह्म ही हो जाती है। श्रुति का
विचार करने पर ही वस्तु के यथार्थ रूप का परिज्ञान हो सकता
है। इसी से कहते हैं कि आकाश का चिन्तन करो। विचार के
द्वारा उसके पारमार्थिक रूप को टटोल लो। देखो कि विचार
करने पर आकाश का पारमार्थिक रूप क्या सिद्ध होता है।
भिन्ने वियत्सती शब्दभेदाद् बुद्धेश्च भेदतः ।
वाय्वादिष्वनुवृत्तं सन्नतु व्योमेति भेदधीः ॥६७॥
आकाश और सत् भिन्न-भिन्न हैं। क्योंकि इन दोनों के
वाचक शब्द भी भिन्न-भिन्न हैं, तथा इन शब्दों से उत्पन्न होने
वाली बुद्धियें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। देख लो कि सत् वस्तु
तो वायु आदि में भी अनुवृत्त हो रही है

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५८ पञ्चदशी
‘सत् वायुः’ ‘सत्तेजः’ ‘वायु है’ ‘तेज है’ इत्यादि] परन्तु व्योम
[आकाश] की अनुवृत्ति इस तरह कहीं भी नहीं होती। बस
यही बुद्धि का भेद कहा जाता है [जिस का कथन इसी श्लोक
के दूसरे चरण में किया गया है]।
सद्वस्त्वधिकवृत्तित्वाद् धर्मी, व्योम्नस्तु धर्मता ।
धिया सतः पृथक्कारे ब्रूहि व्योम किमात्मकम् ॥६८॥
अधिक में वृत्ति वाली होने से सद्वस्तु तो धर्मी है तथा
अल्पदेशवृत्ति होने से आकाश उसका धर्म माना जाता है।
अब तुम बुद्धि की सहायता से सत् को पृथक् करके बताओ कि
आकाश का आत्मा [रूप] क्या है ?
देखो रूपरसादि सभी में रहने वाला, द्रव्य कहाने वाला
पदार्थ, जैसे धर्मी होता है, इसी प्रकार आकाशादि सभी में अनु-
वृत्त हुआ सत् ही धर्मी है, तथा रसादि से व्यावृत्त रहने वाला
‘रूप’ जैसे धर्म है इसी प्रकार वायु आदि से व्यावृत्त होने वाला
आकाश भी ‘धर्म’ ही है। अब तुम अपनी बुद्धि से आकाश में
से सत्ता को तो पृथक् करलो और फिर बताओ कि वह विचारा
आकाश किस स्वरूप का रह गया है ? [सत् को बुद्धि से पृथक्
करने की बात इसलिये कही है कि वैसे तो सत् किसी वस्तु
से पृथक् हो ही नहीं सकता]।
अवकाशात्मकं तच्चेदसत्तदिति चिन्त्यताम् ।
भिन्नं सतो ऽसच्च नेति वक्षि चेद्व्याहतिस्तव ॥६९॥
यदि तुम उस आकाश को [सत्स्वरूप न बता कर] अवकाश
रूप बताओ तो [सत् से विलक्षण होने से] उसे असत् ही तो
समझना पड़ेगा [क्योंकि सत् से भिन्न असत् ही होता है।]

