पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५४ पञ्चदशी
इस परमेश्वर की दो रूप की स्थिति का वर्णन किया है कि,
'तावानस्यमहिमाऽतो ज्यायांस्पूच पूरुप:पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं
दिवि' यह सब उस ब्रह्म की विभूति का विस्तार ही है। वह स्वयं
तो इस नामरूपधारी जगत् से बहुत ही बड़ा है। उस ब्रह्म
पुरुष में किसी प्रकार का विकार नहीं है। तेज, जल, पृथिवी
आदि सब के सब उसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इस अमृत
पुरुप का तीन चौथाई भाग तो अभी भी अपने प्रकाशशील
स्वतःप्रभ आत्मरूप में स्थित है।
निरंशेप्यंशमारोप्य कृत्स्नेऽशे वेति पृच्छतः ।
तद्भाषयोत्तरं ब्रूते श्रुतिः श्रोतृ हितैषिणी ॥५८॥
है तो वह असल में निरंश ही। परन्तु पहले उसमें अंश का
आरोप कर लिया गया है और फिर यह पूछा गया है कि शक्ति
कृत्स्न [सम्पूर्ण] में रहती है या अंश में रहती है ? श्रोताओं
का हित चाहने वाली श्रुति ने, उनकी ही भाषा में उसका उत्तर
दे डाला है [इस कारण श्रुति की भाषा में और ब्रह्म के निरंशपने
में कोई भी विरोध नहीं है ]।
सत्तत्वमाश्रिता शक्तिः कल्पयेत् सति विक्रियाः ।
वर्णा भित्तिगता भित्तौ चित्रं नानाविधं यथा ॥५९॥
उस सत् तत्व में रहने वाली वह शक्ति, उस सत् में ही
विक्रिया अर्थात् कार्यविशेषों को उत्पन्न किया करती है। जैसे
कि भीत पर पोते हुए लाल पीले आदि नानाविध रंग नाना-
विध चित्र को भित्ति पर ही उत्पन्न किया करते हैं । '
आद्यो विकार आकाशः सोवकाशस्वरूपवान् ।
आकाशोऽस्तीति सत्तत्वमाकाशेऽप्यनुगच्छति ॥६०॥