पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५२ पंचदशी
है। इस दृष्टान्त से शक्ति का जीवित [सत्ता] पृथक् मान लेना
ठीक नहीं है। क्योंकि शक्ति से किसी के जीवित की वृद्धि नहीं
होती है। किन्तु शक्ति के कार्य जो कुश्ती तथा खेती आदि हैं
उन से जीवन की वृद्धि हो जाती है। [इसी प्रकार प्रकृत में भी
समझ लेना चाहिये कि उस ब्रह्म में उसकी शक्ति के कारण
से द्वितीयपन (द्वैतभाव) नहीं आ जाता है।]
सर्वथा शक्तिमात्रस्य न पृथग्गणना क्वचित् ।
शक्तिकार्यं तु नैवास्ति द्वितीयं शङ्क्येत कथम् ॥५३॥
केवल शक्ति की तो पृथक् गणना [गिनती] कहीं होती ही नहीं।
यदि यह कहो कि शक्ति के कार्यों से ही उस ब्रह्म में सद्वितीयता
[द्वैतभाव] आ जायगी तो उसका उत्तर यह है कि उस समय
[सृष्टि की उत्पत्ति से प्रथम] तो शक्ति का कार्य भी कुछ नहीं था।
'फिर [उस समय] द्वितीय [दूसरे] के होने की शंका क्यों करते हो ?
प्रलय काल में ब्रह्म और उसकी शक्ति दोनों होते तो हैं,
परन्तु किसी की भी शक्ति की गिनती उससे पृथक् नहीं की
जाती है। सृष्टि बनने के बाद शक्ति के नाना कार्य हो तो जाते
हैं, परन्तु सृष्टि बनने के पीछे के कार्यों से, सृष्टि बनने से
प्रथम काल में, द्वितीयपन कैसे आ सकेगा ?
न कृत्स्नब्रह्मवृत्तिः सा शक्तिः किन्त्वेकदेशभाक् ।
घटशक्तिर्यथा भूमौ स्निग्धमृद्येव वर्तते ॥५४॥
ब्रह्म की वह शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्म में नहीं रहती है। किन्तु
उस ब्रह्म के एक देश में ही रहती है। जिस प्रकार घड़ा मिट्टी
से बनता है, परन्तु घट को उत्पन्न करने की शक्ति केवल चिकनी
मिट्टी में ही रहती है।