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९
यदि यह कहो कि वह सत् से विलक्षण भी है और असत्
भी नहीं है तो यह तो तुम्हारी उल्टी बात है [भला इसे कौन
मान सकता है ? ]
भातीति चेद् भातु नाम भूषणं मायिकस्य तत् ।
यदसद् भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत् ॥७०॥
यदि यह आकाश असत् होता तो प्रतीत भी न होता !
परन्तु यह तो प्रतीत हो रहा है । इसका उत्तर यह है कि यह
प्रतीत होता है तो हुआ करो । यह [असत् होने पर भी प्रतीत
होना] तो मायवादी का भूषण ही है । देखो जो वस्तु असत्
हो [स्वरूप से तो न हो] परन्तु प्रतीत होती हो, वह सुपने के
हाथी आदि पदार्थों की तरह मिथ्या होती है ।
जातिव्यक्ती, देहिदेहौ, गुणद्रव्ये यथा पृथक् ।
वियत्सतो स्तथैवास्तु पार्थक्यं कोऽत्र विस्मयः ॥७१॥
तुम्हारे [नैयायिक वैशेषिक के] मत में [नियम से सदा
साथ दीखने वाले भी] जाति और व्यक्ति, देहधारी और देह
तथा गुण और द्रव्य, जैसे पृथक् पृथक् हैं [जैसे ये भिन्न भिन्न
हैं] इसी प्रकार [नियम से सदा साथ ही दीखने वाले भी]
आकाश और सत् पृथक् पृथक् हैं। इस में विस्मय की कौन सी
बात है ।
बुद्धोपि भेदो नो चित्ते निरूढिं याति चेत्तदा ।
अनैकाग्रचात् संशयाद्वा रूढ्यभावोऽस्य ते वद ॥७२॥
यदि समझा हुआ भी यह भेद [किसी दुर्बलता के कारण]
चित्त में जमता नहीं है, तो बताओ कि उस बात के जी में न
बैठने का कारण तुम्हारी अनेकाग्रता है अथवा कोई संशय है।

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६० पञ्चदशी
अप्रमत्तो भव ध्यानादाद्ये ऽन्यस्मिन् विवेचनम् ।
कुरु प्रमाणयुक्तिभ्यां, ततो रूढतमो भव ॥७३॥
यदि इस अरूढि का कारण अनेकाग्रता हो, तब तो [प्रत्यय
की एकाकारता रूपी] 'ध्यान' की सहायता से अपने मन को
सावधान कर लो। यदि कोई संशय रह गया हो तो प्रमाण
और युक्ति के द्वारा उस का विवेचन कर डालो। यों दोनों
रुकावटों को हटा कर रूढतम हो जाओ।
ध्यानान्मानाद्युक्तितोऽपि रूढे भेदे वियत्सतोः ।
न कदाचिद् वियत्सत्यं सद्वस्तु छिद्रवन्न च ॥७४॥
ध्यान [प्रत्यय की एकतानता] से मान [६७ श्लोक में कहे
गये] से तथा ६८ वें श्लोक में कही हुई युक्ति से, जब आकाश
और सत् का भेद चित्त में भले प्रकार जम जाय, तब फिर यह
आकाश कभी भी सत्य नहीं रहता [फिर तो यह सदा ही
मिथ्या भासा करता है] तब यह भी ज्ञात हो जाता है कि सद्वस्तु
में छिद्र [अर्थात् आकाश नाम की भी कोई वस्तु] है ही नहीं।
ज्ञस्य भाति सदा व्योम निस्तत्त्वोल्लेखपूर्वकम् ।
सद्वस्त्वपि विभात्यस्य निश्चिद्रत्वपुरःसरम् ॥७५॥
[जिस प्रकार किसी दुष्ट के याद आ जाने पर उसके दुर्गुण
याद आ जाते हैं इसी प्रकार] ज्ञानी पुरुष को व्यवहार में जब
आकाश की प्रतीति होती है तब उसे आकाश की निस्तत्वता
का परिज्ञान भी उस के साथ ही साथ हुआ करता है तथा
जब उस ज्ञानी को सद्वस्तु का विभान होता है तभी उसे यह
ज्ञान भी साथ ही हो जाता है कि सद्वस्तु में आकाशादि नाम
की कोई भी वस्तु नहीं होती।

