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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४७
रहना) तुम्हारी समझ में कैसे आ जाता है ? यह तो हमारी
समझ में नहीं आता ।
अत्यन्तं निर्जगद्व्योम यथा ते बुद्धिमाश्रितम् ।
तथैव सन्निराकाशं कुतो नाश्रयते मतिम् ॥४२॥
सिद्धान्ती दृष्टान्त देकर उत्तर देता है कि-जैसे तेरी बुद्धि
को यह समझ पड़ता है कि कभी यह आकाश सम्पूर्ण जगत्
से रहित हो सकता है [जगत् न रह कर आकाश ही आकाश
रह जाता है] इसी प्रकार तू ज़रा और ऊपर क्यों नहीं चढ़ जाता ?
यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आ जाती कि इस सद्वस्तु
में तो आकाश तत्व भी नहीं है ? निराकाश सत् पदार्थ को तू
क्यों नहीं समझ लेता है। [जैसे बिना जगत् का आकाश हो
सकता है, इसी प्रकार बिना आकाश की सद्वस्तु भी हो सकती है।]
निर्जगद्व्योम दृष्टं चेत् प्रकाशतमसी विना ।
क्व दृष्टं किंच ते पक्षे न प्रत्यक्षं वियत् खलु ॥४३॥
यदि तू कहे कि मैंने बिना जगत् का आकाश देखा है इसी
से मैं आकाश को निर्जगत् मान लेता हूं, तो हम पूछते हैं कि
प्रकाश या अन्धकार के बिना तुम ने अकेले आकाश को कहां
देखा है ? इनके बिना तो आकाश कभी रहता ही नहीं। एक
और भी बात है कि तुम्हारे मत में तो आकाश का प्रत्यक्ष दर्शन
होता ही नहीं है । ऐसा कहते हुए तुम तो अपसिद्धान्ती हो
जाते हो।
सद्वस्तु शुद्धं त्वस्माभि र्निश्चितैरनुभूयते ।
तूष्णीं स्थितौ, न शून्यत्वं शून्यबुद्धेश्च वर्जनात् ॥४४॥