पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५० पञ्चदशी
कार्यों को उत्पन्न करने वाली सद्वस्तु की ऐसी शक्ति किंवा ऐसे
सामर्थ्य को ही तो 'माया' कहते हैं। अग्नि की शक्ति जैसे अग्नि
से पृथक् कोई तत्व नहीं होती है, अग्नि की शक्ति को जैसे उस
के दाहादि कार्यों को देखकर ही जान सकते हैं ऐसी ही यह माया
भी है । कार्यों के उत्पन्न हो जाने से पहले कोई भी कभी शक्ति
को पहचान नहीं सकता है । ]
न सद्वस्तु सतः शक्ति र्न हि वन्हेः स्वशक्तिता ।
सद्विलक्षणतायां तु शक्तेः किं तत्त्व मुच्यताम् ॥४८॥
वह सत् की शक्ति, सद्वस्तु ही हो, यह नहीं हो सकता देखते
हैं कि वह्नि स्वयं अपनी शक्ति नहीं होती। उसको सत् से विल-
क्षण किसी तरह की मानने पर तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ?
[ वह शक्ति यद्यपि कार्यरूपी लिंग से जानी जाती है, परन्तु
वह असल में निस्तत्त्वरूप ही है । यह बात इन दो श्लोकों में सिद्ध
की गई है । वह शक्ति भी कोई दूसरी सद्वस्तु ही हो, तब तो सत् से
भिन्न हो जाने के कारण, उस की शक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि
देखते हैं कि अग्नि ही अग्नि की शक्ति नहीं होती है । यदि उसको
सत् से विलक्षण तत्त्व मानोगे तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ? ]
शून्यत्वमिति चेच्छून्यं मायाकार्यमितीरितम् ।
न शून्यं नापि सद्यादृक् तादृक् तत्वमिहेष्यताम् ॥४९॥
यदि उस शक्ति का रूप शून्य को बताया जाय तो शून्य तो
माया का कार्य ही है । यह बात इसी प्रकरण के चौंतीसवें श्लोक
में कही गयी है । इस कारण यही कहना पड़ता है कि वह माया