पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५३
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्ति स्वयंप्रभः ।
इत्येकदेशवृत्तित्वं मायाया वदति श्रुतिः ॥५५॥
'पादोस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' [यजुर्वेद ३१] ये सम्पूर्ण
भूत इसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इसका तीन चौथाई भाग
तो अभी भी अमर और स्वयं प्रकाश ही है। यह श्रुति कह रही
है कि ब्रह्म की माया ब्रह्म के किसी एक देश में रहती है, सम्पूर्ण
में नहीं रहती।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।
इति कृष्णोऽर्जुनायाह जगतस्त्वेकदेशताम् ॥५६॥
'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्' [गीता १०-४२] मैं
इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण किये हुए हूँ
यों कृष्ण भगवान ने भी अर्जुन के प्रति जगत् की एकदेशता .
का ही वर्णन किया है।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ।
विकारावर्ति चान्त्रास्ति श्रुतिसूत्रकृतोर्वचः ॥५७॥
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा' [श्वे० ३-१४] यह मन्त्र तथा विकारावर्ति
यह वेदान्तसूत्र ब्रह्म के निर्माय स्वरूपको बता रहे हैं।
ब्रह्म का निर्माय स्वरूप भी है, इसमें प्रमाण की दर्कार हो तो
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्' उसने समस्त लोक
लोकान्तरों को चारों तरफ से लपेट लिया है, फिर भी वह उसके बाहर
दशाङ्गुल रह ही गया है' इस श्रुति ने तथा 'विकारावर्ति च तथा हि
स्थितिमाह' (ब्रह्मसूत्र ४-४-१९) विकारों में न रहनेवाला नित्य
मुक्त भी परमेश्वररूप है। केवल विकारों में रहनेवाला ही
परमेश्वररूप नहीं है। क्योंकि वेद ने स्वयं अपने श्रीमुख से