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वासनायां प्रवृद्धायां, वियतसत्यत्ववादिनम् ।
सन्मात्रबोधमुक्तं च दृष्ट्वा विस्मयते बुधः ॥७६॥
[जो सदा आकाश को मिथ्या भाव से तथा सत् को वस्तु
भाव से चिन्तन किया करता है तो इस चिन्तन से यह होता
है कि] इस वासना के अत्यन्त बढ़ जाने पर आकाश और सत्
के तत्व को समझ लेने वाला वह बुध, फिर जब कभी किसी
ऐसे पुरुष को देखता है, जो आकाश को तो सत्य मानता हो
और उसे आकाशरहित सद्वस्तु का बोध बिलकुल भी न हो,
तब उसे बड़ा ही आश्चर्य होने लग पड़ता है [कि ओहो इसे
सर्वभासक, सर्वाधिष्ठान, सर्वाधार, सत् का तो ज्ञान नहीं है,
किन्तु यह अपने अज्ञान के कारण, भास्य, अधिष्ठेय किंवा आधेय
पदार्थों को ही जान रहा है ।
एवमाकाशमिथ्यात्वे तत्सत्यत्वे च वासिते ।
न्यायेनानेन वाय्वादेः सद्वस्तु प्रविविच्यताम् ॥७७॥
इस प्रकार जब आकाश का मिथ्यापन तथा सत् का सत्यपन
भले प्रकार जी में बैठ जाय, तब फिर इसी न्याय से वायु
आदि शेष भूतों में से भी सद्वस्तु को पृथक् कर लेना चाहिये ।
सद्वस्तुन्येकदेशस्था माया, तत्रैकदेशगम् ।
वियत् तत्राप्येकदेशगतो वायुः प्रकल्पितः ॥७८॥
माया सद्वस्तु में उसके किसी एक देश में ही पड़ी हुई है।
उस माया के किसी एक देश में यह आकाश रह रहा है । उस
आकाश के किसी एक देश में इस वायु की कल्पना हो गयी है
[यों इस वायु का भी सत् के साथ परम्परा से सम्बन्ध है।
इससे इसका विवेचन भी कर ही डालना चाहिये ।]

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६२ पंचदशी
शोषस्पर्शौ गतिर्वेगो वायुधर्मा इमे मताः ।
त्रयः स्वभावाः सन्मायाव्योम्नां ये तेऽपि वायुगाः॥७९॥
शोष तथा स्पर्श, गति तथा वेग ये चार धर्म वायु के अपने
धर्म कहाते हैं। [सत्ता, निस्तत्वरूपता तथा शब्द नाम के] जो
तीन अन्य स्वभाव वायु में पाये जाते हैं, वे सत्-माया-तथा
आकाश के हैं; वे भी वायु में आ गये हैं।
वायुरस्तीति सद्भावः सतो वायौ पृथक्कृते ।
निस्तत्वरूपता मायास्वभावो, व्योमगो ध्वनिः ॥८०॥
'वायुरस्ति' वायु है इस व्यवहार की कारण जो सद्रूपता
है वह सद्वस्तु का धर्म वायु में आ गया है। सद्वस्तु से वायु के
पृथक् कर लेने पर जो निस्तत्वरूपता [मिथ्यात्व] शेष रह
जाती है वह वायु में दूसरा माया का धर्म है तथा आकाश
से आया हुआ शब्द यह तीसरा वायु का धर्म है ।
सतोऽनुवृत्तिः सर्वत्र व्योम्नो नेति पुरेरितम् ।
व्योमानुवृत्तिरधुना कथं न व्याहतं वचः ॥८१॥
इसी प्रकरण के ६७ वें श्लोक में कहा है कि सत् की ही
सर्वत्र अनुवृत्ति है आकाश की नहीं। अव् उसके विपरीत वायु
आदि में आकाश की अनुवृत्ति कर रहे हो, फिर तुम्हारे कथन
में व्याघात [किंवा पूर्वोत्तरविरोध] क्योंकर नहीं है ?
छिद्रानुवृत्तिर्नेतीति पूर्वोक्तिरधुनात्वियम् ।
शब्दानुवृत्तिरेवोक्ता वचसो व्याहतिः कुतः ॥८२॥
इसका उत्तर यह है कि पहले [६७ श्लोक में] यह कहा
गया था कि छिद्र अर्थात् आकाश की अनुवृत्ति नहीं होती। अब
तो केवल शब्द की अनुवृत्ति की बात कही जा रही है । अर्थात्